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कॉर्बेट की दहलीज पर धधक रहे जंगल: रामनगर के टिलमट मंदिर के पास भीषण आग, वन्यजीवों के अस्तित्व पर संकट

रामनगर: उत्तराखंड के जंगलों के लिए ‘फायर सीजन’ एक बार फिर अभिशाप बनकर लौटा है। विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिजर्व से सटे रामनगर वनप्रभाग के जंगलों में सोमवार को भीषण आग लग गई। टेढ़ा क्षेत्र के ऐतिहासिक टिलमट मंदिर के समीप भड़की इस आग ने कुछ ही घंटों में विकराल रूप धारण कर लिया, जिससे न केवल बेशकीमती वन संपदा खाक हो रही है, बल्कि वन्यजीवों के सुरक्षित ठिकानों पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

तपते पारा और शुष्क हवाओं के बीच लगी इस आग ने पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल पैदा कर दिया है। धुएं के गुबार कई किलोमीटर दूर से देखे जा रहे हैं, जो पर्यावरण के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं।

तेज हवाओं ने आग में डाला ‘घी’ का काम

जानकारी के अनुसार, सोमवार दोपहर रामनगर वनप्रभाग के अपर कोसी बीट के अंतर्गत टेढ़ा क्षेत्र में आग की पहली चिंगारी देखी गई। शुरुआत में आग एक सीमित दायरे में थी, जिसे स्थानीय स्तर पर बुझाने की कोशिश की गई, लेकिन चीड़ की सूखी पत्तियों और सूखी वनस्पति ने ईधन का काम किया। दोपहर बाद चली तेज हवाओं ने आग को कुछ ही मिनटों में पहाड़ी के बड़े हिस्से में फैला दिया।

टिलमट मंदिर के आसपास का यह क्षेत्र सघन वन क्षेत्र है, जो वन्यजीवों की आवाजाही के लिए जाना जाता है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि आग इतनी भयावह थी कि देखते ही देखते हरे-भरे पेड़ लपटों के घेरे में आ गए।

वन विभाग का ‘एक्शन मोड’: मौके पर डटी टीमें

घटना की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग ने तत्काल मोर्चा संभाल लिया है। रामनगर वनप्रभाग के एसडीओ (SDO) अंकित बडोला ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि सूचना मिलते ही फायर वॉचर्स और विभागीय टीम को अत्याधुनिक उपकरणों के साथ मौके पर रवाना किया गया।

“हमारी प्राथमिकता आग को रिहायशी इलाकों और कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की सीमा की ओर बढ़ने से रोकना है। विभागीय कर्मचारी दुर्गम परिस्थितियों के बावजूद आग बुझाने के प्रयास में जुटे हैं। वर्तमान में स्थिति पर कड़ी नजर रखी जा रही है और जल्द ही इस पर पूर्ण नियंत्रण पा लिया जाएगा।”अंकित बडोला, एसडीओ, रामनगर वनप्रभाग

वन्यजीवों और जैव विविधता को भारी क्षति की आशंका

रामनगर का यह क्षेत्र जैव विविधता के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील है। यहाँ बाघ, गुलदार, हाथी और हिरणों की खासी मौजूदगी रहती है। जंगल में लगी आग न केवल छोटे जीवों के घोंसलों और ठिकानों को नष्ट कर रही है, बल्कि बड़े वन्यजीवों को भी आबादी वाले क्षेत्रों की ओर पलायन करने पर मजबूर कर रही है। पर्यावरणविदों का मानना है कि इस तरह की आग से मिट्टी की उर्वरता और सूक्ष्म जीव भी नष्ट हो जाते हैं, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।

साजिश या लापरवाही? जांच के घेरे में ‘अज्ञात’

उत्तराखंड में हर साल लगने वाली आग के पीछे मानवीय गलतियां या जानबूझकर लगाई गई आग एक बड़ा कारण रही है। इस मामले में भी विभाग को आशंका है कि किसी शरारती तत्व या अज्ञात व्यक्ति द्वारा आग लगाई गई हो सकती है। एसडीओ अंकित बडोला ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए कहा कि आग लगने के कारणों की गहनता से जांच की जा रही है।

उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि जांच में किसी की संलिप्तता पाई जाती है, तो भारतीय वन अधिनियम की धाराओं के तहत कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

बढ़ती चुनौतियां और भविष्य की तैयारी

फरवरी से जून तक चलने वाला फायर सीजन उत्तराखंड वन विभाग के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता। बढ़ते तापमान और कम बारिश के कारण जंगल ‘बारूद के ढेर’ में तब्दील हो जाते हैं। रामनगर वनप्रभाग जंगल की आग जैसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या हमारे सुरक्षा इंतजाम पर्याप्त हैं?

हालांकि, विभाग ने इस बार स्थानीय समुदायों को जोड़ने और सैटेलाइट मॉनिटरिंग के माध्यम से त्वरित रिस्पांस देने का दावा किया है, लेकिन धरातल पर संसाधन और जनशक्ति की कमी अक्सर आड़े आती है।

जनभागीदारी की आवश्यकता

जंगलों को आग से बचाना केवल विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक नागरिक कर्तव्य भी है। रामनगर के टेढ़ा क्षेत्र में लगी यह आग हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के प्रति हमारी थोड़ी सी लापरवाही कितने बड़े विनाश का कारण बन सकती है। फिलहाल, सभी की निगाहें वन विभाग के प्रयासों पर टिकी हैं ताकि इस ‘दावानल’ को शांत कर देवभूमि के फेफड़ों को बचाया जा सके।

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