आरक्षण प्रतिशत कम किए जाने के दावे पर नैनीताल हाईकोर्ट में जनहित याचिका, याचिकाकर्ता ने 1994 के कानून और 2001 के शासनादेश का उठाया मुद्दा; ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े फ्रीज बैंक खाते के मामले में भी कोर्ट ने दी राहत
नैनीताल। उत्तराखंड में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सरकारी नौकरियों में निर्धारित नियमों के अनुसार आरक्षण का लाभ नहीं दिए जाने का आरोप लगाते हुए दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सरकार को मामले में अपना जवाब दाखिल करने के लिए छह सप्ताह का समय दिया है।
यह मामला हरिद्वार निवासी शेखर सैनी की ओर से दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिका में सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण के प्रावधान तथा उत्तराखंड में लागू किए गए शासनादेश को चुनौती से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के सामने आरक्षण के प्रतिशत में कथित कमी और इसके लिए अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर सवाल रखे गए।
1994 के कानून का दिया गया हवाला
याचिका में कहा गया है कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1994 में उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस एक्ट बनाया था। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस कानून का उद्देश्य सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों तथा आरक्षित वर्गों को प्रतिनिधित्व देना था।
याचिका में दावा किया गया कि कानून के पैरा 3 के तहत सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए कुल 21 प्रतिशत, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस व्यवस्था के तहत संबंधित आरक्षित वर्गों के पात्र अभ्यर्थियों को सरकारी सेवाओं में नियुक्ति का लाभ दिया जाना था।
उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड राज्य बनने के बाद इस कानून को राज्य में अपनाए जाने का भी याचिका में उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून को बिना संशोधित किए बाद में राज्य सरकार की ओर से शासनादेश जारी कर आरक्षण प्रतिशत में बदलाव किया गया।
2001 के शासनादेश पर उठाया गया सवाल
जनहित याचिका में मुख्य रूप से वर्ष 2001 में जारी शासनादेश को लेकर सवाल उठाया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस शासनादेश में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पहले निर्धारित 21 प्रतिशत आरक्षण को घटाकर 11 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत को घटाकर 14 प्रतिशत किए जाने की बात कही गई।
याचिका में यह भी कहा गया कि जिस समय संबंधित व्यवस्था लागू की गई थी, उस समय आरक्षित श्रेणी में चिन्हित जातियों की संख्या कम थी, जबकि बाद में सूची में शामिल जातियों की संख्या बढ़ी। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष यह तर्क रखा गया कि यदि मूल अधिनियम में आरक्षण का प्रावधान एक निश्चित प्रतिशत के रूप में किया गया है तो केवल शासनादेश के माध्यम से उसमें बदलाव किए जाने पर कानूनी सवाल उठते हैं।
याचिका में यह मांग भी रखी गई कि यदि राज्य सरकार आरक्षण के संबंध में अलग व्यवस्था लागू करना चाहती है तो इसके लिए विधिवत नियमावली अथवा आवश्यक कानूनी संशोधन किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष हुई। अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए मामले में अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए छह सप्ताह का समय दिया गया है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने याचिका में लगाए गए आरोपों को सही या गलत घोषित नहीं किया है। सरकार का जवाब आने के बाद मामले में उठाए गए कानूनी और संवैधानिक सवालों पर आगे सुनवाई होगी। ऐसे में इस मामले में अगली सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी नौकरियों में आरक्षण से संबंधित किसी भी व्यवस्था का सीधा संबंध भर्ती प्रक्रिया और पात्र अभ्यर्थियों के अवसरों से होता है। हालांकि, अंतिम स्थिति अदालत में आगे होने वाली सुनवाई और सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले जवाब के बाद ही स्पष्ट होगी।
आरक्षण व्यवस्था को लेकर आगे क्या होगा?
याचिका में उठाए गए सवालों का केंद्र यह है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण की प्रतिशत व्यवस्था तय करने का अधिकार किस कानूनी प्रक्रिया के तहत इस्तेमाल किया गया और क्या मौजूदा व्यवस्था मूल अधिनियम के अनुरूप है। याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने यह भी सवाल उठाया है कि यदि मूल कानून में संशोधन आवश्यक था तो केवल शासनादेश के आधार पर आरक्षण प्रतिशत में बदलाव कैसे किया गया।
अब राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर अपना जवाब अदालत के सामने रखना है। इसके बाद याचिकाकर्ता और सरकार दोनों के पक्ष सुनने के बाद हाईकोर्ट इस मामले में आगे की दिशा तय करेगा।
ऑनलाइन गेमिंग लेन-देन से फ्रीज बैंक खाते के मामले में भी हाईकोर्ट से राहत
इसी बीच नैनीताल हाईकोर्ट में ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े लेन-देन के कारण फ्रीज किए गए बैंक खाते के मामले में भी सुनवाई हुई। इस मामले में अदालत ने याचिकाकर्ताओं को बैंक के समक्ष नया प्रतिवेदन दाखिल करने की अनुमति दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने भावना डांगी समेत अन्य की ओर से दायर याचिका पर पारित किया। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत का आदेश 18 सितंबर को पारित हुआ था और इसकी प्रति 21 सितंबर को उपलब्ध हुई।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता बीएस भंडारी और मुकुल डांगी ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किलों का बैंक खाता ऑनलाइन गेमिंग से संबंधित कुछ लेन-देन पाए जाने के कारण फ्रीज कर दिया गया था। इस मामले में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को प्रतिवादी संख्या तीन के रूप में शामिल किया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत के समक्ष यह पक्ष रखा गया कि खाते के फ्रीज होने से उन्हें दैनिक जरूरतों और अन्य आवश्यक खर्चों को पूरा करने में परेशानी हो रही है।
बैंक ने दिया नया प्रतिवेदन देने का विकल्प
सुनवाई के दौरान एसबीआई की ओर से अदालत को बताया गया कि यदि याचिकाकर्ता खाते को अनफ्रीज करने के संबंध में नया प्रतिवेदन दाखिल करते हैं और उसमें यह स्पष्ट करते हैं कि खाते पर लगा लियन केवल ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ी विवादित राशि तक सीमित रखा जाए, तो शेष राशि को अनफ्रीज करने के संबंध में बैंक कानून के अनुसार उनके प्रतिवेदन पर विचार करेगा।
बैंक की ओर से यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ताओं में से एक भारतीय सेना में सेवारत है, जबकि दूसरी याचिकाकर्ता गृहिणी हैं और अपनी दैनिक आवश्यकताओं तथा अन्य खर्चों के लिए अपने बचत खाते पर निर्भर हैं।
एक सप्ताह में प्रतिवेदन, दो सप्ताह में बैंक को लेना होगा फैसला
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने याचिकाकर्ताओं को आदेश की तारीख से एक सप्ताह के भीतर बैंक के समक्ष नया प्रतिवेदन दाखिल करने की अनुमति दी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता निर्धारित समय में प्रतिवेदन दाखिल करते हैं तो संबंधित बैंक को उसके बाद दो सप्ताह के भीतर उस पर निर्णय लेना होगा।
मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। इस बीच संबंधित प्रतिवादियों को प्रति-शपथपत्र यानी काउंटर एफिडेविट दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं।
दो अलग मामलों में हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाई
नैनीताल हाईकोर्ट में हुई इन दोनों सुनवाइयों में अलग-अलग कानूनी मुद्दे सामने आए। एक ओर सरकारी नौकरियों में SC, ST और OBC आरक्षण की व्यवस्था को लेकर राज्य सरकार से जवाब मांगा गया है, वहीं दूसरी ओर ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े लेन-देन के कारण फ्रीज बैंक खाते के मामले में खाताधारकों को बैंक के समक्ष नया प्रतिवेदन दाखिल करने का अवसर दिया गया है।
आरक्षण मामले में अब सरकार के जवाब के बाद आगे की न्यायिक प्रक्रिया स्पष्ट होगी। वहीं बैंक खाते के मामले में याचिकाकर्ताओं को निर्धारित समय में बैंक के समक्ष प्रतिवेदन देना होगा और बैंक को उस पर तय समयसीमा के भीतर निर्णय लेना होगा।
