गुवाहाटी। असम की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा मामला चर्चा का केंद्र बना हुआ है, जिसने राजनीतिक जवाबदेही, पारिवारिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर नई बहस छेड़ दी है। राज्य सरकार में वरिष्ठ मंत्री केशव महंता की बेटी के नीट पेपर लीक के विरोध में आयोजित छात्र प्रदर्शन में शामिल होने के बाद विपक्ष और सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। इस पूरे विवाद के बीच मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने खुलकर अपने मंत्री का बचाव किया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि वयस्क बच्चों की राजनीतिक सोच और उनके फैसलों के लिए माता-पिता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब मंत्री केशव महंता की बेटी दिबिसा महंता के छात्र आंदोलन में शामिल होने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के खिलाफ नारेबाजी का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक दलों और सोशल मीडिया पर कई लोगों ने मंत्री केशव महंता को निशाने पर लेना शुरू कर दिया। हालांकि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस पूरे मामले को अलग नजरिए से देखते हुए कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर वयस्क नागरिक को अपनी राय रखने और अपनी राजनीतिक सोच व्यक्त करने का अधिकार है।
मुख्यमंत्री ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि परिवार के सभी सदस्य एक जैसी राजनीतिक विचारधारा रखें, यह जरूरी नहीं है। उन्होंने अपने निजी जीवन का उदाहरण देते हुए कहा, “मेरा भाई भी मेरी हर बात नहीं मानता और मेरे बच्चे भी मेरी कई बातें नहीं मानते। इसलिए किसी बच्चे के विचारों या उसके फैसलों के लिए उसके माता-पिता को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है।” उनके इस बयान को कई राजनीतिक विश्लेषक लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन मान रहे हैं।
हिमंता बिस्वा सरमा ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में जो बातें कही गईं, उनसे उन्हें व्यक्तिगत रूप से दुख पहुंचा है। उन्होंने कहा कि जब अवसर मिलेगा तो वह संबंधित व्यक्ति से इस विषय पर बातचीत करेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत राय के कारण उसके माता-पिता को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है।
मुख्यमंत्री ने मंत्री केशव महंता की वर्तमान जिम्मेदारियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस समय असम के कई इलाके भीषण बाढ़ की चपेट में हैं और मंत्री केशव महंता राहत एवं बचाव कार्यों में पूरी तरह जुटे हुए हैं। ऐसे समय में उन पर अतिरिक्त राजनीतिक या मानसिक दबाव बनाना राज्यहित में नहीं होगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का पहला दायित्व बाढ़ प्रभावित लोगों तक राहत पहुंचाना है और मंत्री उसी जिम्मेदारी को निभा रहे हैं।
उन्होंने आगे कहा कि यदि भविष्य में उनका अपना बेटा भी कोई ऐसा कदम उठाता है जिससे वह व्यक्तिगत रूप से सहमत न हों, तब भी उसे केवल उसी के कार्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि हो सकता है भविष्य में उनका बेटा वकील बने और किसी ऐसे व्यक्ति का पक्ष रखे जिससे उनकी व्यक्तिगत सहमति न हो, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होगा कि पिता को उसके हर निर्णय के लिए जिम्मेदार माना जाए। उनके अनुसार, बच्चों के वयस्क होने के बाद उनकी स्वतंत्र सोच और निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए।
दरअसल, पूरा मामला देशभर में चर्चित नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में अनियमितताओं के विरोध से जुड़ा है। इसी मुद्दे को लेकर गुवाहाटी में छात्रों ने प्रदर्शन आयोजित किया था, जिसमें बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। इस प्रदर्शन में मंत्री केशव महंता की बेटी दिबिसा महंता भी शामिल हुईं। प्रदर्शन के दौरान उन्होंने कथित रूप से केंद्रीय शिक्षा मंत्री के खिलाफ नारे लगाए, जिसके बाद इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
वीडियो वायरल होने के बाद विपक्षी दलों ने सरकार पर सवाल उठाए और मंत्री केशव महंता को घेरने की कोशिश की। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इस मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं दीं। हालांकि मुख्यमंत्री के बयान के बाद इस बहस का केंद्र केवल प्रदर्शन नहीं रहा, बल्कि यह मुद्दा व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राजनीतिक जवाबदेही तक पहुंच गया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का बयान केवल अपने सहयोगी मंत्री के बचाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्तिगत विचारों की स्वतंत्रता का संदेश भी देता है। उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि किसी भी लोकतंत्र में वयस्क नागरिक अपने विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकते हैं और उनके विचारों के आधार पर उनके परिवार या माता-पिता को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं माना जाना चाहिए।
फिलहाल यह मामला राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। एक ओर विपक्ष सरकार को घेरने का प्रयास कर रहा है, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री का बयान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और इसका राजनीतिक प्रभाव असम की राजनीति पर कितना पड़ता है।
