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महिला आरक्षण बिल पर ‘ना’: क्या अखिलेश यादव की रणनीति अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझ गई?

The Hill India News
Last updated: April 18, 2026 5:03 am
The Hill India News
Published: April 18, 2026
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महिला आरक्षण बिल को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गर्मा गई है। लोकसभा में संविधान संशोधन के जरिए महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले इस प्रस्ताव के गिरने के बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। खासकर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के रुख ने इस बहस को और धार दे दी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह कदम एक सोची-समझी सामाजिक न्याय की रणनीति है या फिर भाजपा के नेतृत्व वाले सत्ता पक्ष, खासकर अमित शाह की राजनीतिक चाल में फंसने जैसा है।

लोकसभा में इस बिल पर हुए मतदान में समर्थन और विरोध के आंकड़े बेहद करीब रहे, लेकिन संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका। इसके बाद सरकार ने इससे जुड़े अन्य विधेयकों को भी फिलहाल आगे नहीं बढ़ाया। अब चर्चा इस बात पर है कि क्या सरकार संयुक्त सत्र बुलाकर इसे पास कराने की कोशिश करेगी।

समाजवादी पार्टी ने इस बिल का विरोध करते हुए साफ किया कि वह महिलाओं को आरक्षण देने के खिलाफ नहीं है, लेकिन मौजूदा स्वरूप में यह अधूरा है। अखिलेश यादव का कहना है कि इसमें ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए। उनका तर्क है कि बिना ‘आरक्षण में आरक्षण’ के यह कानून सामाजिक न्याय के मूल उद्देश्य को पूरा नहीं करेगा।

दूसरी ओर, अमित शाह ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं है। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि आगामी जनगणना में जातिगत आंकड़े शामिल किए जाएंगे। हालांकि विपक्ष इस पर भी सवाल उठा रहा है और इसे टालमटोल की रणनीति बता रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अखिलेश यादव का यह रुख उनके पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) वोट बैंक को साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। लोकसभा चुनाव 2024 में इसी सामाजिक समीकरण ने उन्हें उत्तर प्रदेश में बड़ी सफलता दिलाई थी। लेकिन अब वही रणनीति एक जोखिम भी बन सकती है। शहरी और महिला मतदाताओं के बीच इस विरोध को “महिला विरोधी” के रूप में प्रचारित किया जा सकता है, जिसका फायदा भाजपा उठा सकती है।

इतिहास पर नजर डालें तो महिला आरक्षण बिल का विरोध समाजवादी पार्टी के लिए नया नहीं है। पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव भी इस बिल के मौजूदा स्वरूप के खिलाफ थे। उनका मानना था कि इससे केवल शहरी और संपन्न वर्ग की महिलाओं को लाभ मिलेगा, जबकि ग्रामीण और पिछड़े वर्ग की महिलाएं पीछे रह जाएंगी। उनके कुछ पुराने बयान आज भी राजनीतिक बहस में गूंजते हैं और विपक्ष इन्हें मुद्दा बनाकर सपा को घेरता है।

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में महिलाओं की भूमिका तेजी से बढ़ी है। शिक्षा, रोजगार और राजनीति—हर क्षेत्र में उनकी भागीदारी मजबूत हुई है। ऐसे में महिला आरक्षण जैसे मुद्दे पर विरोध करना किसी भी पार्टी के लिए आसान नहीं है। यही कारण है कि अखिलेश यादव एक संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं—एक ओर सामाजिक न्याय का एजेंडा, तो दूसरी ओर महिला मतदाताओं की नाराजगी का खतरा।

भाजपा इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। पार्टी इसे “महिला सशक्तिकरण” बनाम “महिला विरोध” की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है। नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की सरकारों द्वारा महिलाओं के लिए चलाई गई योजनाओं—जैसे उज्ज्वला योजना, जनधन खाते, शौचालय निर्माण और सुरक्षा के लिए एंटी-रोमियो स्क्वॉड—को भी इस नैरेटिव में जोड़ा जा रहा है।

इसके अलावा, कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भी तुलना की जा रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी दर्ज की गई है। भाजपा इसे अपनी “जीरो टॉलरेंस” नीति की सफलता बता रही है, जबकि विपक्ष इन आंकड़ों की व्याख्या अलग तरीके से करता है।

आगे की राजनीति और भी दिलचस्प हो सकती है। परिसीमन (Delimitation) की संभावना को लेकर भी सपा सतर्क है। यदि उत्तर प्रदेश में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ती है, तो इससे राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं और भाजपा को लाभ मिल सकता है। ऐसे में अखिलेश यादव हर कदम सोच-समझकर उठा रहे हैं।

कुल मिलाकर, महिला आरक्षण बिल पर सपा का विरोध एक दोधारी तलवार साबित हो सकता है। यदि यह पीडीए वोट बैंक को और मजबूत करता है, तो यह रणनीतिक जीत हो सकती है। लेकिन यदि इससे महिला और शहरी मतदाताओं में नकारात्मक संदेश जाता है, तो 2027 के विधानसभा चुनाव में इसका नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।

अब नजर इस बात पर है कि अखिलेश यादव इस मुद्दे को किस तरह जनता के बीच प्रस्तुत करते हैं और भाजपा इसे किस तरह राजनीतिक हथियार बनाती है। आने वाला समय ही तय करेगा कि यह चाल शह-मात का खेल बनेगी या फिर उल्टा पड़ जाएगी।

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