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The Hill India > Blog > दिल्ली > AAP को सबसे बड़ा झटका: संदीप पाठक के पाला बदलने से हिली केजरीवाल की सियासी नींव
दिल्लीफीचर्डराजनीति

AAP को सबसे बड़ा झटका: संदीप पाठक के पाला बदलने से हिली केजरीवाल की सियासी नींव

The Hill India News
Last updated: April 25, 2026 5:57 am
The Hill India News
Published: April 25, 2026
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दिल्ली की सियासत में एक बड़ा भूचाल उस वक्त देखने को मिला जब आम आदमी पार्टी (AAP) के कई राज्यसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया। हालांकि इस घटनाक्रम ने पहले ही AAP को गहरे संकट में डाल दिया था, लेकिन सबसे बड़ा झटका तब लगा जब पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार और संगठन के मजबूत स्तंभ माने जाने वाले संदीप पाठक ने भी पाला बदल लिया। उनका जाना सिर्फ एक नेता का पार्टी छोड़ना नहीं, बल्कि AAP की रणनीतिक रीढ़ पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।

Contents
अंदरूनी कलह और बढ़ती दूरी24 अप्रैल: सियासी तस्वीर बदलने वाला दिनसंकट के पीछे की वजहेंAAP के लिए क्या मायने?आगे की राह

AAP के भीतर संदीप पाठक को अरविंद केजरीवाल का ‘चाणक्य’ कहा जाता था। उनकी पहचान एक ऐसे रणनीतिकार की थी, जो डेटा, सर्वे और चुनावी गणित के आधार पर पार्टी की दिशा तय करते थे। 2022 के बाद पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने में उनकी भूमिका बेहद अहम रही। पंजाब में AAP की ऐतिहासिक जीत के पीछे भी उनकी रणनीति को ही मुख्य कारण माना गया था।

लेकिन अप्रैल 2026 की यह घटना AAP के लिए एक बड़े राजनीतिक संकट के रूप में सामने आई। राघव चड्ढा के इस्तीफे के साथ ही छह अन्य राज्यसभा सांसदों ने भी पार्टी छोड़ दी, जिससे राज्यसभा में AAP को दो-तिहाई से अधिक का नुकसान हुआ। इस पूरे घटनाक्रम में संदीप पाठक का शामिल होना सबसे अप्रत्याशित और चौंकाने वाला रहा।

अंदरूनी कलह और बढ़ती दूरी

सूत्रों के अनुसार, 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद से ही पार्टी के भीतर संदीप पाठक की स्थिति कमजोर पड़ने लगी थी। उनकी रणनीतियों पर सवाल उठने लगे थे और कुछ नेताओं ने उन पर ‘ओवरप्रॉमिस और अंडरडिलीवर’ का आरोप लगाया। धीरे-धीरे उन्हें बड़े फैसलों से दूर किया जाने लगा।

इसी दौरान पार्टी के भीतर राघव चड्ढा और अन्य नेताओं के बीच मतभेद भी सामने आने लगे। 2 अप्रैल 2026 को AAP ने अचानक राघव चड्ढा को राज्यसभा के डिप्टी लीडर पद से हटा दिया और उनकी जगह अशोक कुमार मित्तल को नियुक्त कर दिया। यह फैसला पार्टी के भीतर असंतोष का कारण बना और कई नेताओं में नाराजगी खुलकर सामने आई।

24 अप्रैल: सियासी तस्वीर बदलने वाला दिन

24 अप्रैल 2026 को घटनाक्रम ने अचानक नया मोड़ लिया। राघव चड्ढा ने पार्टी से इस्तीफा देकर भाजपा जॉइन कर ली। उनके साथ छह अन्य सांसद भी BJP में शामिल हो गए। इस समूह में संदीप पाठक का नाम शामिल होना AAP के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ।

सूत्र बताते हैं कि पार्टी को कुछ नेताओं के जाने का अंदेशा था, लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि रणनीतिक स्तर पर इतनी बड़ी क्षति होगी। खासकर संदीप पाठक जैसे करीबी और भरोसेमंद नेता का जाना AAP नेतृत्व के लिए अप्रत्याशित था।

संकट के पीछे की वजहें

इस राजनीतिक उठापटक के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। एक तरफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई और अन्य कानूनी दबाव, तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर बढ़ता असंतोष—इन सबने हालात को और जटिल बना दिया।

इसके अलावा स्वाति मालीवाल के साथ टकराव, कुछ नेताओं से संपर्क न हो पाना और संगठनात्मक असंतुलन ने भी पार्टी की स्थिति को कमजोर किया। ऐसे माहौल में कई नेताओं ने अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर नए विकल्प तलाशने शुरू कर दिए।

AAP के लिए क्या मायने?

संदीप पाठक का जाना सिर्फ एक नेता का नुकसान नहीं है, बल्कि AAP की रणनीतिक सोच, चुनावी तैयारी और संगठनात्मक मजबूती पर सीधा असर डाल सकता है। वह पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) थे और कई राज्यों में पार्टी के विस्तार की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।

उनकी गैरमौजूदगी में AAP को नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करनी होगी। खासकर ऐसे समय में जब पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही थी, यह झटका उसकी योजनाओं को धीमा कर सकता है।

आगे की राह

AAP अब एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत कार्रवाई की तैयारी कर रही है। एनडी गुप्ता इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कानूनी कार्रवाई से पार्टी को हुए वास्तविक नुकसान की भरपाई संभव नहीं है।

यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों की ओर इशारा करता है। जहां एक ओर BJP अपने विस्तार की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं दूसरी ओर AAP को अपने संगठन को बचाने और फिर से खड़ा करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

कुल मिलाकर, पिछले 30 दिनों में AAP को तीन बड़े झटके लगे हैं—राष्ट्रीय संगठन महासचिव का जाना, सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार का पार्टी छोड़ना और राज्यसभा में नेतृत्व का कमजोर होना। यह दौर AAP के लिए आत्ममंथन और पुनर्गठन का संकेत दे रहा है। अब देखना होगा कि अरविंद केजरीवाल इस संकट से पार्टी को कैसे उबारते हैं और क्या AAP दोबारा अपनी सियासी पकड़ मजबूत कर पाती है या नहीं।

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