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Reading: ‘ऐसे मुकदमे दायर कर न्यायपालिका को नीचा न दिखाएं’: सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर लगाया ₹1 लाख का जुर्माना
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The Hill India > Blog > देश > ‘ऐसे मुकदमे दायर कर न्यायपालिका को नीचा न दिखाएं’: सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर लगाया ₹1 लाख का जुर्माना
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‘ऐसे मुकदमे दायर कर न्यायपालिका को नीचा न दिखाएं’: सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर लगाया ₹1 लाख का जुर्माना

The Hill India News
Last updated: December 12, 2025 12:26 pm
The Hill India News
Published: December 12, 2025
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नई दिल्ली, 12 दिसंबर: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अपनी ही एक पूर्ववर्ती संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर कड़ी नाराजगी जताते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि न्यायिक संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले मुकदमे बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।

Contents
क्या थी याचिका?पीठ की सख्त टिप्पणी: न्यायालय की अवमानना जैसा व्यवहार न करेंअल्पसंख्यक संस्थानों पर सुप्रीम कोर्ट का पुराना रुख₹1 लाख का जुर्माना—एक कठोर लेकिन स्पष्ट संदेशनिष्कर्ष

अल्पसंख्यक विद्यालयों को शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के कुछ प्रावधानों से मिली छूट को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा—

“ऐसे निराधार मुकदमे दायर कर न्यायपालिका को नीचा न दिखाएं।”

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने याचिका को पूरी तरह निराधार बताते हुए इसे खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया। अदालत ने कहा कि यह दंड सिर्फ एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि उन सभी के लिए संदेश है जो न्यायपालिका की स्थापित संवैधानिक व्याख्याओं को बिना आधार चुनौती देने का प्रयास करते हैं।


क्या थी याचिका?

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि वह अल्पसंख्यक संस्थानों को RTE अधिनियम के तहत मिली वह छूट खत्म करे, जिसके तहत उन्हें 25% आरक्षण के आधार पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों को अनिवार्य रूप से प्रवेश देने की बाध्यता से मुक्त किया गया था।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह प्रावधान ‘‘समानता’’ के अधिकार का उल्लंघन करता है और सभी शिक्षण संस्थानों पर एक समान नियम लागू होना चाहिए।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपने ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट कर चुका है कि भारत के अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता संविधान के अनुच्छेद 30 द्वारा संरक्षित है, और उन पर ऐसी बाध्यता लागू करना संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ होगा।


पीठ की सख्त टिप्पणी: न्यायालय की अवमानना जैसा व्यवहार न करें

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने दो टूक कहा कि—

“कोर्ट की पूर्व संवैधानिक व्याख्याओं को चुनौती देना न्यायिक समय की बर्बादी है। ऐसे प्रयास न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित करते हैं।”

पीठ ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति बिना कानूनी आधार के, सिर्फ चर्चा या भ्रम पैदा करने के उद्देश्य से याचिका दायर करेगा, तो उसे सख्त दंड झेलना पड़ेगा।

अदालत ने टिप्पणी की कि इस तरह की याचिकाएँ न केवल न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालती हैं, बल्कि अन्य वास्तविक और जनहित से जुड़े मामलों की सुनवाई को प्रभावित करती हैं।


अल्पसंख्यक संस्थानों पर सुप्रीम कोर्ट का पुराना रुख

सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि—

  • अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने प्रबंधन, प्रवेश, और प्रशासनिक निर्णय लेने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
  • RTE Act के प्रावधान, विशेषकर 12(1)(c) के तहत 25% आरक्षण, अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं होता।
  • यह छूट संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक और भाषाई स्वतंत्रता के संरक्षण के अनुरूप है।

यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को ‘‘बिना किसी संवैधानिक या कानूनी आधार’’ वाला करार दिया।


₹1 लाख का जुर्माना—एक कठोर लेकिन स्पष्ट संदेश

अदालत ने याचिकाकर्ता पर लगाया गया ₹1 लाख का दंड इस बात का प्रतीक बताया कि न्यायपालिका अपनी गरिमा और स्थापित सिद्धांतों से खिलवाड़ की अनुमति नहीं देगी।

जस्टिस महादेवन ने कहा—

“यह दंड सिर्फ इस मामले के लिए नहीं है, बल्कि ऐसे सभी लोगों के लिए चेतावनी है जो न्यायालयों के संवैधानिक फैसलों को हल्के में लेने की कोशिश करते हैं।”


निष्कर्ष

इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र और संवैधानिक व्याख्याओं को चुनौती देना तभी स्वीकार्य है जब उसके पीछे ठोस कानूनी आधार हो। निराधार या राजनीतिक स्वरूप वाली याचिकाएँ न सिर्फ अदालत का समय बर्बाद करती हैं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था की गरिमा को भी प्रभावित करती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह कड़ी टिप्पणी उस प्रयास पर सीधी प्रतिक्रिया है, जो अदालत के पिछले संवैधानिक फैसलों को कमजोर करने की दिशा में था।

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