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उपनल कर्मियों पर हाईकोर्ट सख्त: ‘आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ?’ नियमितीकरण और वेतन से GST कटौती मामले में सरकार को 2 हफ्ते का अल्टीमेटम

The Hill India News
Last updated: June 9, 2026 2:02 pm
The Hill India News
Published: June 9, 2026
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नैनीताल: उत्तराखंड में विभिन्न सरकारी विभागों की रीढ़ माने जाने वाले उपनल (Uttarakhand Purv Sainik Kalyan Nigam Limited) संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण और उनके अधिकारों को लेकर कानूनी लड़ाई अब एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पूर्व में दिए गए आदेशों का अनुपालन न करने और कर्मचारियों के हितों की अनदेखी करने पर राज्य सरकार के प्रति सख्त नाराजगी जाहिर की है।

Contents
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की पीठ में तीखी बहसक्या है पूरा विवाद और नवंबर 2025 का ऐतिहासिक आदेश?मानवीय पहलू: 20 साल की सेवा, फिर भी भविष्य अंधकारमयवेतन से GST की कटौती: एक अनोखी विडंबनाअब आगे क्या? 2 जुलाई की तारीख पर टिकी नजरें

इस बहुचर्चित Uttarakhand High Court UPNAL Employees Case की सुनवाई करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने सरकार को दो टूक लहजे में आदेश दिया है कि वह पिछले फैसलों पर की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट अगले दो सप्ताह के भीतर अदालत के समक्ष पेश करे। कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई के लिए 2 जुलाई 2026 की तिथि नियत की है।

न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की पीठ में तीखी बहस

नैनीताल स्थित उच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ में हुई। उपनल कर्मचारी संघ की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में माहौल काफी गंभीर रहा। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने दलील दी कि सरकार अदालत के आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल रही है और हजारों परिवारों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए एकलपीठ ने सरकार के ढुलमुल रवैये पर सवाल उठाए और स्पष्ट किया कि अदालत के आदेशों की अवहेलना को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार को अब यह साबित करना होगा कि उसने कोर्ट के निर्देशों को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए हैं।

क्या है पूरा विवाद और नवंबर 2025 का ऐतिहासिक आदेश?

इस पूरे विवाद की जड़ें राज्य के हजारों संविदा कर्मचारियों के बुनियादी अधिकारों से जुड़ी हैं। दरअसल, उपनल कर्मचारी संघ ने सरकार के खिलाफ एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद नवंबर 2025 में एक बड़ी जीत हासिल की थी। तब हाईकोर्ट की खंडपीठ (Division Bench) ने एक मील का पत्थर साबित होने वाला आदेश पारित किया था।

अदालत ने अपने उस आदेश में तीन मुख्य बातें स्पष्ट तौर पर कही थीं:

  • समान कार्य, समान वेतन: सरकारी विभागों में नियमित कर्मचारियों की तरह ही काम कर रहे उपनल कर्मियों को भी न्यूनतम चयनित वेतनमान दिया जाए।

  • जीएसटी (GST) की अवैध वसूली पर रोक: कर्मचारियों को मिलने वाले बेहद सीमित वेतन से सर्विस टैक्स या जीएसटी की कटौती न की जाए।

  • नियमितीकरण की ठोस नीति: जो कर्मचारी वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उनके नियमितीकरण (Regularization) के लिए चरणबद्ध प्रक्रिया अपनाई जाए।

अदालत के इतने स्पष्ट आदेश के बावजूद, कई महीने बीत जाने के बाद भी शासन स्तर पर इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसी निष्क्रियता के खिलाफ कर्मचारी संघ को दोबारा अवमानना याचिका के जरिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

मानवीय पहलू: 20 साल की सेवा, फिर भी भविष्य अंधकारमय

इस कानूनी लड़ाई का सबसे दर्दनाक और मानवीय पहलू यह है कि उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर मैदानों तक, विभिन्न विभागों में तैनात इन कर्मचारियों ने अपने जीवन के सुनहरे 20 साल से अधिक का समय सरकारी सेवा में झोंक दिया है।

कर्मचारियों की पीड़ा: याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट के समक्ष बेहद भावुक दलील देते हुए कहा, “हमारे कई साथी अब 20 से 25 साल की सेवा पूरी कर चुके हैं और कई तो सेवानिवृत्ति (Retirement) के कगार पर खड़े हैं। अगर इस मोड़ पर भी सरकार ने अदालत के आदेश का पालन करते हुए हमें नियमित नहीं किया या न्यूनतम वेतनमान नहीं दिया, तो हम बुढ़ापे में कहां जाएंगे? हमारे पास न तो पेंशन होगी और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा।”

कर्मचारियों का आरोप है कि सरकार इस मानवीय संकट को गंभीरता से नहीं ले रही है और नौकरशाही के फेर में मामले को लगातार लटकाया जा रहा है।

वेतन से GST की कटौती: एक अनोखी विडंबना

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा हैरान करने वाला विषय उपनल कर्मियों के वेतन से जीएसटी (GST) काटा जाना है। कर्मचारी संघ ने अदालत को बताया कि एक तरफ तो उन्हें नियमित कर्मचारियों की तुलना में बेहद कम मानदेय मिलता है, और दूसरी तरफ सरकार उनके इसी सीमित वेतन से जीएसटी वसूल रही है।

विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों का भी मानना है कि किसी भी कर्मचारी के श्रम के बदले मिलने वाले वेतन से इस तरह टैक्स की कटौती न्यायसंगत नहीं है। पूर्व में खंडपीठ ने इस पर पूरी तरह रोक लगाने को कहा था, लेकिन जमीनी स्तर पर कर्मचारियों को इस कटौती से अब तक राहत नहीं मिल सकी है।

अब आगे क्या? 2 जुलाई की तारीख पर टिकी नजरें

हाईकोर्ट द्वारा सरकार को दी गई दो हफ्ते की मोहलत बेहद महत्वपूर्ण है। अब राज्य सरकार को 2 जुलाई से पहले कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर यह बताना होगा कि उन्होंने समान कार्य समान वेतन और जीएसटी कटौती रोकने के संबंध में क्या प्रशासनिक आदेश जारी किए हैं।

यदि सरकार दो सप्ताह के भीतर संतोषजनक अनुपालन रिपोर्ट पेश नहीं कर पाती है, तो कोर्ट अवमानना अधिनियम के तहत संबंधित उच्च अधिकारियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई भी कर सकता है।

इस Uttarakhand High Court UPNAL Employees Case पर न केवल उत्तराखंड बल्कि देशभर के श्रम संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों की नजरें टिकी हुई हैं। यह मामला देश में संविदा और आउटसोर्सिंग प्रथा के तहत काम करने वाले लाखों युवाओं के शोषण और उनके मानवाधिकारों से जुड़ा एक बड़ा नजीर बन सकता है। उत्तराखंड सरकार के लिए अब यह परीक्षा की घड़ी है कि वह अपनी ‘वेलफेयर स्टेट’ (कल्याणकारी राज्य) की छवि को बरकरार रखते हुए इन कर्मचारियों को न्याय देती है या फिर कानूनी पेचीदगियों में उलझाए रखती है।

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