देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला रसीला और स्वादिष्ट माल्टा अब अपनी नई पहचान बनाने की ओर बढ़ रहा है। वर्षों से बिना रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उगाए जाने वाले इस पारंपरिक फल को अब पहली बार ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन दिलाने की तैयारी शुरू हो गई है। कृषि एवं उद्यान विभाग की इस महत्वपूर्ण पहल से न केवल उत्तराखंड के माल्टे को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलेगी, बल्कि हजारों किसानों और बागवान परिवारों की आय बढ़ाने का रास्ता भी खुलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना सफल होती है तो उत्तराखंड का माल्टा केवल एक स्थानीय फल नहीं रहेगा, बल्कि “ऑर्गेनिक हिमालयन प्रोडक्ट” के रूप में दुनिया के प्रीमियम बाजारों तक अपनी मजबूत पहचान बना सकेगा। यह कदम राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था और पहाड़ के किसानों के भविष्य के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है।
पहाड़ का माल्टा बनेगा अंतरराष्ट्रीय ब्रांड
उत्तराखंड के पहाड़ों में उगने वाला माल्टा अपने रस, स्वाद, प्राकृतिक मिठास और सुगंध के कारण वर्षों से लोगों की पहली पसंद रहा है। लेकिन गुणवत्ता के बावजूद इसे वह बाजार नहीं मिल पाया जिसकी यह वास्तविक क्षमता रखता था।
अब राज्य सरकार और कृषि एवं उद्यान विभाग इसे बदलने की दिशा में काम कर रहे हैं। ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन मिलने के बाद उत्तराखंड का माल्टा प्रमाणित प्राकृतिक उत्पाद के रूप में देश के बड़े शहरों, सुपरमार्केट, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच सकेगा।
इन जिलों में बड़े पैमाने पर होती है माल्टे की खेती
उत्तराखंड के कई पर्वतीय जिलों में माल्टा किसानों की आय का प्रमुख स्रोत है। इनमें—
- अल्मोड़ा
- नैनीताल
- बागेश्वर
- पिथौरागढ़
- चंपावत
- चमोली
- रुद्रप्रयाग
- टिहरी गढ़वाल
- पौड़ी गढ़वाल
- देहरादून के पर्वतीय क्षेत्र
शामिल हैं।
इन क्षेत्रों की ऊंचाई, जलवायु, शुद्ध वातावरण और प्राकृतिक मिट्टी माल्टे की खेती के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है। यही कारण है कि यहां पैदा होने वाला माल्टा स्वाद और गुणवत्ता के मामले में देश के अन्य राज्यों से अलग पहचान रखता है।
प्राकृतिक खेती के बावजूद नहीं मिल रही थी सही कीमत
विडंबना यह रही कि उत्तराखंड के अधिकांश किसान वर्षों से बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्राकृतिक खेती करते रहे हैं, लेकिन उनके पास ऑर्गेनिक प्रमाणपत्र नहीं होने के कारण बाजार में उनके उत्पाद को सामान्य फल की तरह ही बेचा जाता था।
इसका सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता था। जिस माल्टे की गुणवत्ता और शुद्धता कहीं बेहतर थी, उसकी कीमत भी सामान्य फलों के बराबर ही मिलती थी।
अब ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन मिलने के बाद यही माल्टा प्रीमियम श्रेणी में बिक सकेगा और किसानों को अपनी मेहनत का वास्तविक मूल्य मिलने की उम्मीद है।
क्या होता है ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन?
ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन केवल किसी खेत या किसान को दिया जाने वाला प्रमाणपत्र नहीं होता, बल्कि यह पूरी खेती प्रक्रिया का वैज्ञानिक और तकनीकी सत्यापन होता है।
इस प्रक्रिया के दौरान यह सुनिश्चित किया जाता है कि—
- खेती में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग नहीं हुआ हो।
- प्रतिबंधित कीटनाशकों का प्रयोग न किया गया हो।
- उत्पादन पूरी तरह प्राकृतिक मानकों के अनुरूप हो।
- खेती का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रखा गया हो।
- अधिकृत एजेंसियां समय-समय पर निरीक्षण करती रहें।
सभी मानकों को पूरा करने के बाद ही किसानों या उत्पादन क्षेत्र को ऑर्गेनिक प्रमाणपत्र जारी किया जाता है।
किसानों की आय में होगा बड़ा बदलाव
विशेषज्ञों का कहना है कि आज केवल उत्पादन बढ़ा देने से किसानों की आय नहीं बढ़ती। वास्तविक लाभ तब मिलता है जब उत्पाद की ब्रांडिंग, गुणवत्ता प्रमाणन और मूल्य संवर्धन किया जाए।
ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन मिलने के बाद—
- किसानों को बेहतर बाजार मिलेगा।
- उत्पाद की कीमत सामान्य माल्टे की तुलना में अधिक मिलेगी।
- बड़े रिटेल चेन सीधे खरीदारी कर सकेंगे।
- ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बिक्री आसान होगी।
- निर्यात की संभावनाएं बढ़ेंगी।
- स्थानीय बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी।
यानी किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना है।
विदेशों में लगातार बढ़ रही है ऑर्गेनिक उत्पादों की मांग
पूरी दुनिया में स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे उपभोक्ता अब रसायनमुक्त और प्रमाणित ऑर्गेनिक उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
यूरोप, अमेरिका, जापान और खाड़ी देशों में ऑर्गेनिक फलों की मांग लगातार बढ़ रही है। यदि उत्तराखंड का माल्टा इस श्रेणी में अपनी जगह बना लेता है तो राज्य के किसानों के लिए निर्यात के नए अवसर खुल सकते हैं।
माल्टा केवल स्वाद नहीं, स्वास्थ्य का भी खजाना
माल्टा पोषण के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण फल माना जाता है।
इसमें भरपूर मात्रा में—
- विटामिन-सी
- एंटीऑक्सीडेंट
- फाइबर
- कैल्शियम
- पोटैशियम
- प्राकृतिक मिनरल्स
पाए जाते हैं।
यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, पाचन तंत्र को मजबूत करने, त्वचा को स्वस्थ रखने और ऊर्जा प्रदान करने में मददगार माना जाता है।
यही वजह है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी प्राकृतिक फलों के सेवन पर विशेष जोर देते हैं।
प्रोसेसिंग से कई गुना बढ़ सकती है कमाई
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केवल ताजा माल्टा बेचने के बजाय उससे विभिन्न उत्पाद तैयार किए जाएं तो किसानों की आय कई गुना बढ़ सकती है।
माल्टे से तैयार किए जा सकते हैं—
- जूस
- स्क्वैश
- जैम
- मुरब्बा
- कैंडी
- सिरप
- ड्राई फ्रूट मिक्स
- हेल्थ ड्रिंक
ऑर्गेनिक प्रमाणन मिलने के बाद इन उत्पादों की मांग देश-विदेश के बाजारों में और अधिक बढ़ सकती है।
महिला स्वयं सहायता समूहों को भी मिलेगा लाभ
यदि माल्टे की प्रोसेसिंग स्थानीय स्तर पर शुरू होती है तो इसका सबसे बड़ा लाभ महिला स्वयं सहायता समूहों को भी मिलेगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-छोटे प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित कर महिलाओं को रोजगार दिया जा सकता है।
इससे—
- स्थानीय रोजगार बढ़ेगा।
- पलायन कम होगा।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
- महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ेगी।
सरकार का ऑर्गेनिक खेती पर विशेष फोकस
उत्तराखंड सरकार पिछले कई वर्षों से प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दे रही है।
किसानों को रसायनमुक्त खेती अपनाने, किसान उत्पादक संगठनों (FPO), मूल्य संवर्धन, आधुनिक पैकेजिंग और बेहतर मार्केटिंग के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सहायता दी जा रही है।
अब माल्टा जैसे पारंपरिक फलों को ऑर्गेनिक पहचान दिलाने की दिशा में भी तेजी से कार्य किया जा रहा है।
क्या कहते हैं कृषि एवं उद्यान विभाग के सचिव?
कृषि एवं उद्यान विभाग के सचिव एस.एन. पांडे का कहना है कि विभाग का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना है।
उनके अनुसार—
“ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन, गुणवत्ता सुधार, ब्रांडिंग और बेहतर मार्केटिंग के माध्यम से किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। प्रमाणित ऑर्गेनिक उत्पाद उत्तराखंड की नई पहचान बन सकते हैं।”
किसानों में बढ़ी उम्मीद
चकराता सहित विभिन्न पर्वतीय क्षेत्रों के किसान भी इस पहल से बेहद उत्साहित हैं।
ऑर्गेनिक खेती से जुड़े किसान गोपाल का कहना है कि वे वर्षों से बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के खेती कर रहे हैं, लेकिन प्रमाणन नहीं होने के कारण उन्हें बाजार में अतिरिक्त लाभ नहीं मिल पाता।
उनका मानना है कि यदि सरकार की यह योजना पूरी तरह लागू होती है तो पहाड़ का माल्टा देश ही नहीं बल्कि दुनिया के बाजारों में नई पहचान बनाएगा और इसका सीधा लाभ हजारों बागवान परिवारों को मिलेगा।
ब्रांड बनेगा तो बदलेगी पहाड़ की तस्वीर
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड की कृषि को केवल उत्पादन आधारित नहीं बल्कि ब्रांड आधारित कृषि मॉडल की ओर ले जाना समय की जरूरत है।
जिस प्रकार दार्जिलिंग की चाय, कश्मीर का केसर, नागपुर का संतरा और हिमाचल का सेब अपनी विशेष पहचान बना चुके हैं, उसी प्रकार उत्तराखंड का माल्टा भी “हिमालयन ऑर्गेनिक माल्टा” के रूप में वैश्विक बाजार में अपनी अलग जगह बना सकता है।
यदि सरकार, कृषि विभाग, किसान उत्पादक संगठन, स्वयं सहायता समूह और निजी क्षेत्र मिलकर इस दिशा में काम करते हैं तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड का माल्टा राज्य की अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बन सकता है।
पहाड़ के किसानों के लिए सुनहरा अवसर
ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन की यह पहल केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पर्वतीय किसानों के भविष्य को नई दिशा देने वाला कदम है। इससे प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन मिलेगा, किसानों की मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा, स्थानीय उत्पादों की वैश्विक पहचान बनेगी और पहाड़ की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। यदि योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो आने वाले समय में उत्तराखंड का माल्टा केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि गुणवत्ता, शुद्धता और विश्वसनीय ऑर्गेनिक ब्रांड के रूप में देश-दुनिया में जाना जाएगा।
