देहरादून: देश के आम बजट 2026 की प्रस्तुति से ठीक पहले सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। एक ओर जहां सत्तापक्ष इसे ‘विकसित भारत’ का रोडमैप बता रहा है, वहीं विपक्ष ने आर्थिक मोर्चों पर सरकार की विफलता गिनाना शुरू कर दिया है। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता हरीश रावत ने बजट की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए देश के आर्थिक परिदृश्य को ‘अस्वस्थ’ करार दिया है।
ईटीवी भारत से विशेष बातचीत में रावत ने कहा कि देश का मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग आज दोहरी मार झेल रहा है और आगामी बजट उनके लिए आखिरी उम्मीद की किरण है।
मध्यम वर्ग की कमर तोड़ती महंगाई और शिक्षा-स्वास्थ्य का खर्च
हरीश रावत ने मध्यम वर्ग की पीड़ा को स्वर देते हुए कहा कि आज शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस देश में एक मध्यमवर्गीय परिवार अपनी आधी कमाई बच्चों की पढ़ाई और इलाज पर खर्च कर दे, वहां खुशहाली कैसे आ सकती है?
“निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग दोनों पिस गए हैं। आय स्थिर है लेकिन खर्चों का ग्राफ आसमान छू रहा है। सरकार को इस बजट में शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट को इस तरह व्यवस्थित करना चाहिए कि आम आदमी को राहत मिल सके।” – हरीश रावत
‘कर्ज में डूबा भारत’: रुपए की साख और अर्थव्यवस्था का संतुलन
पूर्व मुख्यमंत्री ने देश पर बढ़ते कर्ज के आंकड़ों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए कहा कि साल 2014 के मुकाबले आज देश पर तीन गुना ज्यादा कर्ज बढ़ गया है। इसका सीधा असर प्रति व्यक्ति कर्ज पर पड़ रहा है।
आर्थिक असंतुलन पर प्रहार करते हुए रावत ने कहा:
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घटता निर्यात: अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की पकड़ कमजोर हो रही है।
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बढ़ता आयात: हम अपनी जरूरतों के लिए विदेशों पर अधिक निर्भर हो रहे हैं।
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रुपए की गिरावट: डॉलर के मुकाबले रुपया अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार और साख दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
रोजगार और AI: तकनीक बनाम मानवीय श्रम
रोजगार को देश का सबसे बड़ा प्रश्न बताते हुए रावत ने सरकार की नीतियों को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे तकनीक के विरोधी नहीं हैं, लेकिन तकनीक का इस्तेमाल ‘रोजगार छीनने’ के लिए नहीं बल्कि ‘रोजगार बढ़ाने’ के लिए होना चाहिए।
उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर चिंता जताते हुए कहा कि आज टेक्नोलॉजी अत्यधिक समृद्ध लोगों की ‘दासी’ बन गई है। यदि AI युवाओं के हाथों से काम छीन रहा है, तो यह देश के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आई सुस्ती पर भी उन्होंने सरकार को घेरा।
कृषि को लाभदायी बनाना अनिवार्य
हरीश रावत ने जोर देकर कहा कि अगर भारत को दुनिया की दूसरी या तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है, तो कृषि (Agriculture) को लाभ का सौदा बनाना ही होगा।
उन्होंने कहा, “दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दंभ भरना तब तक बेमानी है, जब तक हमारा किसान कर्ज और बदहाली में जी रहा है। लघु और कुटीर उद्योगों को संजीवनी देना इस बजट की प्राथमिकता होनी चाहिए।”
सिविल एविएशन और रेलवे पर तंज
उत्तराखंड के संदर्भ में बात करते हुए रावत ने सिविल एविएशन और रेलवे सेक्टर पर सरकार के दावों की हवा निकाली।
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रेलवे: उन्होंने तंज कसा कि ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना की आधारशिला सोनिया गांधी ने रखी थी, लेकिन भाजपा आज उसी की ‘घुट्टी’ लोगों को पिला रही है। उन्होंने कहा कि राज्य में कई रेलवे लाइनें दशकों से धूल फांक रही हैं।
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एविएशन: रावत के अनुसार, कांग्रेस शासन में जितने एयरपोर्ट और एयरस्ट्रिप बने थे, इस सरकार ने उनमें कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं की है।
हिमालयी राज्यों के लिए विशेष ‘ग्रीन बोनस’ की दरकार
एक पहाड़ी राज्य के नेता के रूप में हरीश रावत ने पर्यावरण और आपदा प्रबंधन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड हर साल आपदा का दंश झेलता है। केंद्र से मिलने वाला राहत पैकेज ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के समान है। इस बजट में हिमालयी राज्यों के पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस वित्तीय प्रावधान और आपदा प्रबंधन के लिए सुदृढ़ बजट की मांग उन्होंने दोहराई।
क्या उम्मीदों पर खरी उतरेगी सरकार?
हरीश रावत का यह विश्लेषण बजट से पहले एक बड़े राजनीतिक और आर्थिक विमर्श को जन्म देता है। उनके द्वारा उठाए गए सवाल—चाहे वह बढ़ता कर्ज हो, मध्यम वर्ग की बदहाली हो या कृषि की अनदेखी—सीधे तौर पर जनता से जुड़े हैं। अब देखना यह होगा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पिटारे से कल क्या निकलता है और क्या विपक्ष के इन तीखे सवालों का जवाब बजट के आंकड़ों में मिल पाता है या नहीं।


