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उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तराखंड में जंगली जानवरों का आतंक बना पलायन की बड़ी वजह, घेरबाड़ के लिए ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा बजट

The Hill India News
Last updated: March 6, 2026 4:25 am
The Hill India News
Published: March 6, 2026
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देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड में खेती-किसानी इन दिनों अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। राज्य के दुर्गम पहाड़ी इलाकों से लेकर तराई के मैदानी क्षेत्रों तक, किसान एक ऐसी अदृश्य जंग लड़ रहे हैं जिसमें उनकी मेहनत की कमाई रातों-रात स्वाहा हो रही है। इस जंग का मुख्य कारण है—जंगली जानवरों का बढ़ता आतंक। बंदर, जंगली सूअर, नीलगाय और साही जैसे वन्यजीवों ने किसानों की कमर तोड़ दी है। आलम यह है कि जो खेत कभी हरियाली से लहलहाते थे, वे अब बंजर हो रहे हैं और किसान अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।

Contents
पलायन आयोग की रिपोर्ट: फसलों का नुकसान और खाली होते गांवघेरबाड़ (फेंसिंग): एकमात्र समाधान, लेकिन बजट का टोटा90 करोड़ की घोषणा और 25 करोड़ की हकीकत: विशेषज्ञों में असंतोषक्या कहती है सरकार? कृषि मंत्री का पक्षनई पीढ़ी का खेती से मोहभंग: एक गंभीर सामाजिक संकटविशेषज्ञों की राय: दीर्घकालिक रणनीति की जरूरतवक्त कम और चुनौती बड़ी

पलायन आयोग की रिपोर्ट: फसलों का नुकसान और खाली होते गांव

उत्तराखंड पलायन आयोग की हालिया रिपोर्टों ने राज्य सरकार की नींद उड़ा दी है। रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि पहाड़ी जिलों में ग्रामीण क्षेत्रों से हो रहे पलायन का एक बड़ा कारण जंगली जानवरों द्वारा फसलों को पहुंचाया जा रहा नुकसान है। किसान दिन-भर कड़ी धूप में मेहनत करता है, लेकिन शाम ढलते ही जंगली सूअर और बंदरों के झुंड खड़ी फसल को तहस-नहस कर देते हैं।

सीमित कृषि भूमि और सिंचाई की किल्लत के बीच, जब फसल ही सुरक्षित न रहे, तो किसान के पास गांव छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। कई गांवों में तो स्थिति इतनी भयावह है कि किसानों ने डर के मारे बुवाई करना ही बंद कर दिया है।


घेरबाड़ (फेंसिंग): एकमात्र समाधान, लेकिन बजट का टोटा

कृषि विशेषज्ञों और धरातल पर काम कर रहे अधिकारियों का मानना है कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों में जंगली जानवरों से फसल बचाने का सबसे प्रभावी और वैज्ञानिक तरीका खेतों की घेरबाड़ (Fencing) है। सोलर फेंसिंग, चेन-लिंक फेंसिंग और प्रभावी तारबाड़ के जरिए वन्यजीवों को खेतों में घुसने से रोका जा सकता है।

हालांकि, एक आम पहाड़ी किसान के लिए अपने दम पर पूरे खेत की फेंसिंग कराना आर्थिक रूप से असंभव है। इसके लिए राज्य सरकार की मदद अनिवार्य है। पूर्व में संचालित सहायता योजनाएं बंद होने से किसानों की उम्मीदें अब केंद्र सरकार के विशेष बजट पर टिकी हैं।


90 करोड़ की घोषणा और 25 करोड़ की हकीकत: विशेषज्ञों में असंतोष

हाल ही में केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने उत्तराखंड को जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए 90 करोड़ रुपये की सहायता देने के संकेत दिए थे। इससे कृषि विभाग और किसानों में एक उम्मीद जगी थी कि अब बड़े पैमाने पर घेरबाड़ का कार्य शुरू हो सकेगा। लेकिन, हकीकत उम्मीदों से कोसों दूर है।

घोषणा के दो महीने बीत जाने के बाद भी राज्य को पूरी राशि नहीं मिल सकी है। फिलहाल, केंद्र ने केवल 25 करोड़ रुपये की पहली किश्त जारी करने की बात कही है।

“राज्य की विषम भौगोलिक स्थिति और प्रभावित क्षेत्रों के दायरे को देखते हुए 90 करोड़ रुपये की पूरी राशि भी बहुत अधिक नहीं थी। अब मात्र 25 करोड़ रुपये की किश्त मिलना ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ जैसा है। यदि पर्याप्त और एकमुश्त बजट नहीं मिलता, तो टुकड़ों में होने वाले काम से किसानों को कोई स्थाई राहत नहीं मिल पाएगी।” — दीपक करगेती, कृषि विशेषज्ञ


क्या कहती है सरकार? कृषि मंत्री का पक्ष

इस पूरे गतिरोध पर उत्तराखंड के कृषि मंत्री गणेश जोशी का कहना है कि सरकार किसानों की पीड़ा को समझती है और केंद्र के साथ लगातार संपर्क में है। मंत्री जोशी के अनुसार:

  • केंद्र से 90 करोड़ की घोषणा हुई थी, जिसमें से अभी 25 करोड़ रुपये मिल रहे हैं।

  • यह एक शुरुआत है और इसे पहली किस्त के रूप में देखा जाना चाहिए।

  • इस राशि का उपयोग प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में घेरबाड़ शुरू करने के लिए किया जाएगा।

  • सरकार की कोशिश है कि आने वाले समय में अतिरिक्त बजट प्राप्त कर इसे एक व्यापक अभियान का रूप दिया जाए।


नई पीढ़ी का खेती से मोहभंग: एक गंभीर सामाजिक संकट

जंगली जानवरों के संकट का एक और काला पक्ष यह है कि नई पीढ़ी खेती से पूरी तरह दूरी बना रही है। युवाओं का कहना है कि जिस काम में दिन-रात जागकर फसलों की रखवाली करनी पड़े और अंत में हाथ कुछ न लगे, उसे करने का क्या फायदा? यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले एक दशक में उत्तराखंड के पहाड़ों में पारंपरिक खेती पूरी तरह लुप्त हो सकती है। यह न केवल आर्थिक संकट है, बल्कि राज्य की खाद्य सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान के लिए भी बड़ा खतरा है।

विशेषज्ञों की राय: दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत

सिर्फ फेंसिंग ही काफी नहीं है, विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को एक बहु-आयामी रणनीति अपनानी होगी:

  1. एकमुश्त बड़ा बजट: फेंसिंग के काम को छोटे टुकड़ों में करने के बजाय एक मिशन मोड में पूरा किया जाए।

  2. फसल बीमा का सरलीकरण: जंगली जानवरों द्वारा किए गए नुकसान को भी बीमा के दायरे में प्रभावी ढंग से लाया जाए।

  3. वानिकी हस्तक्षेप: वनों के भीतर ही जानवरों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था की जाए ताकि वे बस्तियों का रुख न करें।

  4. सामुदायिक फेंसिंग: व्यक्तिगत खेतों के बजाय पूरे क्लस्टर की घेराबंदी को प्राथमिकता दी जाए।


वक्त कम और चुनौती बड़ी

उत्तराखंड में खेती को बचाने के लिए अब केवल आश्वासनों से काम नहीं चलेगा। केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर इस समस्या को ‘आपदा’ की तरह लेना होगा। 25 करोड़ की राशि से कुछ क्षेत्रों में राहत मिल सकती है, लेकिन पूरे प्रदेश के किसानों को पलायन से रोकने के लिए एक ठोस वित्तीय रोडमैप की आवश्यकता है। अगर समय रहते खेतों की फेंसिंग और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो देवभूमि के खेत हमेशा के लिए खामोश हो सकते हैं।

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