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उत्तराखंड में नए जिलों के गठन की गूँज: ‘जिला बनाओ संघर्ष समिति’ ने सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा, 11 नए जनपदों की उठी मांग

The Hill India News
Last updated: April 6, 2026 2:27 am
The Hill India News
Published: April 6, 2026
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Photo: Prakash Dabral
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देहरादून (ब्यूरो): उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों और प्रशासनिक जटिलताओं के बीच एक बार फिर ‘नए जिलों’ की मांग ने सियासी और सामाजिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। उत्तराखंड नए जिलों का गठन करने की वकालत करते हुए ‘जिला बनाओ संघर्ष समिति’ ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। राजधानी देहरादून में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में समिति ने दो टूक शब्दों में सरकार को चेतावनी दी है कि यदि जनता की भावनाओं के अनुरूप नए जिलों की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई, तो प्रदेश व्यापी उग्र आंदोलन छेड़ा जाएगा।

Contents
विकास की राह में ‘प्रशासनिक दूरी’ बनी बाधाइन 11 क्षेत्रों को ‘जिला’ बनाने का प्रस्तावपलायन और बेरोजगारी पर ‘प्रहार’ की रणनीतिप्रशासनिक ढांचा: छोटे जिले, बड़ा लाभआंदोलन की चेतावनी: सरकार की बढ़ेगी मुश्किल?

विकास की राह में ‘प्रशासनिक दूरी’ बनी बाधा

समिति के संयोजक प्रकाश कुमार डबराल ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य की स्थापना के 24 वर्षों बाद भी कई दूरस्थ क्षेत्र आज भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर हैं। उन्होंने तर्क दिया कि उत्तराखंड नए जिलों का गठन केवल एक राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि राज्य के समग्र विकास, पलायन रोकने और स्थानीय युवाओं को रोजगार से जोड़ने की एक अनिवार्य आवश्यकता है।

डबराल के अनुसार, “पहाड़ी राज्यों में छोटी प्रशासनिक इकाइयां ही बेहतर सुशासन की कुंजी हैं। जब तक जिला मुख्यालय आम आदमी की पहुंच में नहीं होगा, तब तक सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक नहीं पहुंच सकता।”

इन 11 क्षेत्रों को ‘जिला’ बनाने का प्रस्ताव

संघर्ष समिति ने राज्य के मौजूदा स्वरूप को देखते हुए 11 नए जिलों का खाका तैयार किया है। प्रस्तावित जिलों की सूची में प्रदेश के लगभग सभी बड़े जनपदों के दूरस्थ क्षेत्रों को शामिल किया गया है:

  • गढ़वाल मंडल: उत्तरकाशी से पुरोला-नौगांव-मोरी क्षेत्र, टिहरी से नरेंद्र नगर व प्रतापनगर, पौड़ी से कोटद्वार व बीरोंखाल, चमोली से गैरसैंण, देहरादून से विकासनगर व चकराता और हरिद्वार से रुड़की।

  • कुमाऊं मंडल: अल्मोड़ा से रानीखेत, पिथौरागढ़ से डीडीहाट, नैनीताल से हल्द्वानी व रामनगर और उधमसिंहनगर से काशीपुर-गदरपुर-बाजपुर क्षेत्र।

समिति का मानना है कि इन क्षेत्रों को जिला घोषित करने से न केवल प्रशासनिक कार्यकुशलता बढ़ेगी, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान को भी मजबूती प्रदान करेगा।

पलायन और बेरोजगारी पर ‘प्रहार’ की रणनीति

उत्तराखंड के लिए ‘पलायन’ एक नासूर बन चुका है। समिति का दावा है कि उत्तराखंड नए जिलों का गठन होने से इन नए केंद्रों पर सरकारी दफ्तर, शिक्षण संस्थान और स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित होंगी। इससे न केवल बुनियादी ढांचे में सुधार होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर हजारों युवाओं के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

“जब जिला मुख्यालय पास होगा, तो आपदा प्रबंधन की मशीनरी अधिक सक्रिय होगी। वर्तमान में, आपदा के समय दूरस्थ गांवों तक राहत पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। नए जिले बनने से भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगी क्योंकि जनता का अपने प्रतिनिधियों और अधिकारियों पर सीधा नियंत्रण होगा।” — प्रकाश कुमार डबराल, संयोजक


प्रशासनिक ढांचा: छोटे जिले, बड़ा लाभ

विशेषज्ञों का भी मानना है कि छोटे जिलों के गठन से कानून व्यवस्था और राजस्व संग्रह में सुधार होता है। उत्तराखंड जैसे आपदा संवेदनशील राज्य में, छोटे जिलों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। समिति ने सरकार से मांग की है कि वह बिना किसी विलंब के एक उच्च स्तरीय आयोग का गठन करे जो इन प्रस्तावित जिलों की सीमाओं और संसाधनों का आंकलन कर अपनी रिपोर्ट सौंपे।

आंदोलन की चेतावनी: सरकार की बढ़ेगी मुश्किल?

समिति ने स्पष्ट किया है कि वे अब केवल ज्ञापन देने तक सीमित नहीं रहेंगे। आने वाले दिनों में प्रदेश के हर तहसील और ब्लॉक स्तर पर जन-जागरण अभियान चलाया जाएगा। महिलाओं और युवाओं को इस मुहिम से जोड़कर सरकार पर दबाव बनाया जाएगा। समिति के पदाधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस संवेदनशील विषय पर चुप्पी नहीं तोड़ी, तो देहरादून की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ेगा जिसकी जिम्मेदारी शासन की होगी।

उत्तराखंड में नए जिलों का मुद्दा दशकों पुराना है। पूर्ववर्ती सरकारों ने भी समय-समय पर इस पर आश्वासन दिए, लेकिन धरातल पर अब तक कुछ खास नहीं हो पाया है। उत्तराखंड नए जिलों का गठन अब केवल प्रशासनिक सुधार का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह जनभावनाओं से जुड़ चुका है। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार इस दिशा में कोई क्रांतिकारी कदम उठाती है या फिर यह मांग एक बार फिर फाइलों में दबकर रह जाएगी।

जनता की नजरें अब आगामी कैबिनेट बैठकों और सरकार के रुख पर टिकी हैं। फिलहाल, जिला बनाओ संघर्ष समिति के तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि यह लड़ाई अब लंबी चलने वाली है।

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