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The Hill India > Blog > दिल्ली > दिल्ली EV पॉलिसी 2026: 56 लाख दोपहिया वाहनों पर मंडराता संकट, आम आदमी और कारोबार दोनों चिंतित
दिल्लीफीचर्ड

दिल्ली EV पॉलिसी 2026: 56 लाख दोपहिया वाहनों पर मंडराता संकट, आम आदमी और कारोबार दोनों चिंतित

The Hill India News
Last updated: April 14, 2026 7:23 am
The Hill India News
Published: April 14, 2026
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दिल्ली सरकार की प्रस्तावित ‘EV पॉलिसी 2026’ ने राजधानी में रहने वाले लाखों वाहन मालिकों, डीलरों और डिलीवरी से जुड़े कामगारों के बीच चिंता का माहौल पैदा कर दिया है। इस नई नीति के ड्राफ्ट के अनुसार 1 अप्रैल 2028 से दिल्ली में केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के रजिस्ट्रेशन की अनुमति देने का प्रस्ताव है। इस फैसले का सीधा असर उन 56 लाख से अधिक दोपहिया वाहनों पर पड़ेगा जो फिलहाल दिल्ली की सड़कों पर चल रहे हैं।

राजधानी में हर साल लगभग 5 लाख नई बाइक की बिक्री होती है, लेकिन इनमें इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी अभी भी बेहद कम, करीब 7.3 प्रतिशत ही है। यानी सालाना लगभग 35 से 40 हजार ही ईवी दोपहिया वाहन बिकते हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि अगले दो वर्षों में इस आंकड़े को 100 प्रतिशत तक पहुंचाना बेहद मुश्किल ही नहीं, बल्कि लगभग असंभव है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण बाजार में सीमित सप्लाई और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है।

सरकार की ओर से लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ आर्थिक सहायता की घोषणा की गई है। पुरानी पेट्रोल बाइक को हटाने पर 10,000 रुपये और नई इलेक्ट्रिक बाइक खरीदने पर 30,000 रुपये तक की सब्सिडी दी जा रही है। लेकिन एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह राहत पर्याप्त नहीं मानी जा रही। जहां एक ओर सामान्य पेट्रोल बाइक 80,000 से 1 लाख रुपये में मिल जाती है, वहीं अच्छी रेंज और प्रदर्शन वाली इलेक्ट्रिक बाइक की कीमत इससे कहीं अधिक होती है। ऐसे में कुल 40,000 रुपये की सहायता भी आम उपभोक्ता के लिए इस बदलाव को सहज नहीं बना पा रही।

इस नीति का सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ने की संभावना है जो अपनी बाइक के जरिए रोज़गार चला रहे हैं। ओला-उबर जैसे कैब एग्रीगेटर और स्विगी-जोमैटो जैसे फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले हजारों लोग अपनी पेट्रोल बाइक से कमाई करते हैं। प्रस्तावित नियमों के अनुसार, अगले साल से ये कंपनियां नए पेट्रोल दोपहिया वाहन अपने प्लेटफॉर्म से नहीं जोड़ पाएंगी। इससे पार्ट-टाइम काम करने वाले या छोटे स्तर पर रोज़गार चलाने वाले लोगों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

पूर्व डिप्टी कमिश्नर अनिल छिकारा ने इस नीति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस तरह की सख्ती से लोगों में घबराहट पैदा होगी और यह फैसला व्यवहारिक नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि दिल्ली में ‘मिक्स फ्लीट’ यानी पेट्रोल और इलेक्ट्रिक दोनों तरह के वाहनों को अनुमति दी जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को निजी वाहनों पर सब्सिडी देने के बजाय सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए, जिससे प्रदूषण नियंत्रण का अधिक प्रभावी समाधान मिल सके।

इस नीति का असर केवल उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़ा पूरा व्यापार भी प्रभावित हो सकता है। दिल्ली में दोपहिया वाहनों का सालाना कारोबार करीब 4,000 करोड़ रुपये का है, जिससे लगभग 50,000 लोग सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं। डीलरों को डर है कि यदि इस नीति को सख्ती से लागू किया गया, तो ग्राहक दिल्ली के बजाय नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम जैसे आसपास के शहरों से वाहन खरीदना शुरू कर सकते हैं। इससे दिल्ली के ऑटोमोबाइल बाजार को भारी नुकसान हो सकता है।

चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। अभी दिल्ली में पर्याप्त संख्या में चार्जिंग स्टेशन नहीं हैं, खासकर उन इलाकों में जहां मध्यम और निम्न वर्ग के लोग रहते हैं। ऐसे में इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने के बाद उन्हें चार्ज करना एक बड़ी समस्या बन सकता है। यदि सरकार इस दिशा में तेजी से काम नहीं करती, तो यह नीति आम लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।

हालांकि, यह भी सच है कि दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करना बेहद जरूरी है और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना एक सकारात्मक कदम है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव को धीरे-धीरे और योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाना चाहिए, ताकि आम आदमी पर अचानक आर्थिक बोझ न पड़े और बाजार भी इस बदलाव के लिए तैयार हो सके।

फिलहाल, दिल्ली सरकार ने इस ड्राफ्ट पॉलिसी पर जनता से 10 मई तक सुझाव मांगे हैं। इसके अलावा, डीलर एसोसिएशन ने इस मुद्दे पर चर्चा के लिए 17 अप्रैल को एक महत्वपूर्ण बैठक भी बुलाई है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इन सुझावों और आपत्तियों को किस तरह से शामिल करती है और अंतिम नीति को किस रूप में लागू करती है।

कुल मिलाकर, दिल्ली EV पॉलिसी 2026 एक महत्वाकांक्षी कदम जरूर है, लेकिन इसके सफल क्रियान्वयन के लिए जमीनी हकीकत, आम आदमी की आर्थिक स्थिति और बाजार की तैयारियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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