
नई दिल्ली | मुख्य संवाददाता केंद्र की मोदी सरकार द्वारा मनरेगा (MGNREGA) को समाप्त कर उसकी जगह लाए गए नए ‘विकसित भारत – जी राम जी’ (VBGRJ) कानून के खिलाफ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस ने शनिवार को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान “मनरेगा बचाओ संग्राम” नामक देशव्यापी विरोध प्रदर्शन की रूपरेखा साझा की। यह अभियान 10 जनवरी से शुरू होकर 25 फरवरी 2026 तक तीन अलग-अलग चरणों में चलेगा।
कांग्रेस का आरोप है कि नया कानून ग्रामीण मजदूरों के ‘रोजगार के अधिकार’ को छीनकर उसे केंद्र सरकार के ‘रहमोकरम’ पर छोड़ने की साजिश है।
तीन चरणों में होगा ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’
कांग्रेस ने इस आंदोलन को पंचायत स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक ले जाने की तैयारी की है। पार्टी ने इसका विस्तृत शेड्यूल जारी किया है:
प्रथम चरण (10 – 11 जनवरी): जिला स्तर पर शंखनाद
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10 जनवरी: देश के सभी जिला कांग्रेस कार्यालयों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर नए कानून की ‘खामियों’ को जनता के सामने रखा जाएगा।
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11 जनवरी: कांग्रेस के तमाम दिग्गज नेता और कार्यकर्ता जिला मुख्यालयों या गांधी/अंबेडकर प्रतिमाओं के समक्ष एक दिवसीय उपवास रखेंगे।
द्वितीय चरण (12 – 30 जनवरी): ‘गांव-गांव चौपाल’ और राहुल की चिट्ठी
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इस दौरान कांग्रेस कार्यकर्ता ग्राम पंचायतों में चौपाल लगाएंगे।
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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा लिखा गया एक विशेष पत्र ग्राम प्रधानों, रोजगार सेवकों और मनरेगा मजदूरों को घर-घर जाकर सौंपा जाएगा।
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30 जनवरी (शहीद दिवस): इस दिन वार्ड स्तर पर धरने देकर आंदोलन को स्थानीय स्तर पर मजबूती दी जाएगी।
तृतीय चरण (फरवरी): राष्ट्रीय स्तर पर शक्ति प्रदर्शन
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अभियान के अंतिम चरण में प्रदेश राजधानियों और दिल्ली में विशाल रैलियों का आयोजन किया जाएगा, जिसमें विपक्षी एकता की झलक देखने को मिल सकती है।
“नाम बड़ा, दर्शन छोटे”: जयराम रमेश का तीखा हमला
कांग्रेस महासचिव और संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने नए कानून ‘वीबी जी राम जी’ पर निशाना साधते हुए इसे ‘सत्ता का केंद्रीकरण’ करार दिया। उन्होंने कहा, “इस कानून का सिर्फ नाम बड़ा है, लेकिन इसके भीतर रोजगार की कोई गारंटी नहीं है। यह अब ‘हक’ (Right) नहीं रहा, बल्कि केंद्र सरकार का एक ‘प्रोग्राम’ बन गया है।”
जयराम रमेश के मुख्य आरोप:
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केंद्रीकरण: अब केंद्र सरकार तय करेगी कि किस पंचायत को पैसा देना है और किसे नहीं।
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राज्यों की अनदेखी: राज्य सरकारों के पास वित्तीय सहायता सुनिश्चित करने का कोई कानूनी आधार नहीं बचा है।
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कृषि कानून जैसा हश्र: जयराम रमेश ने दावा किया कि इस आंदोलन का नतीजा भी तीन कृषि कानूनों जैसा ही होगा और सरकार को मनरेगा को बहाल करना ही पड़ेगा।
विपक्षी लामबंदी और कानूनी चुनौती की तैयारी
कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि यह केवल एक पार्टी का आंदोलन नहीं होगा। पार्टी इस मुद्दे पर इंडिया (INDIA) गठबंधन के अन्य दलों और नागरिक समाज के संगठनों (NGOs) को भी साथ लाने की कोशिश कर रही है।
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साझा रणनीति: गैर-बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री जल्द ही इस विषय पर बैठक कर एक साझा स्टैंड लेंगे।
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कोर्ट का रुख: कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि वे इस नए कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार कर रहे हैं।
2026 की राजनीति का टर्निंग पॉइंट?
बजट 2026-27 से ठीक पहले कांग्रेस का यह ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। एक तरफ जहाँ सरकार इसे ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ता कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे ‘गरीब विरोधी’ करार दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ग्रामीण मतदाता इस राजनीतिक खींचतान को किस रूप में देखते हैं।



