By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
The Hill IndiaThe Hill IndiaThe Hill India
Notification Show More
Font ResizerAa
  • होम
  • फीचर्ड
  • उत्तराखंड
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • पर्यावरण
  • क्राइम
  • पर्यटन
  • शिक्षा
  • स्वास्थय
  • सामाजिक
  • स्पोर्ट्स
  • वीडियो
  • Contact Us
Reading: पहाड़ के गर्म पानी से बनेगी बिजली! जियोथर्मल ऊर्जा पर उत्तराखंड का बड़ा फोकस, लद्दाख और आइसलैंड जाएगी विशेषज्ञों की टीम
Share
Font ResizerAa
The Hill IndiaThe Hill India
  • होम
  • फीचर्ड
  • उत्तराखंड
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • पर्यावरण
  • क्राइम
  • पर्यटन
  • शिक्षा
  • स्वास्थय
  • सामाजिक
  • स्पोर्ट्स
  • वीडियो
  • Contact Us
Search
  • होम
  • फीचर्ड
  • उत्तराखंड
  • देश
  • विदेश
  • राजनीति
  • पर्यावरण
  • क्राइम
  • पर्यटन
  • शिक्षा
  • स्वास्थय
  • सामाजिक
  • स्पोर्ट्स
  • वीडियो
  • Contact Us
Have an existing account? Sign In
Follow US
The Hill India > Blog > उत्तराखंड > पहाड़ के गर्म पानी से बनेगी बिजली! जियोथर्मल ऊर्जा पर उत्तराखंड का बड़ा फोकस, लद्दाख और आइसलैंड जाएगी विशेषज्ञों की टीम
उत्तराखंडफीचर्ड

पहाड़ के गर्म पानी से बनेगी बिजली! जियोथर्मल ऊर्जा पर उत्तराखंड का बड़ा फोकस, लद्दाख और आइसलैंड जाएगी विशेषज्ञों की टीम

The Hill India News
Last updated: September 21, 2026 10:06 am
The Hill India News
Published: September 21, 2026
Share
SHARE

देहरादून। उत्तराखंड अब पहाड़ों के भीतर छिपी प्राकृतिक गर्मी को ऊर्जा के नए स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद जियोथर्मल यानी भूतापीय स्प्रिंग्स को बिजली उत्पादन और अन्य उपयोगों से जोड़ने की तैयारी तेज हो गई है। इसी कड़ी में उत्तराखंड ऊर्जा विभाग अपने तकनीकी अधिकारियों और कर्मचारियों को लद्दाख के पूगा क्षेत्र तथा आइसलैंड भेजने की तैयारी कर रहा है, ताकि वहां जियोथर्मल ऊर्जा के इस्तेमाल, तकनीक, ड्रिलिंग और परियोजना संचालन का व्यावहारिक अनुभव हासिल किया जा सके।

Contents
तपोवन बना उम्मीद का बड़ा केंद्र1970 में भी तपोवन पर हुई थी ड्रिलिंगउत्तराखंड में करीब 40 जियोथर्मल स्प्रिंग्सलद्दाख के पूगा से सीखने की तैयारीआइसलैंड से सीखेगा उत्तराखंडसिर्फ बिजली नहीं, कई क्षेत्रों में हो सकता है इस्तेमाल2025 में लागू हुई भूतापीय ऊर्जा नीतिसरकार और निजी क्षेत्र के लिए भी रास्ता50 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता का प्रावधान30 साल तक परियोजना आवंटनयूजेवीएनएल की भूमिका महत्वपूर्णवाडिया इंस्टीट्यूट की विशेषज्ञ भूमिकाहर गर्म पानी का स्रोत बिजलीघर नहीं बन सकतापर्यावरण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण पहलऊर्जा सुरक्षा की दिशा में नया विकल्पअब अगले कदम पर नजरपहाड़ों के भीतर छिपी गर्मी से ऊर्जा की नई कहानी?

राज्य में जियोथर्मल ऊर्जा को लेकर यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड के पहाड़ी और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से गर्म पानी के कई स्रोत मौजूद हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों के अनुसार राज्य में करीब 40 जियोथर्मल स्प्रिंग्स चिन्हित किए जा चुके हैं। इनमें लगभग 20 गढ़वाल और 20 कुमाऊं क्षेत्र में बताए गए हैं। वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि उच्च हिमालय में ऐसे अन्य स्रोत भी हो सकते हैं, जिन्हें अभी पूरी तरह चिन्हित नहीं किया गया है।

तपोवन बना उम्मीद का बड़ा केंद्र

उत्तराखंड में जियोथर्मल ऊर्जा की संभावनाओं को जमीन पर परखने के लिए तपोवन क्षेत्र को महत्वपूर्ण साइट के रूप में देखा जा रहा है। यहां जियोथर्मल स्प्रिंग को लेकर प्री-फिजिबिलिटी अध्ययन किया जा चुका है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार परीक्षण में साइट को आगे की खोजी गतिविधियों के लिए उपयुक्त पाया गया है।

ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम के अनुसार जियोथर्मल ऊर्जा को लेकर एक वर्किंग ग्रुप बनाया गया है, जिसमें ओएनजीसी और वाडिया इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाएगा। तपोवन साइट पर प्री-फिजिबिलिटी परीक्षण के बाद अब एक्सप्लोरेटरी ड्रिलिंग की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी है।

इसका मतलब यह है कि उत्तराखंड अब केवल गर्म पानी के प्राकृतिक स्रोतों की पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैज्ञानिक तरीके से यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि इन स्रोतों से व्यावसायिक स्तर पर ऊर्जा उत्पादन की कितनी संभावना है।

1970 में भी तपोवन पर हुई थी ड्रिलिंग

तपोवन की कहानी नई नहीं है। वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के अनुसार इस क्षेत्र में जियोथर्मल संसाधन को लेकर शुरुआती वैज्ञानिक अध्ययन कई दशक पहले किया जा चुका था।

वैज्ञानिक डॉ. समीर कुमार तिवारी के अनुसार जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने वर्ष 1970 में तपोवन क्षेत्र के जियोथर्मल स्रोत का अध्ययन किया था। उस समय करीब 400 मीटर तक ड्रिलिंग की गई थी और पानी का तापमान लगभग 89 से 90 डिग्री सेल्सियस पाया गया था।

उस दौर में तकनीकी सीमाएं बड़ी चुनौती थीं। कम तापमान वाले जियोथर्मल स्रोतों से बिजली उत्पादन के लिए आज उपलब्ध आधुनिक तकनीक उस समय व्यापक रूप से विकसित नहीं थी। खासकर बाइनरी साइकल जैसी तकनीक, जो अपेक्षाकृत कम तापमान वाले जियोथर्मल संसाधनों से भी बिजली पैदा करने में मदद कर सकती है, उस समय व्यावहारिक विकल्प के रूप में उपलब्ध नहीं थी।

यही कारण है कि दशकों पहले पहचानी गई संभावना अब नई तकनीक और बेहतर वैज्ञानिक समझ के साथ दोबारा चर्चा में आ रही है।

उत्तराखंड में करीब 40 जियोथर्मल स्प्रिंग्स

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तराखंड में लगभग 40 जियोथर्मल स्प्रिंग्स चिन्हित हैं। इनमें गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों की हिस्सेदारी बताई जाती है।

इन प्राकृतिक स्रोतों से निकलने वाला गर्म पानी धरती के भीतर मौजूद गर्म चट्टानों और भूगर्भीय प्रक्रियाओं का परिणाम होता है। जहां तापमान और जल प्रवाह पर्याप्त हो, वहां इस गर्मी का इस्तेमाल केवल बिजली उत्पादन में ही नहीं, बल्कि हीटिंग, कूलिंग, ग्रीनहाउस, पर्यटन, स्नान और कुछ औद्योगिक गतिविधियों में भी किया जा सकता है।

हालांकि हर जियोथर्मल स्प्रिंग से बिजली बनाना संभव हो, यह जरूरी नहीं है। किसी परियोजना की व्यवहार्यता के लिए तापमान, पानी की उपलब्धता, दबाव, जल की रासायनिक संरचना, भौगोलिक स्थिति, ड्रिलिंग की लागत और ग्रिड से कनेक्टिविटी जैसे कई पहलुओं का वैज्ञानिक अध्ययन करना पड़ता है।

इसीलिए उत्तराखंड सरकार अब पहले अध्ययन, फिर खोजी ड्रिलिंग और उसके बाद संभावित परियोजना विकास की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है।

लद्दाख के पूगा से सीखने की तैयारी

उत्तराखंड के लिए जियोथर्मल ऊर्जा अभी अपेक्षाकृत नया क्षेत्र है। इसी वजह से राज्य ऊर्जा विभाग अपने कर्मचारियों और तकनीकी टीम को उन स्थानों पर भेजना चाहता है जहां इस तकनीक पर पहले से काम हो रहा है।

लद्दाख का पूगा क्षेत्र इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पूगा में जियोथर्मल संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर अध्ययन और परियोजना संबंधी गतिविधियां लंबे समय से चल रही हैं। उत्तराखंड की तकनीकी टीम वहां जाकर जियोथर्मल स्रोतों की पहचान, ड्रिलिंग, तापमान मूल्यांकन, उपकरणों के इस्तेमाल और परियोजना संचालन से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी हासिल कर सकती है।

ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव के अनुसार अक्टूबर के बाद उत्तराखंड की एक तकनीकी टीम लद्दाख साइट का अध्ययन करने के लिए भेजी जा सकती है।

यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी नई तकनीक को केवल कागजों पर समझने के बजाय उस जगह जाकर देखना जहां वास्तविक परियोजना पर काम हो रहा हो, इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों को ज्यादा व्यावहारिक अनुभव दे सकता है।

आइसलैंड से सीखेगा उत्तराखंड

लद्दाख के अलावा उत्तराखंड की नजर आइसलैंड पर भी है। दुनिया में जियोथर्मल ऊर्जा के व्यावहारिक इस्तेमाल के लिए आइसलैंड को प्रमुख उदाहरणों में गिना जाता है।

आइसलैंड में भूगर्भीय गतिविधियों के कारण बड़े पैमाने पर जियोथर्मल संसाधन उपलब्ध हैं। वहां गर्म पानी और भू-तापीय ऊर्जा का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के साथ-साथ घरों को गर्म रखने और अन्य उपयोगों में भी किया जाता है।

उत्तराखंड सरकार की योजना है कि ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े कुछ कर्मचारियों को आइसलैंड भेजकर वहां की तकनीक, परियोजना प्रबंधन, ड्रिलिंग, संसाधन मूल्यांकन और जियोथर्मल ऊर्जा के व्यावहारिक उपयोग का प्रशिक्षण दिया जाए।

ऊर्जा विभाग का मानना है कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में विदेशी अनुभव को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाने से नई परियोजनाओं को विकसित करने में मदद मिल सकती है।

सिर्फ बिजली नहीं, कई क्षेत्रों में हो सकता है इस्तेमाल

जियोथर्मल ऊर्जा का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि इसका उपयोग केवल बिजली बनाने तक सीमित नहीं है।

यदि किसी क्षेत्र में पर्याप्त तापमान वाला जियोथर्मल जल उपलब्ध है तो उसका उपयोग सीधे हीटिंग में किया जा सकता है। पर्यटन क्षेत्रों में गर्म पानी के स्नान और स्पा जैसी गतिविधियों में इसका इस्तेमाल संभव है। ठंडे पहाड़ी क्षेत्रों में भवनों को गर्म रखने की व्यवस्था में भी भू-तापीय ऊर्जा उपयोगी हो सकती है।

इसके अलावा ग्रीनहाउस खेती, कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं और वाटर ट्रीटमेंट जैसी गतिविधियों में भी इसके इस्तेमाल की संभावनाएं देखी जाती हैं।

उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए यह क्षेत्र भविष्य में ऊर्जा के साथ-साथ स्थानीय आर्थिक गतिविधियों का भी नया आधार बन सकता है।

2025 में लागू हुई भूतापीय ऊर्जा नीति

उत्तराखंड सरकार ने जियोथर्मल संसाधनों को व्यवस्थित तरीके से विकसित करने के लिए उत्तराखंड भूतापीय ऊर्जा नीति-2025 को मंजूरी दी है। इस नीति का उद्देश्य राज्य में उपलब्ध भूतापीय संसाधनों की पहचान, वैज्ञानिक अनुसंधान, अन्वेषण और उनके आर्थिक एवं पर्यावरणीय उपयोग को बढ़ावा देना है।

नीति के तहत जियोथर्मल संसाधनों का उपयोग बिजली उत्पादन के अलावा हीटिंग और कूलिंग सिस्टम, जल उपचार और सामुदायिक विकास जैसे क्षेत्रों में करने पर भी जोर दिया गया है।

नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना भी है। उत्तराखंड में जलविद्युत की बड़ी क्षमता है, लेकिन जियोथर्मल ऊर्जा को एक अतिरिक्त स्रोत के रूप में विकसित करने से भविष्य में ऊर्जा व्यवस्था को और विविध बनाया जा सकता है।

सरकार और निजी क्षेत्र के लिए भी रास्ता

जियोथर्मल नीति में परियोजनाओं के विकास के लिए सरकारी संस्थानों और निजी कंपनियों की भागीदारी का प्रावधान किया गया है।

नीति के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को नामांकन के आधार पर और निजी कंपनियों को प्रतिस्पर्धी बोली की प्रक्रिया के जरिए परियोजनाएं आवंटित करने का प्रावधान रखा गया है। अन्वेषण और विकास के लिए डेवलपर का चयन EOI यानी Expression of Interest के माध्यम से किए जाने की व्यवस्था भी नीति में बताई गई है।

डेवलपर को आवंटन के बाद निर्धारित समय में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करनी होगी। परियोजनाओं को तय समय सीमा के भीतर शुरू करना होगा और निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा।

इससे सरकार का उद्देश्य यह है कि जियोथर्मल संसाधनों का इस्तेमाल केवल सरकारी अध्ययन तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार्य परियोजनाओं को वास्तविक उत्पादन तक ले जाया जा सके।

50 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता का प्रावधान

जियोथर्मल परियोजनाओं में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक शुरुआती अन्वेषण की लागत होती है। किसी स्थान पर गर्म पानी दिखाई देने मात्र से यह साबित नहीं होता कि वहां व्यावसायिक स्तर पर बिजली उत्पादन किया जा सकता है।

इसके लिए भूगर्भीय अध्ययन, तापमान मापन, ड्रिलिंग, जल रसायन का अध्ययन और अन्य तकनीकी परीक्षण जरूरी होते हैं।

उत्तराखंड की जियोथर्मल नीति में अन्वेषण और रिकॉनिसेंस सर्वे के लिए 50 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता का प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य शुरुआती चरण में आने वाली वित्तीय बाधाओं को कम करना है।

इसके अलावा सिंगल विंडो व्यवस्था के तहत अनुमति प्रक्रिया को समयबद्ध करने और परियोजनाओं को निर्धारित अवधि में शुरू करने की व्यवस्था भी नीति में शामिल है।

30 साल तक परियोजना आवंटन

नीति में जियोथर्मल परियोजनाओं के लिए लंबी अवधि का प्रावधान भी रखा गया है। परियोजनाओं का आवंटन 30 साल तक के लिए किए जाने की व्यवस्था बताई गई है।

परियोजना शुरू होने के बाद अलग-अलग चरणों में निरीक्षण का भी प्रावधान रखा गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परियोजना तय शर्तों के अनुसार संचालित हो रही है या नहीं और प्राकृतिक संसाधन का इस्तेमाल निर्धारित मानकों के अनुरूप किया जा रहा है।

जियोथर्मल ऊर्जा में पर्यावरणीय पहलू भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसलिए परियोजनाओं को केंद्रीय और राज्य कानूनों, पर्यावरणीय नियमों और अन्य लागू प्रावधानों का पालन करना होगा।

यूजेवीएनएल की भूमिका महत्वपूर्ण

उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड यानी यूजेवीएनएल को तपोवन साइट पर आगे की खोजी ड्रिलिंग की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।

यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव है। यूजेवीएनएल का अनुभव मुख्य रूप से जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ा रहा है, जबकि जियोथर्मल ऊर्जा एक अलग तकनीकी क्षेत्र है।

इसीलिए ऊर्जा विभाग अपने कर्मचारियों को लद्दाख और आइसलैंड भेजकर नई तकनीक से परिचित कराना चाहता है। विभाग का मानना है कि भविष्य में जियोथर्मल परियोजनाओं के विकास के लिए तकनीकी क्षमता तैयार करना जरूरी होगा।

वाडिया इंस्टीट्यूट की विशेषज्ञ भूमिका

उत्तराखंड में जियोथर्मल ऊर्जा की संभावनाओं को समझने में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की भूमिका महत्वपूर्ण है।

संस्थान के वैज्ञानिकों ने राज्य में मौजूद जियोथर्मल स्रोतों की पहचान और उनके वैज्ञानिक अध्ययन में योगदान दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर भारत में पाए जाने वाले कई जियोथर्मल स्रोत अपेक्षाकृत उथले स्रोतों की श्रेणी में आते हैं, जबकि अलग-अलग क्षेत्रों में संसाधनों की प्रकृति और तापमान में अंतर हो सकता है।

इसलिए प्रत्येक साइट का अलग वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।

हर गर्म पानी का स्रोत बिजलीघर नहीं बन सकता

जियोथर्मल ऊर्जा को लेकर सबसे जरूरी बात यह समझना है कि किसी गर्म पानी के स्रोत को देखकर सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वहां बिजलीघर लगाया जा सकता है।

बिजली उत्पादन के लिए तापमान और जल प्रवाह दोनों का पर्याप्त होना जरूरी है। इसके अलावा गर्म पानी को सतह तक लाने के लिए ड्रिलिंग कितनी गहरी होगी, चट्टानों की संरचना कैसी है, पानी में मौजूद खनिज और गैसें किस प्रकार की हैं तथा परियोजना को ग्रिड तक जोड़ने की लागत कितनी होगी—इन सभी सवालों के जवाब जरूरी हैं।

इसी वजह से तपोवन में आगे होने वाली एक्सप्लोरेटरी ड्रिलिंग बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे जमीन के नीचे उपलब्ध संसाधन की वास्तविक स्थिति का बेहतर आकलन किया जा सकेगा।

पर्यावरण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण पहल

जियोथर्मल ऊर्जा को आम तौर पर कम-कार्बन ऊर्जा स्रोतों में गिना जाता है। इसका इस्तेमाल जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है।

उत्तराखंड जैसे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील राज्य में किसी भी नई ऊर्जा परियोजना के लिए पर्यावरणीय प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी होगा। खासकर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सड़क, ड्रिलिंग, पाइपलाइन, बिजली ट्रांसमिशन और निर्माण से जुड़े कार्यों की योजना बेहद सावधानी से बनानी होगी।

इसलिए जियोथर्मल ऊर्जा की संभावनाओं के साथ-साथ पर्यावरणीय सुरक्षा भी इस पूरी पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।

ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में नया विकल्प

उत्तराखंड में जलविद्युत ऊर्जा का बड़ा आधार है। इसके बावजूद ऊर्जा की बढ़ती जरूरत और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के बीच ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण महत्वपूर्ण हो जाता है।

जियोथर्मल ऊर्जा इसी दिशा में एक संभावित विकल्प बन सकती है। इसका फायदा यह है कि जहां संसाधन उपलब्ध हो और तकनीकी रूप से परियोजना व्यवहार्य हो, वहां यह मौसम पर उसी तरह निर्भर नहीं रहती जैसे सौर या पवन ऊर्जा निर्भर करती है।

हालांकि, उत्तराखंड में इसकी वास्तविक क्षमता का पता व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन और खोजी ड्रिलिंग के बाद ही चलेगा।

अब अगले कदम पर नजर

फिलहाल उत्तराखंड की जियोथर्मल ऊर्जा योजना कई चरणों में आगे बढ़ रही है। एक तरफ तपोवन में एक्सप्लोरेटरी ड्रिलिंग की तैयारी है, दूसरी तरफ ऊर्जा विभाग अपने कर्मचारियों को लद्दाख में चल रहे कार्यों का अध्ययन कराने की योजना बना रहा है। इसके साथ ही आइसलैंड में प्रशिक्षण की तैयारी भी की जा रही है।

वहीं, जियोथर्मल ऊर्जा को लेकर गठित वर्किंग ग्रुप की बैठक भी महत्वपूर्ण होगी। इसमें ऊर्जा विभाग के साथ ओएनजीसी और वाडिया इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल होंगे।

इस बैठक में आगे की रणनीति, तकनीकी अध्ययन, परियोजना विकास और प्रशिक्षण जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है।

पहाड़ों के भीतर छिपी गर्मी से ऊर्जा की नई कहानी?

उत्तराखंड के लिए जियोथर्मल ऊर्जा अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन राज्य के पास एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक आधार जरूर मौजूद है। दर्जनों गर्म पानी के स्रोत, तपोवन जैसे संभावित क्षेत्र, जियोथर्मल नीति और नई तकनीक सीखने की तैयारी—इन सभी को मिलाकर सरकार अब इस क्षेत्र को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

अगर वैज्ञानिक अध्ययन और एक्सप्लोरेटरी ड्रिलिंग के परिणाम उम्मीद के मुताबिक रहे और परियोजनाएं तकनीकी व आर्थिक रूप से व्यवहार्य साबित हुईं, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के ऊर्जा मानचित्र में एक नया अध्याय जुड़ सकता है।

लद्दाख से तकनीकी अनुभव और आइसलैंड से अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता हासिल करने की कोशिश इसी तैयारी का हिस्सा है। हालांकि अभी इसे बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन की उपलब्धि के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। फिलहाल राज्य संसाधन की पहचान, वैज्ञानिक परीक्षण, तकनीकी क्षमता निर्माण और परियोजना व्यवहार्यता के चरण में है।

लेकिन अगर तपोवन और अन्य संभावित साइटों पर अध्ययन सफल रहा, तो हिमालय की धरती के भीतर मौजूद प्राकृतिक गर्मी भविष्य में उत्तराखंड की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में एक नया योगदान दे सकती है।

यानी जिस गर्म पानी को पहाड़ों में अब तक मुख्य रूप से प्राकृतिक आश्चर्य, धार्मिक महत्व या पर्यटन से जोड़कर देखा जाता रहा है, वही गर्म पानी आने वाले समय में उत्तराखंड के लिए स्वच्छ ऊर्जा का संभावित स्रोत भी बन सकता है। अब नजर तपोवन की एक्सप्लोरेटरी ड्रिलिंग, लद्दाख की स्टडी और आइसलैंड से मिलने वाले तकनीकी अनुभव पर है।

You Might Also Like

गुजरात: केन्द्रीय मंत्री श्री अमित शाह ने गांधीनगर में शहरी विकास प्राधिकरण और महानगर पालिका के 274 करोड़ रूपयों की लागत के अनेक विकास कार्यों का शिलान्यास और लोकार्पण किया
दिल्ली-UP समेत उत्तर भारत में फिर बढ़ेगा तापमान, आंधी-बारिश बेअसर; लू का खतरा बढ़ा
कश्मीर में फिर बढ़ी दहशत! सैकड़ों कश्मीरी पंडित कर्मचारी छुट्टी पर भेजे गए, 3 हजार से ज्यादा संदिग्ध हिरासत में; क्या घाटी में फिर सक्रिय हो रहा आतंकी नेटवर्क?
उत्तराखण्ड : बजट सत्र से पहले कल होगी कैबिनेट की बैठक, सख्त भू-कानून समेत कई प्रस्तावों पर लगेगी मुहर
CM ने 10वीं 12वीं के छात्रों को किया सम्मानित, जीवन में कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं
TAGGED:Clean EnergyGeothermal EnergyIcelandLadakhUttarakhand
Share This Article
Facebook Email Print
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Follow US

Find US on Social Medias
FacebookLike
XFollow
YoutubeSubscribe
TelegramFollow
Popular News
उत्तराखंडफीचर्डराजनीति

देहरादून छात्रसंघ चुनाव में NSUI का बड़ा ऐलान, DAV से सौरभ सेमवाल और DBS से अभिनव कफलिया को टिकट; छात्र मुद्दों पर रहेगा फोकस

The Hill India News
The Hill India News
September 21, 2026
पहाड़ के गर्म पानी से बनेगी बिजली! जियोथर्मल ऊर्जा पर उत्तराखंड का बड़ा फोकस, लद्दाख और आइसलैंड जाएगी विशेषज्ञों की टीम
GST कार्रवाई के विरोध में हरिद्वार में व्यापारियों का बड़ा प्रदर्शन, दुकानें बंद कर निकाला विरोध मार्च; चाबियां सौंपने और बड़े आंदोलन की चेतावनी
जापान की टीम में ‘बिहारी बाबू’ अभिषेक आनंद! IIT कानपुर से पढ़ाई, जापान में नौकरी और फिर नेशनल क्रिकेट टीम तक पहुंचने की कहानी
श्रद्धा भक्ति आश्रम हत्याकांड में STF की बड़ी कार्रवाई, 50 हजार का इनामी आरोपी बागपत से गिरफ्तार
उत्तराखंड लौटे हरीश रावत तो गरमाई सियासत, भाजपा ने रोड शो पर साधा निशाना; ‘राजनीतिक ड्रामा’ बताकर उठाए सवाल
इमरान खान की तीनों बहनें हिरासत में, 30 दिन के लिए जेल भेजने का आदेश; 27 सितंबर के PTI मार्च से पहले पाकिस्तान में बढ़ा तनाव
देहरादून में पति ने पत्नी को मारी गोली, फिर पुलिस को खुद दी हत्या की सूचना और हुआ फरार; तलाश में जुटीं पुलिस की टीमें
गिरफ्तारी करते समय अब नहीं चलेगी सिर्फ मौखिक जानकारी! लिखित में बताना होगा आधार, PMLA-UAPA मामलों पर भी लागू संवैधानिक सुरक्षा
MBBS काउंसलिंग में अब प्रशासनिक अधिकारी की भी रहेगी नजर, फर्जी दस्तावेजों पर रोक के लिए उत्तराखंड सरकार का बड़ा कदम
© The Hill India. All Rights Reserved | Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?