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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > नैनीताल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: दुर्गम में सेवा दे रहे असिस्टेंट प्रोफेसरों को मिली बड़ी राहत, सुगम में तबादले के निर्देश
उत्तराखंडफीचर्ड

नैनीताल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: दुर्गम में सेवा दे रहे असिस्टेंट प्रोफेसरों को मिली बड़ी राहत, सुगम में तबादले के निर्देश

The Hill India News
Last updated: March 9, 2026 1:18 pm
The Hill India News
Published: March 9, 2026
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नैनीताल: उत्तराखंड के सरकारी डिग्री कॉलेजों में कार्यरत उन असिस्टेंट प्रोफेसरों के लिए राहत की बड़ी खबर आई है, जो वर्षों से दुर्गम और अति-दुर्गम क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। नैनीताल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि पात्रता पूरी करने वाले शिक्षकों को आगामी स्थानांतरण सत्र में अनिवार्य रूप से सुगम क्षेत्रों में तैनात किया जाए।

Contents
क्या है पूरा मामला? (बैकग्राउंड)‘शून्य सत्र’ का तर्क और कोर्ट की टिप्पणीइन चार कॉलेजों में मिलेगी तैनाती: हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेशउत्तराखंड उच्च शिक्षा में स्थानांतरण नीति की चुनौतियांअसिस्टेंट प्रोफेसरों के मनोबल पर सकारात्मक प्रभावआगे की राह: मई 2026 पर टिकी नजरें

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने इस मामले में न केवल याचिकाकर्ता को राहत दी, बल्कि स्थानांतरण नियमावली के पालन को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है।

क्या है पूरा मामला? (बैकग्राउंड)

यह मामला राजकीय पीजी कॉलेज जोशीमठ (चमोली) में तैनात असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मंजू यादव से जुड़ा है। डॉ. यादव गृह विज्ञान विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर बताया कि वह पिछले तीन वर्षों से दुर्गम क्षेत्र (जोशीमठ) में अपनी सेवाएं दे रही हैं। उत्तराखंड की स्थानांतरण नियमावली के अनुसार, तीन वर्ष की दुर्गम सेवा पूरी करने के बाद कर्मचारी सुगम क्षेत्र में स्थानांतरण का हकदार हो जाता है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने पिछले स्थानांतरण सत्र में भी सुगम क्षेत्र में तबादले के लिए आवेदन किया था, लेकिन सरकार ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए उनकी मांग को अनसुना कर दिया।

‘शून्य सत्र’ का तर्क और कोर्ट की टिप्पणी

आज सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए सरकारी अधिवक्ता ने कोर्ट को अवगत कराया कि पिछले वर्ष राज्य में पंचायत चुनाव होने और आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण ‘स्थानांतरण सत्र’ को शून्य घोषित कर दिया गया था। सरकार का तर्क था कि इसी वजह से किसी भी शिक्षक या कर्मचारी का तबादला नहीं किया जा सका।

हालांकि, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि प्रशासनिक कारणों या चुनावों की वजह से किसी कर्मचारी के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब रिक्त पद उपलब्ध हों। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि यदि कोई कर्मचारी अपनी अनिवार्य सेवा अवधि पूरी कर चुका है, तो उसे स्थानांतरण के लाभ से वंचित रखना उचित नहीं है।

इन चार कॉलेजों में मिलेगी तैनाती: हाईकोर्ट का स्पष्ट आदेश

नैनीताल हाईकोर्ट ने याचिका को निस्तारित करते हुए सरकार को स्पष्ट आदेश दिया है कि आगामी स्थानांतरण सत्र (मई 2026) के दौरान डॉ. मंजू यादव को उनकी पसंद और रिक्त पदों की उपलब्धता के आधार पर निम्नलिखित कॉलेजों में से किसी एक पर तैनात किया जाए:

  1. एमबी पीजी कॉलेज, हल्द्वानी

  2. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हल्दूचौड़

  3. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कपकोट

  4. राजकीय पीजी कॉलेज, काशीपुर

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन स्थानों पर रिक्त पड़े पदों पर स्थानांतरण नियमावली के तहत विचार किया जाए और यह प्रक्रिया प्राथमिकता के आधार पर पूरी की जाए।

उत्तराखंड उच्च शिक्षा में स्थानांतरण नीति की चुनौतियां

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में स्थानांतरण हमेशा से एक जटिल मुद्दा रहा है। राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण शिक्षा विभाग और शासन को ‘सुगम-दुर्गम’ के बीच संतुलन बनाने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है।

  • अनिवार्य सेवा अवधि: नियमानुसार, नव-नियुक्त शिक्षकों को पहले दुर्गम क्षेत्रों में अपनी सेवाएं देनी होती हैं।

  • शून्य सत्र का प्रभाव: जब भी सरकार किसी सत्र को ‘शून्य’ घोषित करती है, तो उन शिक्षकों की प्रतीक्षा अवधि बढ़ जाती है जो पहले ही कठिन परिस्थितियों में अपनी सेवा दे चुके होते हैं।

  • रिक्त पदों का संकट: सुगम क्षेत्रों (जैसे देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार) के कॉलेजों में पदों की कमी और भारी प्रतिस्पर्धा के कारण भी कई बार पात्र शिक्षकों को मौका नहीं मिल पाता।

असिस्टेंट प्रोफेसरों के मनोबल पर सकारात्मक प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि नैनीताल हाईकोर्ट का यह निर्णय उत्तराखंड के उच्च शिक्षा विभाग के लिए एक नजीर साबित होगा। इससे उन सैकड़ों असिस्टेंट प्रोफेसरों के मन में विश्वास जागा है जो वर्तमान में पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग जैसे सीमांत जिलों में तैनात हैं।

शिक्षा जगत से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि सरकार समय पर पारदर्शी तरीके से स्थानांतरण प्रक्रिया पूरी करे, तो शिक्षकों का मनोबल बढ़ेगा, जिसका सीधा सकारात्मक असर राज्य की उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा।

आगे की राह: मई 2026 पर टिकी नजरें

सरकारी बयान के अनुसार, अगला स्थानांतरण सत्र मई 2026 से प्रभावी होगा। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब शासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि केवल डॉ. मंजू यादव ही नहीं, बल्कि उनके जैसे अन्य पात्र शिक्षकों के आवेदनों पर भी सहानुभूतिपूर्वक और नियमानुसार विचार किया जाए।

डॉ. मंजू यादव को मिली यह कानूनी जीत यह दर्शाती है कि न्यायपालिका कर्मचारियों के सेवा संबंधी अधिकारों के प्रति गंभीर है। अब देखना यह होगा कि शिक्षा निदेशालय इस आदेश के आलोक में अन्य लंबित आवेदनों पर क्या रुख अपनाता है।

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