नई दिल्ली: NEET पेपर लीक मामले को लेकर देशभर में हुए छात्र आंदोलनों और जंतर-मंतर पर हुए विरोध-प्रदर्शन के बाद दर्ज एफआईआर, पुलिस कार्रवाई और कथित हिंसा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों और हिंसा में शामिल अपराधियों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। अदालत ने कहा कि जिन छात्रों का कोई गंभीर आपराधिक इतिहास नहीं है, उनके साथ न्याय होना चाहिए, लेकिन हत्या, बलात्कार या अन्य जघन्य अपराधों के आरोपी किसी भी सूरत में राहत के पात्र नहीं होंगे।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए विशेष जांच दल (SIT) या किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में हाई-पावर्ड कमेटी गठित करने पर विचार किया जा सकता है।
क्या है पूरा मामला?
देशभर में NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में अनियमितताओं के विरोध में हजारों छात्र सड़कों पर उतरे थे। दिल्ली के जंतर-मंतर सहित कई राज्यों में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए। कुछ स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक हो गया, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं तथा कई पुलिसकर्मी घायल हुए। इसके बाद दिल्ली समेत कई राज्यों में बड़ी संख्या में एफआईआर दर्ज की गईं।
इन एफआईआर में कई जगह हजारों अज्ञात लोगों को भी आरोपी बनाया गया, जिससे ऐसे छात्रों में भी भय का माहौल बन गया जो केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल हुए थे। इसी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं।
घायल पुलिसकर्मियों के परिवार भी पहुंचे सुप्रीम कोर्ट
इस बार सुनवाई के दौरान एक नया पक्ष भी सामने आया। जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिवारों ने भी सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर स्वयं को पक्षकार बनाए जाने की मांग की। उनका कहना है कि ड्यूटी के दौरान पुलिस अधिकारियों पर हमला करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए और कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले कर्मियों को न्याय मिलना चाहिए।
छात्रों और अपराधियों को अलग-अलग देखने की जरूरत
सुनवाई के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने अदालत को बताया कि कई राज्यों में हजारों अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी गई हैं। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पटना की एक एफआईआर में 152 नामजद और 5,000 अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है। ऐसे में किसी भी छात्र को कभी भी आरोपी बनाया जा सकता है।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सबसे पहले यह तय करना होगा कि कौन छात्र है और कौन हिंसा में शामिल आपराधिक तत्व। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसियों को इन दोनों श्रेणियों को अलग-अलग करके कार्रवाई करनी होगी।
सॉलिसिटर जनरल ने सरकार का पक्ष रखा
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि सरकार अपने वादे को लेकर गंभीर है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी छात्रों के मामलों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा, लेकिन ऐसे लोगों को नहीं छोड़ा जा सकता जो जानबूझकर हिंसा फैलाकर पूरे आंदोलन को भड़काने की कोशिश कर रहे थे।
उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि अब तक 2,738 ऐसे लोगों की पहचान की जा चुकी है जिन पर हत्या, बलात्कार या अन्य गंभीर अपराधों के आरोप हैं। ऐसे लोगों को किसी भी प्रकार की राहत देना कानून और समाज दोनों के हित में नहीं होगा।
FIR वापस लेने या बंद करने पर क्या बोला कोर्ट?
सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द (Quash) किया जाए या क्लोजर रिपोर्ट के जरिए वापस लिया जाए।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि भारतीय आपराधिक कानून में ऐसे मामलों को वापस लेने की कानूनी व्यवस्था उपलब्ध है। यदि जांच में यह स्पष्ट हो जाए कि संबंधित व्यक्ति केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल था और उसके खिलाफ कोई गंभीर अपराध नहीं बनता, तो सरकार कानून के अनुसार मामला वापस ले सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें कानून के दायरे में रहकर छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने या बंद करने का निर्णय ले सकती हैं।
‘आपराधिक इतिहास’ का क्या मतलब है?
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत से कहा कि पिछले आदेश में प्रयुक्त “आपराधिक इतिहास” शब्द को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति पर ट्रैफिक नियम तोड़ने, पुराने राजनीतिक आंदोलन में शामिल होने या किसी छोटे विवाद का मामला भी दर्ज हो सकता है। ऐसे मामलों को गंभीर आपराधिक इतिहास नहीं माना जाना चाहिए।
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने स्पष्ट किया कि अदालत का आशय केवल हत्या, बलात्कार और अन्य जघन्य अपराधों से है। अदालत ने आदेश में यह भी स्पष्ट कर दिया कि “आपराधिक इतिहास” का अर्थ केवल गंभीर अपराधों से जुड़े आरोपी हैं, न कि सामान्य या मामूली मामलों में नाम आने वाले लोग।
हाई-पावर्ड कमेटी बनाने पर भी विचार
याचिकाकर्ताओं ने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसके सामने दो विकल्प हैं—
- पुलिस अधिकारियों की विशेष जांच दल (SIT) द्वारा जांच।
- किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति का गठन।
अदालत ने संकेत दिया कि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए इन विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।
फेशियल सर्विलांस पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि प्रदर्शन स्थल पर बड़े पैमाने पर फेशियल रिकग्निशन और निगरानी तकनीक का इस्तेमाल किया गया। उनका कहना था कि प्रदर्शनकारियों से कोई सहमति नहीं ली गई और यह निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
अदालत ने इस मुद्दे को भी गंभीर माना और संकेत दिया कि भविष्य की सुनवाई में इस पहलू पर भी विस्तार से विचार किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश
सुनवाई के अंत में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों की रक्षा करना चाहती है, लेकिन उनकी आड़ में छिपे अपराधियों को किसी भी तरह का संरक्षण नहीं दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी पुलिस अधिकारी ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है तो उसके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई होगी।
अदालत का संदेश साफ है कि लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन का अधिकार सुरक्षित है, लेकिन हिंसा, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना या पुलिस पर हमला किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
आगे क्या होगा?
अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर है। केंद्र और राज्य सरकारों से एफआईआर का विस्तृत ब्यौरा मांगा गया है। साथ ही यह भी तय किया जाएगा कि किन छात्रों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लिए जा सकते हैं और किन मामलों में जांच आगे बढ़ेगी। यदि हाई-पावर्ड कमेटी या विशेष जांच दल का गठन होता है, तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच का रास्ता और मजबूत हो सकता है।
इस सुनवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश की सर्वोच्च अदालत शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार और कानून-व्यवस्था—तीनों के बीच संतुलन बनाए रखने के पक्ष में है। वहीं, अदालत ने यह भी दोहराया कि निर्दोष छात्रों को राहत मिलेगी, लेकिन हिंसा और गंभीर अपराधों में शामिल लोगों को कानून के दायरे से बाहर नहीं जाने दिया जाएगा।
