श्रीनगर गढ़वाल। उत्तराखंड के लिए गर्व का विषय है कि हिमालयी औषधीय एवं सुगंधित पौधों की वैज्ञानिक खेती, जैव विविधता संरक्षण और किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध केंद्र (हैप्रेक) के निदेशक डॉ. विजयकांत पुरोहित को प्रतिष्ठित ‘कर्मयोगी सम्मान’ से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन्हें पिछले दो दशकों से अधिक समय से हिमालयी क्षेत्रों में औषधीय पौधों की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देने, किसानों को प्रशिक्षण देने तथा पर्वतीय क्षेत्रों की जैव विविधता के संरक्षण में दिए गए उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया गया।
यह सम्मान केवल डॉ. पुरोहित की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध हिमालयी जैव विविधता, वैज्ञानिक कृषि और ग्रामीण विकास की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की राष्ट्रीय स्तर पर मिली महत्वपूर्ण पहचान भी है।
चमोली में आयोजित कार्यक्रम में मिला सम्मान
डॉ. विजयकांत पुरोहित को यह सम्मान जनपद चमोली के नंदानगर स्थित सितेल में आयोजित जड़ी-बूटी प्रशिक्षण एवं वितरण कार्यक्रम के दौरान प्रदान किया गया। कार्यक्रम का आयोजन नेचर ऑर्गेनिक सोसायटी, नंदानगर (चमोली) तथा उद्योगिनी संस्था, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।
व्यस्तता के कारण डॉ. पुरोहित स्वयं कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके। उनकी ओर से उनके प्रतिनिधि डॉ. जयदेव चौहान ने यह सम्मान ग्रहण किया। समारोह में बड़ी संख्या में किसान, जड़ी-बूटी उत्पादक, शोधकर्ता, पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे। सभी ने डॉ. पुरोहित के कार्यों की सराहना करते हुए इसे उत्तराखंड के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया।
वैज्ञानिक शोध को खेतों तक पहुंचाने वाले वैज्ञानिक
कार्यक्रम में नेचर ऑर्गेनिक सोसायटी के संस्थापक पुष्कर सिंह बिष्ट और उद्योगिनी संस्था, नई दिल्ली के प्रोजेक्ट मैनेजर शिवम पंत ने कहा कि डॉ. विजयकांत पुरोहित ने वैज्ञानिक अनुसंधान को केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे किसानों के खेतों तक पहुंचाकर वास्तविक परिवर्तन का माध्यम बनाया।
उन्होंने बताया कि डॉ. पुरोहित के नेतृत्व में अनेक शोध परियोजनाओं के माध्यम से किसानों को औषधीय एवं सुगंधित पौधों की वैज्ञानिक खेती की आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया। इससे किसानों को पारंपरिक खेती के साथ-साथ आय के नए स्रोत भी प्राप्त हुए।
औषधीय पौधों की खेती से बढ़ी किसानों की आय
डॉ. विजयकांत पुरोहित के मार्गदर्शन में चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़, बागेश्वर और अन्य सीमांत पर्वतीय जिलों के अनेक किसानों ने औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती को अपनाया है।
इन क्षेत्रों में अश्वगंधा, कुटकी, जटामांसी, तेजपत्ता, लेमनग्रास, रोजमेरी और अन्य औषधीय पौधों की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा मिला है। इसका सकारात्मक प्रभाव किसानों की आय पर पड़ा है और कई परिवारों की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक खेती के साथ औषधीय पौधों की वैज्ञानिक खेती भविष्य में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
हिमालयी जैव विविधता संरक्षण में अहम भूमिका
उत्तराखंड की पहचान केवल प्राकृतिक सौंदर्य से ही नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध जैव विविधता और दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों से भी है। बढ़ते पर्यावरणीय दबाव और अनियंत्रित दोहन के कारण कई महत्वपूर्ण औषधीय प्रजातियां संकट में हैं।
डॉ. विजयकांत पुरोहित ने अपने शोध और संरक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से इन बहुमूल्य वनस्पतियों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया। उन्होंने किसानों और स्थानीय समुदायों को यह समझाया कि वैज्ञानिक खेती अपनाकर प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए भी बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
उनके प्रयासों से जैव विविधता संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली है।
युवाओं के लिए बने प्रेरणा स्रोत
डॉ. पुरोहित का मानना है कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार की सबसे बड़ी संभावना स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग में छिपी हुई है। इसी सोच के साथ उन्होंने युवाओं को औषधीय पौधों की खेती, पौध उत्पादन, प्रसंस्करण और जड़ी-बूटी आधारित उद्यमों की ओर प्रेरित किया।
आज अनेक युवा स्वरोजगार अपनाकर औषधीय एवं सुगंधित पौधों पर आधारित व्यवसाय शुरू कर चुके हैं। इससे पलायन रोकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में भी सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
वैज्ञानिक कृषि को मिला नया आयाम
विशेषज्ञों का कहना है कि डॉ. विजयकांत पुरोहित ने वैज्ञानिक कृषि को पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने आधुनिक अनुसंधान, स्थानीय ज्ञान और किसानों के अनुभवों को जोड़ते हुए ऐसी तकनीकों को बढ़ावा दिया, जो पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी लाभदायक हैं।
इसी कारण आज उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती एक सफल वैकल्पिक कृषि मॉडल के रूप में उभर रही है।
उत्तराखंड के लिए गौरव का क्षण
कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने विश्वास जताया कि डॉ. विजयकांत पुरोहित भविष्य में भी सीमांत क्षेत्रों के किसानों का मार्गदर्शन करते रहेंगे और हिमालयी जैव विविधता संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के संवर्धन तथा समाजहित के कार्यों में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते रहेंगे।
उन्होंने कहा कि डॉ. पुरोहित को मिला ‘कर्मयोगी सम्मान’ उन सभी वैज्ञानिकों, किसानों और संस्थाओं के प्रयासों का भी सम्मान है, जो हिमालयी क्षेत्रों में सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य कर रहे हैं।
