रियाद/इस्लामाबाद। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का के आसपास सुरक्षा को लेकर मंगलवार रात उस समय हड़कंप मच गया, जब सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने दावा किया कि उसने मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में दाखिल होने से पहले ही इंटरसेप्ट कर नष्ट कर दिया। सऊदी अधिकारियों ने इस घटना को गंभीर सुरक्षा उल्लंघन बताया है और कहा है कि दो पवित्र मस्जिदों तथा वहां आने वाले जायरीनों की सुरक्षा उनके लिए “रेड लाइन” है।
हालांकि इस पूरे मामले में एक अहम पक्ष अभी विवादित है। हूती संगठन ने मक्का को निशाना बनाने के सऊदी आरोप को खारिज किया है। हूती प्रवक्ता ने सऊदी दावे को झूठा बताया और कहा कि संगठन धार्मिक स्थलों को निशाना नहीं बनाता। ऐसे में फिलहाल यह स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हुआ है कि ड्रोन का वास्तविक लक्ष्य मक्का ही था।
इस घटना ने इसलिए भी अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा है क्योंकि यह ऐसे समय में हुई है जब यमन के हूती और सऊदी अरब के बीच सैन्य तनाव तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही पिछले महीने अस्तित्व में आए सऊदी अरब-पाकिस्तान-तुर्किये के मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
मक्का के दक्षिण में ड्रोन को किया गया नष्ट
सऊदी नेतृत्व वाले यमन गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-मलिकी के अनुसार, 15 सितंबर की शाम करीब 6:50 बजे सऊदी रॉयल एयर डिफेंस ने मक्का के दक्षिण में एक ड्रोन को इंटरसेप्ट किया। उनके अनुसार, ड्रोन पवित्र शहर के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ही नष्ट कर दिया गया।
सऊदी पक्ष ने इसे मक्का को निशाना बनाने की हूतियों की दूसरी कोशिश बताया है। सऊदी अधिकारियों ने 27 जुलाई 2017 की उस घटना का भी उल्लेख किया, जब मक्का की दिशा में बैलिस्टिक मिसाइल दागे जाने का दावा किया गया था। हालांकि मौजूदा घटना में भी हूती पक्ष ने मक्का को लक्ष्य बनाए जाने से इनकार किया है।
सऊदी गठबंधन का कहना है कि पवित्र शहर और दो पवित्र मस्जिदों की सुरक्षा किसी भी कीमत पर सुनिश्चित की जाएगी। इस घटना के बाद सऊदी अरब के कई इलाकों में सुरक्षा अलर्ट भी जारी किए गए।
क्या मक्का वास्तव में निशाने पर था?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। सऊदी अरब का कहना है कि ड्रोन हूती क्षेत्र से आया और मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र की ओर बढ़ रहा था। लेकिन हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सारी ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि संगठन धार्मिक स्थलों को निशाना नहीं बनाता।
इसलिए घटना का एक हिस्सा फिलहाल दावे और प्रतिदावे के रूप में सामने आया है। ड्रोन को सऊदी एयर डिफेंस द्वारा नष्ट किए जाने की बात सऊदी अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में दर्ज है, लेकिन उसके अंतिम उद्देश्य को लेकर दोनों पक्षों के बयान अलग हैं।
हूतियों ने इसके साथ सऊदी अरब पर यमन में हवाई हमले करने का आरोप लगाया है और अपनी सैन्य कार्रवाइयों को सऊदी सैन्य तथा ऊर्जा ठिकानों से जोड़कर पेश किया है। हूती पक्ष के कुछ अन्य सैन्य दावों की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं हुई है, इसलिए उन्हें उसी रूप में देखना जरूरी है।
पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी समझौता अब चर्चा के केंद्र में
मक्का के पास ड्रोन घटना के बाद सबसे ज्यादा चर्चा उस रक्षा समझौते की हो रही है, जिसे पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने अगस्त में किया था। समझौते का उद्देश्य तीनों देशों के बीच सामूहिक रक्षा और प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करना बताया गया था। समझौते में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला होने को तीनों के खिलाफ हमला मानने की प्रतिबद्धता का उल्लेख किया गया है।
इसी वजह से जब हूतियों के हमले सऊदी क्षेत्र तक पहुंचे तो यह सवाल उठा कि क्या पाकिस्तान इस समझौते के तहत सीधे सैन्य भूमिका निभाएगा।
9 सितंबर को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था कि यदि यमन का संघर्ष सऊदी अरब में फैलता है तो मक्का रक्षा समझौता सक्रिय हो सकता है और पाकिस्तान समझौते की शर्तों का पालन करेगा।
लेकिन अगले ही दिन पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि समझौते के तहत किसी तत्काल सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हुई है। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन यह भी कहा कि उस समय कोई तत्काल सैन्य कार्रवाई विचाराधीन नहीं थी।
यानी पाकिस्तान ने समझौते से खुद को अलग नहीं किया है, लेकिन यमन में हूतियों के खिलाफ तत्काल सैन्य हस्तक्षेप की घोषणा भी नहीं की है।
पाकिस्तान क्यों सावधानी बरत रहा है?
पाकिस्तान के रुख के पीछे कई रणनीतिक और कूटनीतिक पहलू देखे जा रहे हैं। सबसे महत्वपूर्ण पहलू ईरान के साथ उसके संबंध हैं। पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है और वह पश्चिम एशिया के किसी व्यापक युद्ध में सीधे शामिल होने से बचना चाहता है।
दूसरा मुद्दा यमन युद्ध का पुराना अनुभव है। पाकिस्तान ने 2015 में भी यमन संघर्ष में सैन्य रूप से शामिल होने से दूरी बनाई थी। इसलिए मौजूदा हालात में भी इस्लामाबाद के सामने यह सवाल है कि सऊदी अरब के साथ सुरक्षा प्रतिबद्धता निभाते हुए वह खुद को लंबे क्षेत्रीय युद्ध में किस सीमा तक शामिल करे।
तीसरा पहलू पाकिस्तान की अपनी सुरक्षा और आर्थिक चुनौतियां हैं। देश के लिए पश्चिम एशिया से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष के खिलाफ खुलकर सैन्य कार्रवाई करना उसके लिए आर्थिक और कूटनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है।
हालांकि इन कारणों को पाकिस्तान सरकार की आधिकारिक वजहों के रूप में नहीं बल्कि क्षेत्रीय विश्लेषण में सामने आने वाले संभावित रणनीतिक कारकों के रूप में देखना चाहिए।
‘इस्लामी नाटो’ की चर्चा क्यों शुरू हुई?
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के समझौते की तुलना कई रिपोर्टों में नाटो की सामूहिक रक्षा अवधारणा से की गई है। लेकिन इसे आधिकारिक रूप से “इस्लामी नाटो” कहना सटीक नहीं होगा। यह तीन देशों के बीच एक रक्षा समझौता है और इसके संचालन की व्यावहारिक प्रक्रिया को लेकर अभी कई सवाल खुले हैं।
यही कारण है कि सऊदी क्षेत्र में हूती हमलों के बाद इस समझौते की वास्तविक उपयोगिता और उसकी सीमाओं पर बहस शुरू हो गई है।
एक तरफ पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने हमले की स्थिति में समझौते के सक्रिय होने की बात कही थी, वहीं विदेश मंत्रालय ने तत्काल सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं होने की जानकारी दी। इन दोनों बयानों से यह संकेत मिलता है कि समझौते की राजनीतिक प्रतिबद्धता और उसके वास्तविक सैन्य क्रियान्वयन के बीच कई व्यावहारिक प्रश्न अभी मौजूद हैं।
सऊदी अरब ने अमेरिका से बढ़ाया संपर्क
हूती हमलों के बढ़ने के साथ सऊदी अरब ने अमेरिका और अन्य क्षेत्रीय साझेदारों के साथ भी सुरक्षा सहयोग बढ़ाया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने सऊदी नेतृत्व से मुलाकात की है और क्षेत्रीय सुरक्षा तथा हूती हमलों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई है। अमेरिकी पक्ष द्वारा सऊदी अरब को एयर डिफेंस, लक्ष्य संबंधी जानकारी और खुफिया सहायता दिए जाने की भी रिपोर्टें सामने आई हैं।
इससे साफ है कि सऊदी अरब हूती खतरे का सामना केवल किसी एक सहयोगी के सहारे नहीं कर रहा, बल्कि अमेरिका, मिस्र और अन्य क्षेत्रीय देशों के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ा रहा है।
इजरायल से खुफिया सहयोग की रिपोर्ट ने बढ़ाई हलचल
इसी बीच कुछ क्षेत्रीय और इजरायली मीडिया रिपोर्टों ने दावा किया है कि सऊदी अरब और इजरायल के बीच अमेरिकी सेंट्रल कमांड की मध्यस्थता में हूती खतरे को लेकर बातचीत हुई है। रिपोर्टों के मुताबिक संभावित सहयोग का शुरुआती फोकस खुफिया जानकारी और शुरुआती चेतावनी पर है।
Jerusalem Post और Israel Hayom ने क्षेत्रीय राजनयिक एवं सुरक्षा सूत्रों के हवाले से इस तरह की बातचीत की रिपोर्ट दी है। एक अन्य विश्लेषण के मुताबिक सऊदी अरब ने हूती गतिविधियों के बारे में जानकारी और रक्षा सहायता के लिए अमेरिका से संपर्क किया और उसी चैनल के माध्यम से इजरायल से संभावित खुफिया सहयोग पर चर्चा हुई।
हालांकि इसे सऊदी अरब और इजरायल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध या सैन्य गठबंधन के रूप में पेश करना अभी उचित नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्टें मुख्य रूप से संभावित या प्रारंभिक खुफिया सहयोग की बात करती हैं।
बाब अल-मंदब पर हूती नियंत्रण ने बढ़ाई चिंता
मौजूदा संकट केवल मक्का की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यमन के लाल सागर तट और बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य के आसपास हूती गतिविधियों ने सऊदी अरब के लिए रणनीतिक और आर्थिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। बाब अल-मंदब वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए महत्वपूर्ण मार्ग है और इसके आसपास तनाव बढ़ने से तेल तथा अन्य सामानों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।
हूती गतिविधियों से सऊदी अरब के तेल ढांचे और समुद्री मार्गों पर दबाव बढ़ने की खबरों के बीच रियाद अपने हवाई सुरक्षा तंत्र और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
मक्का घटना ने बदल दी क्षेत्रीय सुरक्षा की बहस
मक्का के दक्षिण में ड्रोन को गिराए जाने की घटना इसलिए बेहद संवेदनशील है क्योंकि यह इस्लाम के सबसे पवित्र शहर से जुड़ी है। सऊदी अरब ने इसे स्पष्ट सुरक्षा चुनौती बताया है, जबकि हूती पक्ष ने मक्का को निशाना बनाने से इनकार किया है। ऐसे में घटना का वास्तविक उद्देश्य आने वाले दिनों में जांच और उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर और स्पष्ट हो सकता है।
लेकिन इतना जरूर है कि इस घटना ने सऊदी अरब की सुरक्षा, पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी रक्षा समझौते और अमेरिका तथा अन्य देशों के साथ रियाद के सुरक्षा सहयोग को एक साथ चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
फिलहाल पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अपनी रक्षा प्रतिबद्धता से औपचारिक रूप से पीछे हटने की घोषणा नहीं की है। दूसरी ओर उसने यह भी स्पष्ट किया है कि समझौते के तहत तत्काल सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हुई है।
यानी आने वाले दिनों में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि अगर हूती हमले सऊदी क्षेत्र में और बढ़ते हैं, तो मक्का रक्षा समझौता व्यवहार में किस रूप में लागू होता है और पाकिस्तान, तुर्किये तथा अन्य साझेदार सऊदी सुरक्षा के लिए किस स्तर तक आगे आते हैं।
फिलहाल मक्का के पास ड्रोन को सऊदी एयर डिफेंस द्वारा गिराए जाने की घटना ने पश्चिम एशिया के पहले से तनावपूर्ण माहौल में एक नया अध्याय जरूर जोड़ दिया है। और इस पूरे घटनाक्रम में मक्का की सुरक्षा के साथ-साथ ऊर्जा मार्ग, बाब अल-मंदब, क्षेत्रीय सैन्य गठबंधन और अंतरराष्ट्रीय खुफिया सहयोग भी आने वाले समय में अहम मुद्दे बने रहेंगे।
