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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > 11 हजार फीट की ऊंचाई पर दूध-मक्खन से खेली गई अनोखी होली, दयारा बुग्याल में गूंजा ढोल-दमाऊं; बटर फेस्टिवल में दिखी उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति
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11 हजार फीट की ऊंचाई पर दूध-मक्खन से खेली गई अनोखी होली, दयारा बुग्याल में गूंजा ढोल-दमाऊं; बटर फेस्टिवल में दिखी उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति

The Hill India News
Last updated: August 17, 2026 12:25 pm
The Hill India News
Published: August 17, 2026
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अंढूड़ी पर्व में गुलाल की जगह दूध, दही और मक्खन से सराबोर हुआ दयारा बुग्याल, राधा-कृष्ण की जोड़ी ने फोड़ी मक्खन से भरी हांडी; लोकनृत्य और लोकगीतों ने बांधा समां

उत्तरकाशी। उत्तराखंड की ऊंची पहाड़ियों में जब परंपरा, आस्था और लोक संस्कृति एक साथ रंग बिखेरती है तो नजारा अपने आप में अद्भुत बन जाता है। ऐसा ही अनोखा दृश्य सोमवार को उत्तरकाशी जिले के प्रसिद्ध दयारा बुग्याल में देखने को मिला, जहां समुद्रतल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर पारंपरिक अंढूड़ी पर्व यानी बटर फेस्टिवल पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अनूठे पर्व में रंग और गुलाल की जगह दूध, दही और मक्खन से होली खेली गई।

हरे-भरे बुग्याल, चारों तरफ फैली ऊंची पहाड़ियां, ठंडी हवाओं के बीच गूंजते ढोल-दमाऊं और पारंपरिक लोकगीतों ने दयारा बुग्याल के वातावरण को पूरी तरह उत्सवमय बना दिया। इस दौरान ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को दूध, दही और मक्खन लगाकर पारंपरिक अंदाज में होली खेली। बटर फेस्टिवल का यह अनूठा रूप देखने के लिए दूर-दराज से भी लोग दयारा बुग्याल पहुंचे।

सदियों पुरानी परंपरा को आज भी जीवंत रखे हुए हैं ग्रामीण

अंढूड़ी पर्व केवल मनोरंजन या उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की प्राचीन लोक परंपराओं, धार्मिक आस्था और पशुपालन से जुड़ी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। दयारा पर्यटन विकास समिति की ओर से आयोजित इस पर्व में पंचगाई पट्टी के रैथल, नटीण, बंद्राणी, क्यार्क और भटवाड़ी गांवों के ग्रामीण अपने आराध्य समेश्वर देवता की देवडोली के साथ दयारा बुग्याल पहुंचे।

इसके अलावा उत्तरकाशी जिले के अन्य क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु इस पारंपरिक आयोजन का हिस्सा बने। सभी ने मिलकर पर्व को धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक उल्लास के साथ मनाया।

देवडोली के साथ शुरू हुआ धार्मिक अनुष्ठान

अंढूड़ी पर्व की शुरुआत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ हुई। कार्यक्रम के दौरान पांच पांडवों के पश्वाओं के अवतरित होने की परंपरा निभाई गई। इसके बाद समेश्वर देवता की देवडोली के साथ उनके पश्वा भी अवतरित हुए।

स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार समेश्वर देवता ने कफुवा पर डांगरियों के बीच चलकर मेलार्थियों को आशीर्वाद दिया। इसके बाद ग्रामीणों ने दयारा बुग्याल में बनी अपनी छानियों में एकत्र किए गए दूध, दही और मक्खन को वन देवताओं और स्थानीय देवी-देवताओं को भोग के रूप में अर्पित किया।

इस धार्मिक प्रक्रिया के पीछे ग्रामीणों की आस्था और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना जुड़ी हुई है। ग्रामीण अपने पशुधन, परिवार और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए देवी-देवताओं का आशीर्वाद लेते हैं।

मक्खन से भरी हांडी फूटते ही शुरू हुई अनोखी होली

धार्मिक अनुष्ठान पूरा होने के बाद पर्व का सबसे आकर्षक और रोमांचक हिस्सा शुरू हुआ। राधा-कृष्ण की जोड़ी ने मक्खन से भरी हांडी फोड़ी। हांडी फूटते ही पूरा बुग्याल उत्साह और उल्लास से भर उठा।

इसके बाद ग्रामीणों ने एक-दूसरे पर दूध, दही और मक्खन लगाकर अनोखी होली खेली। आमतौर पर जहां होली में रंग और गुलाल का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं दयारा बुग्याल में मनाई जाने वाली यह होली अपनी अलग परंपरा के कारण लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी रही।

श्रद्धालु भी इस अनोखी परंपरा का हिस्सा बने और पूरे उत्साह के साथ पर्व में शामिल हुए। बुग्याल में मौजूद हर तरफ दूध, दही और मक्खन की होली के बीच लोक संस्कृति की खूबसूरत तस्वीर देखने को मिली।

पारंपरिक परिधानों में महिलाओं ने किया रासौ-तांदी नृत्य

अंढूड़ी पर्व में धार्मिक कार्यक्रमों के साथ उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति की भी शानदार झलक देखने को मिली। महिलाओं ने पारंपरिक लोकवेशभूषा पहनकर राधा-कृष्ण की जोड़ी के साथ रासौ-तांदी नृत्य प्रस्तुत किया।

पुरुषों ने भी इस लोकनृत्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ढोल-दमाऊं की गूंज के बीच लोकगीतों ने पूरे दयारा बुग्याल को जीवंत कर दिया। पहाड़ की पारंपरिक संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता का यह मेल वहां पहुंचे लोगों के लिए यादगार अनुभव बन गया।

इस दौरान महिलाओं और पुरुषों ने सामूहिक रूप से नृत्य किया और अपनी लोक परंपराओं को उत्साह के साथ आगे बढ़ाया। बुग्याल में देर तक लोकगीतों और ढोल-दमाऊं की आवाज गूंजती रही।

पशुपालन और प्रकृति से भी जुड़ा है अंढूड़ी पर्व

दयारा पर्यटन विकास समिति के अध्यक्ष मनोज राणा के अनुसार अंढूड़ी पर्व सदियों पुरानी पौराणिक लोक परंपरा से जुड़ा हुआ है। बुग्यालों में गर्मियों के दौरान ग्रामीण अपने मवेशियों को चराने के लिए लेकर जाते हैं। गर्मियों का मौसम समाप्त होने के बाद जब मवेशियों को वापस गांवों की ओर लाया जाता है, उसी समय इस पर्व को मनाने की परंपरा है।

इस दौरान पशुओं से प्राप्त दूध, दही और मक्खन को वन देवताओं और स्थानीय देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है। ग्रामीण सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली और अपने मवेशियों की कुशलता के लिए देवताओं से आशीर्वाद मांगते हैं।

यानी अंढूड़ी पर्व सिर्फ दूध और मक्खन से खेली जाने वाली होली नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, पशुधन, देवी-देवताओं और ग्रामीण जीवन के बीच गहरे संबंध को दर्शाने वाली परंपरा है।

नई पीढ़ी को परंपरा बचाने का संदेश

पर्व में शामिल ग्रामीणों का कहना है कि अंढूड़ी जैसी परंपराएं पहाड़ की पहचान हैं। आधुनिक दौर में जब जीवनशैली तेजी से बदल रही है, ऐसे पारंपरिक त्योहार नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़ने का काम करते हैं।

ग्रामीणों ने कहा कि पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को जीवित रखना केवल बुजुर्गों की नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी लोक संस्कृति, रीति-रिवाज और पारंपरिक पर्वों के बारे में जानकारी होनी चाहिए, ताकि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत आगे भी इसी तरह जीवंत बनी रहे।

धर्म, प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत संगम

दयारा बुग्याल का अंढूड़ी पर्व इस बात का शानदार उदाहरण है कि उत्तराखंड की संस्कृति केवल गीत-संगीत और लोकनृत्य तक सीमित नहीं है। इसमें प्रकृति के प्रति सम्मान, पशुधन के प्रति संवेदना, देवी-देवताओं के प्रति आस्था और सामुदायिक जीवन की मजबूत भावना भी शामिल है।

11 हजार फीट की ऊंचाई पर दूध, दही और मक्खन से खेली गई यह अनोखी होली दयारा बुग्याल की पहचान बन चुकी है। बर्फीली चोटियों और हरे-भरे पहाड़ों के बीच जब ढोल-दमाऊं की थाप पर ग्रामीण रासौ-तांदी करते हैं और मक्खन की हांडी फूटते ही पूरा बुग्याल उत्सव के रंग में रंग जाता है, तो यह दृश्य उत्तराखंड की जीवंत लोक संस्कृति की ऐसी तस्वीर पेश करता है, जिसे देखने वाला लंबे समय तक भूल नहीं पाता।

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