
देहरादून: उत्तराखंड में लोकतंत्र की सबसे बुनियादी इकाई ‘ग्राम पंचायतों’ को सशक्त बनाने की दिशा में धामी सरकार एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रही है। राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में दशकों से लंबित पंचायत भवनों की समस्या को हल करने के लिए पंचायती राज विभाग ने बजट में भारी बढ़ोतरी का प्रस्ताव शासन को भेजा है। इस नए निर्णय के तहत अब राज्य सेक्टर से मिलने वाली धनराशि को दोगुना किया जाएगा, जिससे प्रदेश की उन 803 पंचायतों को अपनी छत मिल सकेगी जो अब तक किराए के कमरों या स्कूलों के भरोसे चल रही हैं।
क्यों पड़ी बजट बढ़ाने की जरूरत?
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियाँ देश के अन्य राज्यों से भिन्न हैं। विशेषकर पर्वतीय जिलों में निर्माण सामग्री की ढुलाई और विषम भू-भाग के कारण निर्माण लागत मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक आती है। अब तक राज्य सरकार पंचायत भवन के लिए केवल 10 लाख रुपए आवंटित करती थी, जबकि केंद्र से 20 लाख का प्रावधान है।
कुल 30 लाख रुपए में पहाड़ी क्षेत्रों में आधुनिक सुविधाओं वाला पंचायत भवन बनाना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा था। इसी गतिरोध को तोड़ने के लिए अब राज्य सरकार ने अपना हिस्सा बढ़ाकर 20 लाख रुपए करने का मन बनाया है। शासन से मुहर लगते ही प्रत्येक पंचायत के पास भवन निर्माण के लिए 40 लाख रुपए का मजबूत फंड उपलब्ध होगा।
राज्य गठन के 25 साल: 803 पंचायतें अब भी ‘बेघर’
यह आंकड़ा चौंकाने वाला है कि राज्य गठन के ढाई दशक बीत जाने के बाद भी उत्तराखंड की कुल 1300 से अधिक ग्राम पंचायतों में से 803 पंचायतों के पास अपना आधिकारिक कार्यालय नहीं है।
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वर्तमान स्थिति: कई ग्राम प्रधान अपने घरों से काम चला रहे हैं, तो कहीं प्राथमिक विद्यालयों के कमरों में पंचायत की फाइलें धूल फांक रही हैं।
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प्रभाव: पंचायत भवन न होने से न तो ग्राम सभा की बैठकें सुचारू रूप से हो पाती हैं और न ही डिजिटल इंडिया के तहत दी जाने वाली ऑनलाइन सुविधाओं का लाभ ग्रामीणों को मिल पा रहा है।
जमीन और वन विभाग की बाधाएं
सिर्फ बजट ही एकमात्र समस्या नहीं है। निदेशालय स्तर की रिपोर्ट के अनुसार, कई पंचायतों में भवन निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि उपलब्ध नहीं है।
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भूमि विवाद: ग्रामीण क्षेत्रों में आपसी विवाद के कारण जमीन हस्तांतरण में देरी हो रही है।
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वन भूमि का पेंच: पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकांश प्रस्तावित भूमि वन विभाग के अधीन आती है, जिसके लिए FCA (वन संरक्षण अधिनियम) की अनुमतियां बड़ी बाधा बनी हुई हैं।
सरकार ने अब सभी जिलाधिकारियों से इन विवादित भूमियों की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है ताकि त्वरित समाधान निकाला जा सके।
अधिकारों का अधूरा हस्तांतरण: एक बड़ी चुनौती
पंचायत भवनों का निर्माण एक भौतिक बुनियादी ढांचा है, लेकिन लेख का एक महत्वपूर्ण पहलू पंचायतों का सशक्तीकरण भी है। संविधान के 73वें संशोधन की भावना के अनुरूप, पंचायतों को 29 विषयों पर पूर्ण नियंत्रण मिलना चाहिए था। हालांकि, उत्तराखंड में स्थिति यह है कि:
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कृषि, पशुपालन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विभाग आज भी नौकरशाही के पूर्ण नियंत्रण में हैं।
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पंचायतों को वित्तीय अधिकार तो दिए गए हैं, लेकिन प्रशासनिक निर्णय लेने की शक्ति अभी भी सीमित है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पंचायतों को स्वायत्त संस्था के रूप में विकसित नहीं किया जाएगा, तब तक केवल भवन निर्माण से ‘ग्राम स्वराज’ का सपना पूरा नहीं होगा।
विशेष सचिव का दृष्टिकोण
पंचायती राज विभाग के विशेष सचिव पराग मधुकर धकाते के अनुसार, “यह प्रस्ताव वित्त विभाग की मंजूरी के अंतिम चरण में है। बजट बढ़ने से न केवल भवन बनेंगे, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासनिक पारदर्शिता भी आएगी। हमारा लक्ष्य है कि हर पंचायत के पास अपना सुसज्जित सेवा केंद्र हो।“
विकास की नई नींव
पंचायतें लोकतंत्र की पाठशाला हैं। यदि उत्तराखंड सरकार इस प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाती है, तो यह राज्य के ग्रामीण विकास के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। बजट बढ़ने से निर्माण की गुणवत्ता सुधरेगी और ‘स्मार्ट विलेज’ की परिकल्पना को धरातल पर उतारा जा सकेगा।



