देहरादून। उत्तराखंड में आम जनता और सरकारी कर्मचारियों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने वाली अटल आयुष्मान योजना और गोल्डन कार्ड योजना को लेकर सरकार अब बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। राज्य पर लगातार बढ़ रहे स्वास्थ्य खर्च के वित्तीय दबाव को कम करने और लाभार्थियों को समय पर उपचार उपलब्ध कराने के लिए अटल आयुष्मान योजना को इंश्योरेंस मोड पर संचालित करने का निर्णय लगभग तय हो चुका है। वहीं सरकारी कर्मचारियों और पेंशनधारियों के लिए संचालित गोल्डन कार्ड योजना को भी इंश्योरेंस मोड में लाने को लेकर मंथन चल रहा है।
गोल्डन कार्ड योजना को लेकर अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ चर्चा के बाद लिया जाएगा। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक तरफ कर्मचारियों को कैशलेस और समय पर उपचार की सुविधा मिलती रहे, वहीं दूसरी तरफ योजना के कारण सरकारी खजाने पर लगातार बढ़ रहे वित्तीय बोझ को नियंत्रित किया जा सके। स्वास्थ्य विभाग इसी संतुलन को साधने के लिए नई व्यवस्था तैयार करने में जुटा है।
आम जनता के लिए अटल आयुष्मान, कर्मचारियों के लिए गोल्डन कार्ड
उत्तराखंड में लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए केंद्र की प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के साथ राज्य सरकार की अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना संचालित की जा रही है। इसका उद्देश्य प्रदेश के आम नागरिकों को गंभीर बीमारियों और महंगे इलाज के समय आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराना है।
अटल आयुष्मान योजना के तहत पात्र लोगों को पांच लाख रुपये तक के निशुल्क उपचार की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। वहीं सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों और पेंशनधारियों के लिए गोल्डन कार्ड योजना लागू है। इस योजना के माध्यम से सरकारी सेवा से जुड़े लोगों और पात्र पेंशनधारियों को सूचीबद्ध अस्पतालों में उपचार की सुविधा दी जाती है।
हालांकि, समय के साथ दोनों योजनाओं के संचालन में कई तरह की वित्तीय और प्रशासनिक चुनौतियां सामने आई हैं। विशेष रूप से गोल्डन कार्ड योजना में अस्पतालों के बकाया भुगतान और गैप फंडिंग की समस्या लगातार कर्मचारियों के लिए परेशानी का कारण बन रही है।
क्यों उठी इंश्योरेंस मोड पर ले जाने की जरूरत?
स्वास्थ्य विभाग के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि योजनाओं का लाभ अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे, लेकिन सरकार पर खर्च का बोझ लगातार बढ़ता न जाए। अटल आयुष्मान योजना में बड़ी संख्या में लाभार्थियों के इलाज का खर्च राज्य सरकार द्वारा वहन किया जा रहा है। इलाज की लागत बढ़ने और अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने के साथ सरकारी व्यय भी बढ़ रहा है।
इसी वित्तीय दबाव को देखते हुए सरकार ने अटल आयुष्मान योजना को इंश्योरेंस मोड पर संचालित करने का फैसला किया है। इस मॉडल में सरकार एक निर्धारित प्रीमियम या तय वित्तीय व्यवस्था के माध्यम से बीमा आधारित स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ सकती है। इससे उपचार के खर्च का जोखिम अधिक व्यवस्थित तरीके से प्रबंधित करने की उम्मीद है।
सरकार का मानना है कि इंश्योरेंस मॉडल से योजना के खर्च का बेहतर अनुमान लगाया जा सकेगा और भविष्य में बजट प्रबंधन भी अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा।
गोल्डन कार्ड योजना बनी स्वास्थ्य विभाग के लिए बड़ी चुनौती
अटल आयुष्मान योजना को लेकर सरकार ने इंश्योरेंस मोड पर जाने की सहमति बना ली है, लेकिन गोल्डन कार्ड को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है। स्वास्थ्य विभाग के लिए फिलहाल गोल्डन कार्ड योजना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
इस योजना में सरकारी कर्मचारियों से अंशदान के रूप में धनराशि प्राप्त होती है। लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अनुसार कर्मचारियों के उपचार पर होने वाला खर्च कई बार प्राप्त अंशदान से काफी अधिक हो जाता है। परिणामस्वरूप योजना के तहत अस्पतालों को समय पर भुगतान नहीं हो पाता।
जब अस्पतालों को लंबे समय तक इलाज की रकम नहीं मिलती, तो कुछ अस्पताल गोल्डन कार्ड के माध्यम से मरीजों का उपचार करने से इनकार कर देते हैं। ऐसी स्थिति में कर्मचारी और उनके परिवार के सदस्य गंभीर परेशानी में पड़ जाते हैं। जिस योजना का उद्देश्य कर्मचारियों को बिना आर्थिक चिंता के बेहतर इलाज उपलब्ध कराना है, भुगतान संबंधी समस्याओं के कारण वही व्यवस्था कई बार विवाद का कारण बन जाती है।
कर्मचारियों की नाराजगी के बाद सरकार गंभीर
गोल्डन कार्ड योजना को लेकर कर्मचारियों में बढ़ती नाराजगी के बाद सचिवालय कर्मचारी संघ ने स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल के साथ मुलाकात कर समस्या के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। बैठक में अस्पतालों के भुगतान, बजट प्रावधान, गैप फंडिंग और इंश्योरेंस मॉडल सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार किया गया।
कर्मचारी संघ का कहना है कि गोल्डन कार्ड योजना जिस उद्देश्य से शुरू की गई थी, उसे उसी रूप में धरातल पर उतारना जरूरी है। यदि किसी कर्मचारी या उसके परिवार के सदस्य को बीमारी के समय अस्पताल पहुंचने के बाद भुगतान की समस्या के कारण उपचार में परेशानी होती है, तो इससे पूरी योजना की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
सचिवालय कर्मचारी संघ के अध्यक्ष दीपक जोशी ने भी इस समस्या को गंभीर बताते हुए कहा कि कर्मचारियों के इलाज से जुड़े बिलों का भुगतान समय पर अस्पतालों को नहीं हो पा रहा है। उन्होंने बजट प्रावधान के साथ-साथ इंश्योरेंस मोड और शिकायतों के समाधान के लिए कंप्लेंट पोर्टल जैसी व्यवस्थाओं पर भी चर्चा होने की बात कही।
75 करोड़ रुपये से बकाया भुगतान की कोशिश
सरकार ने गोल्डन कार्ड से जुड़े अस्पतालों के बकाया भुगतान की समस्या को देखते हुए हाल ही में राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण को 75 करोड़ रुपये उपलब्ध कराने का निर्णय लिया था। इसका उद्देश्य अस्पतालों की बकाया धनराशि का भुगतान करना और योजना को दोबारा व्यवस्थित ढंग से संचालित करना है।
हालांकि, सरकार सिर्फ तत्काल भुगतान की समस्या को दूर करने तक सीमित नहीं रहना चाहती। स्वास्थ्य विभाग अब ऐसी स्थायी व्यवस्था तैयार करने पर विचार कर रहा है, जिससे भविष्य में अस्पतालों के भुगतान में बार-बार संकट पैदा न हो।
यही वजह है कि इंश्योरेंस मॉडल को एक संभावित विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। यदि गोल्डन कार्ड को भी बीमा आधारित मॉडल में संचालित किया जाता है तो सरकार को पहले से वित्तीय योजना बनाने में मदद मिल सकती है और अस्पतालों के भुगतान को लेकर भी एक निश्चित तंत्र तैयार किया जा सकता है।
स्वास्थ्य मंत्री बोले- दोनों योजनाएं महत्वाकांक्षी
स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि गोल्डन कार्ड और आयुष्मान योजना दोनों ही सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य प्रदेश के लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा का कवच उपलब्ध कराना है।
उन्होंने बताया कि गोल्डन कार्ड योजना में सरकारी कर्मचारियों के साथ कुछ ऐसे पेंशनर्स भी शामिल हैं, जिन्होंने पहले इस योजना को अपनाया नहीं था, लेकिन अब वे इसमें शामिल होना चाहते हैं। ऐसे में लाभार्थियों की संख्या और भविष्य के खर्च को देखते हुए योजना की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा जरूरी हो गई है।
स्वास्थ्य मंत्री के मुताबिक सरकार यह देख रही है कि योजना की कमियों को किस तरह दूर किया जाए और साथ ही सरकार पर बढ़ रहे वित्तीय बोझ को भी नियंत्रित किया जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि गोल्डन कार्ड को इंश्योरेंस मोड पर ले जाने का फैसला मुख्यमंत्री के साथ चर्चा के बाद किया जाएगा।
पहले व्यवस्था सुधारना, फिर इंश्योरेंस मॉडल पर फैसला
सरकार गोल्डन कार्ड को सीधे इंश्योरेंस मोड में ले जाने के बजाय पहले मौजूदा व्यवस्था को बेहतर करने पर जोर दे रही है। स्वास्थ्य विभाग के सामने फिलहाल अस्पतालों के भुगतान, गैप फंडिंग और कर्मचारियों को समय पर उपचार उपलब्ध कराने जैसी चुनौतियां हैं।
स्वास्थ्य मंत्री ने संकेत दिया है कि इन समस्याओं को दूर करने के बाद ही इंश्योरेंस मॉडल को लेकर अंतिम फैसला किया जाएगा। सरकार ऐसा मॉडल चाहती है जिसमें कर्मचारियों को उपचार के लिए अस्पतालों के चक्कर न लगाने पड़ें और इलाज के समय भुगतान को लेकर किसी तरह की अनिश्चितता न हो।
इसके लिए एक मजबूत और पारदर्शी तंत्र की आवश्यकता होगी। इसमें अस्पतालों के क्लेम का समय पर निस्तारण, शिकायतों की निगरानी, लाभार्थियों को जानकारी उपलब्ध कराना और सरकार की वित्तीय जिम्मेदारी तय करना महत्वपूर्ण होगा।
कर्मचारियों के लिए क्या बदल सकता है?
यदि भविष्य में गोल्डन कार्ड योजना को इंश्योरेंस मोड पर लागू किया जाता है तो सरकारी कर्मचारियों और पेंशनधारियों के लिए योजना के संचालन में बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि नया मॉडल किस स्वरूप में लागू होगा और कर्मचारियों से अंशदान की मौजूदा व्यवस्था में क्या बदलाव किया जाएगा।
संभावित रूप से सरकार का ध्यान इस बात पर होगा कि कर्मचारी को अस्पताल में उपचार लेते समय भुगतान या स्वीकृति को लेकर अनावश्यक परेशानी न हो। अस्पतालों को भी उपचार के बाद क्लेम का भुगतान तय समयसीमा के भीतर मिलने की व्यवस्था की जा सकती है।
योजना का अंतिम स्वरूप मुख्यमंत्री स्तर पर चर्चा के बाद ही सामने आएगा। इसलिए फिलहाल कर्मचारियों और पेंशनधारियों के लिए किसी निश्चित बदलाव को लागू मानना जल्दबाजी होगी।
शिकायतों के समाधान के लिए कंप्लेंट पोर्टल पर भी जोर
गोल्डन कार्ड योजना से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण मांग शिकायतों के त्वरित समाधान की है। कर्मचारी संघ की ओर से कंप्लेंट पोर्टल को लेकर भी चर्चा की गई है। यदि इस तरह की व्यवस्था लागू होती है तो कर्मचारी अस्पताल द्वारा इलाज से इनकार करने, कार्ड स्वीकार नहीं करने, क्लेम में देरी या अन्य समस्याओं की शिकायत सीधे दर्ज करा सकेंगे।
एक प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली योजना की पारदर्शिता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। खासतौर पर गंभीर बीमारी या आपातकालीन स्थिति में मरीज और उसके परिजनों को यह पता होना जरूरी है कि समस्या आने पर वे किस अधिकारी या पोर्टल से तत्काल सहायता ले सकते हैं।
मानसून में स्वास्थ्य विभाग अलर्ट
गोल्डन कार्ड और आयुष्मान योजना के अलावा स्वास्थ्य विभाग मानसून के दौरान फैलने वाली बीमारियों को लेकर भी सतर्क है। स्वास्थ्य मंत्री ने अधिकारियों के साथ बैठक कर सभी मुख्य चिकित्सा अधिकारियों यानी सीएमओ को अलर्ट मोड पर रहने के निर्देश दिए हैं।
विशेष रूप से डेंगू और मलेरिया को लेकर अस्पतालों में तैयारियों की समीक्षा की जा रही है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में बेड और प्लेटलेट्स की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। साथ ही डेंगू और मलेरिया की सैंपलिंग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष डेंगू के मामले फिलहाल कम हैं। हालांकि मानसून के दौरान मच्छरों के प्रजनन और जलभराव के कारण मामलों में अचानक बढ़ोतरी की आशंका बनी रहती है। इसलिए विभाग किसी तरह की लापरवाही नहीं करना चाहता।
उत्तराखंड में अब तक डेंगू के 63 मामले
स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार उत्तराखंड में अब तक डेंगू के 63 मामले सामने आए हैं। इनमें से 62 मामले देहरादून जिले से संबंधित हैं। फिलहाल 10 मरीजों का उपचार चल रहा है, जबकि बाकी मरीज स्वस्थ हो चुके हैं।
स्वास्थ्य विभाग ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि डेंगू के संभावित मामलों की पहचान के लिए सैंपलिंग बढ़ाई जाए और अस्पतालों में जरूरी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। मानसून के दौरान स्वास्थ्य विभाग की चुनौती सिर्फ डेंगू और मलेरिया तक सीमित नहीं है, बल्कि जलजनित और अन्य मौसम जनित बीमारियों पर भी निगरानी रखनी होगी।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
आयुष्मान और गोल्डन कार्ड योजनाओं में बदलाव की पूरी कवायद को देखा जाए तो सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। पहली चुनौती है सरकारी वित्तीय बोझ को नियंत्रित करना, जबकि दूसरी चुनौती है लाभार्थियों को बिना किसी रुकावट के स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना।
यदि किसी योजना का खर्च सरकार की क्षमता से लगातार अधिक बढ़ता है तो लंबे समय में उसके संचालन पर दबाव आ सकता है। वहीं, यदि वित्तीय प्रबंधन के नाम पर लाभार्थियों को इलाज में परेशानी होती है तो योजना का मूल उद्देश्य ही प्रभावित हो जाएगा।
इसीलिए इंश्योरेंस मोड को लेकर सरकार का फोकस सिर्फ खर्च कम करने पर नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था तैयार करने पर होना चाहिए जो मरीज, कर्मचारी, अस्पताल और सरकार—सभी के लिए व्यावहारिक हो।
फैसले पर कर्मचारियों और आम जनता की नजर
अटल आयुष्मान योजना को इंश्योरेंस मोड पर ले जाने का निर्णय हो चुका है और इसकी प्रक्रिया जल्द शुरू होने की बात कही गई है। दूसरी तरफ गोल्डन कार्ड योजना के भविष्य को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ चर्चा के बाद अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
गोल्डन कार्ड से जुड़े कर्मचारी और पेंशनधारी उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार अस्पतालों के भुगतान और इलाज में आ रही दिक्कतों का स्थायी समाधान निकालेगी। वहीं आम जनता की नजर इस बात पर रहेगी कि अटल आयुष्मान योजना के इंश्योरेंस मोड में जाने के बाद पांच लाख रुपये तक के निशुल्क उपचार की मौजूदा सुविधा और लाभार्थियों की पहुंच पर क्या प्रभाव पड़ता है।
फिलहाल सरकार का लक्ष्य स्पष्ट दिखाई दे रहा है—स्वास्थ्य योजनाओं को वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाना और मरीजों को इलाज के लिए अस्पतालों में किसी तरह की परेशानी न होने देना। आने वाले दिनों में मुख्यमंत्री स्तर पर होने वाली चर्चा के बाद गोल्डन कार्ड योजना को लेकर तस्वीर और साफ हो सकती है। यदि सरकार अस्पतालों के भुगतान, शिकायत निवारण और इंश्योरेंस व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने में सफल रहती है, तो इससे प्रदेश के लाखों कर्मचारियों, पेंशनधारियों और उनके परिवारों को राहत मिलने की उम्मीद है।
