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2 रुपये के इनाम ने बचा लिए हजारों पेड़: डिंडोरी में ग्रामीण बने जंगलों के असली योद्धा

The Hill India News
Last updated: July 17, 2026 11:40 am
The Hill India News
Published: July 17, 2026
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डिंडोरी (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले से वन संरक्षण की एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने यह साबित कर दिया कि यदि प्रशासन और स्थानीय समुदाय एक साथ मिलकर काम करें तो बड़े से बड़ा पर्यावरणीय संकट भी टाला जा सकता है। साल के घने जंगलों पर मंडरा रहे खतरनाक साल बोरर कीट के प्रकोप को रोकने के लिए वन विभाग ने एक अनोखी पहल शुरू की। विभाग ने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति साल बोरर कीट का सिर लाकर जमा करेगा, उसे प्रति कीट 2 रुपये का इनाम दिया जाएगा। इस छोटी-सी पहल ने देखते ही देखते जनआंदोलन का रूप ले लिया और अब तक ग्रामीण लगभग 10 लाख से अधिक कीटों के सिर वन विभाग को सौंप चुके हैं। इससे हजारों साल के पेड़ों को बचाने की उम्मीद मजबूत हुई है और वन संरक्षण का यह मॉडल पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है।

डिंडोरी जिले के करंजिया, समनापुर और बजाग वन परिक्षेत्र में फैले विशाल साल के जंगल मध्य प्रदेश की प्राकृतिक धरोहर माने जाते हैं। इन जंगलों पर हाल के दिनों में साल बोरर नामक कीट का गंभीर हमला देखने को मिला। यह कीट देखने में भले ही छोटा हो, लेकिन इसका प्रभाव बेहद विनाशकारी होता है। यह पेड़ों के तनों के भीतर सुरंग बनाकर उनकी अंदरूनी संरचना को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। बाहर से पेड़ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन अंदर से पूरी तरह खोखला हो जाता है। समय रहते इस कीट पर नियंत्रण नहीं किया जाए तो बड़ी संख्या में पेड़ सूख सकते हैं और पूरे वन क्षेत्र को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

वन विभाग के अधिकारियों ने खतरे की गंभीरता को समझते हुए पारंपरिक तरीकों से हटकर एक नई रणनीति अपनाई। विभाग ने स्थानीय ग्रामीणों को इस अभियान का हिस्सा बनाने का निर्णय लिया और प्रति कीट दो रुपये का प्रोत्साहन देने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के बाद जंगलों से जुड़े गांवों के लोगों ने बड़ी संख्या में अभियान में भाग लेना शुरू कर दिया। ग्रामीण संक्रमित पेड़ों की पहचान करते हैं, उनमें छिपे साल बोरर कीटों को बाहर निकालते हैं, उनके सिर अलग करते हैं और उन्हें वन विभाग के संग्रहण केंद्रों में जमा कराते हैं। कई स्थानों पर ग्रामीणों ने कीटों के सिर की मालाएं बनाकर अधिकारियों को सौंपीं, जो इस अभियान के प्रति उनके उत्साह और सहभागिता का प्रतीक बन गईं।

वन विभाग के अनुसार अब तक करीब 10 लाख साल बोरर कीटों के सिर जमा किए जा चुके हैं। यह आंकड़ा केवल एक सरकारी अभियान की सफलता नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय की जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनकी जिम्मेदारी को भी दर्शाता है। ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी से जंगलों में कीटों की संख्या कम करने में उल्लेखनीय सफलता मिली है। अधिकारियों का मानना है कि यदि इसी तरह अभियान जारी रहा तो आने वाले समय में लाखों साल के पेड़ों को बचाया जा सकेगा और जंगलों का प्राकृतिक संतुलन भी सुरक्षित रहेगा।

वन विभाग के एसडीओ सुरेंद्र कुमार जाटव ने बताया कि साल बोरर कीट का प्रकोप इस समय डिंडोरी जिले के कई वन क्षेत्रों में देखा जा रहा है। यह कीट पेड़ों के तने के भीतर प्रवेश कर लकड़ी को नुकसान पहुंचाता है, जिससे पेड़ों की मजबूती समाप्त होने लगती है। ऐसे पेड़ धीरे-धीरे सूख जाते हैं और अंततः गिर जाते हैं। उन्होंने बताया कि वन विभाग लगातार प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी कर रहा है और ग्रामीणों के सहयोग से इस खतरे को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है।

वन विभाग के कर्मचारियों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब साल बोरर कीट ने जंगलों को नुकसान पहुंचाया हो। बीट गार्ड रघुनाथ प्रजापति के अनुसार वर्ष 1998 में भी इस कीट ने व्यापक तबाही मचाई थी। उस समय लाखों साल के पेड़ों को काटना पड़ा था क्योंकि वे पूरी तरह संक्रमित और कमजोर हो चुके थे। इससे वन संपदा को भारी नुकसान हुआ था और पर्यावरण पर भी गंभीर प्रभाव पड़ा था। उसी अनुभव से सीख लेते हुए इस बार वन विभाग ने शुरुआत में ही कड़े कदम उठाए, ताकि स्थिति पहले जैसी न बनने पाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि साल के जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि ये पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। इन जंगलों में अनेक वन्यजीव, पक्षी, कीट और पौधों की प्रजातियां निवास करती हैं। साथ ही हजारों आदिवासी और ग्रामीण परिवार अपनी आजीविका के लिए इन्हीं जंगलों पर निर्भर रहते हैं। यदि साल के पेड़ों को बड़े पैमाने पर नुकसान होता है तो इसका असर केवल वन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन पर भी पड़ेगा। यही कारण है कि वन विभाग इस अभियान को केवल कीट नियंत्रण नहीं, बल्कि पूरे वन इकोसिस्टम की सुरक्षा का अभियान मान रहा है।

इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें ग्रामीणों को केवल मजदूर या सहयोगी नहीं, बल्कि साझेदार बनाया गया है। गांवों के लोग स्वयं जंगलों की निगरानी कर रहे हैं, संक्रमित पेड़ों की पहचान कर रहे हैं और वन विभाग को समय पर सूचना भी दे रहे हैं। इससे विभाग को कीटों के फैलाव को शुरुआती स्तर पर रोकने में मदद मिल रही है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जंगल उनके जीवन का आधार हैं। जंगल सुरक्षित रहेंगे तो जल स्रोत सुरक्षित रहेंगे, वन उपज मिलेगी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा। इसी भावना के साथ लोग इस अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

ग्रामीण सुखनंदन, कुंवरवती बाई और लल्ली बाई सहित कई लोगों ने बताया कि पहले उन्हें इस कीट के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन वन विभाग ने प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें इसके खतरे और पहचान के बारे में बताया। इसके बाद गांव के लोग स्वयं इस अभियान से जुड़ गए। उनका कहना है कि दो रुपये का इनाम केवल एक प्रोत्साहन है, असली उद्देश्य जंगलों को बचाना है क्योंकि जंगल ही उनकी आजीविका और जीवन का आधार हैं।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे वन क्षेत्रों में भी वन विभाग ने निगरानी बढ़ा दी है। विशेषज्ञ लगातार प्रभावित इलाकों का सर्वेक्षण कर रहे हैं और आवश्यकता पड़ने पर अन्य वैज्ञानिक उपाय भी अपनाए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि यदि समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो साल बोरर कीट तेजी से फैल सकता है, इसलिए रोकथाम और जनभागीदारी दोनों समान रूप से जरूरी हैं।

डिंडोरी का यह अभियान अब पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरा है। यह पहल दिखाती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों की भागीदारी से ही स्थायी सफलता मिल सकती है। दो रुपये के छोटे से प्रोत्साहन ने हजारों ग्रामीणों को जंगल बचाने की मुहिम से जोड़ दिया और लाखों कीटों का सफाया कर दिया। यह मॉडल अन्य राज्यों के वन क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है, जहां कीटों या अन्य प्राकृतिक चुनौतियों से जंगलों को खतरा बना रहता है।

वन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी तरह समाज और प्रशासन मिलकर प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए कार्य करें तो जंगलों को होने वाले बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। डिंडोरी की यह पहल केवल एक सफल अभियान नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि प्रकृति की रक्षा तभी संभव है जब हर नागरिक स्वयं को उसका जिम्मेदार संरक्षक माने। यही कारण है कि आज डिंडोरी के ग्रामीण केवल गांव के निवासी नहीं, बल्कि देश के जंगलों के असली योद्धा बनकर सामने आए हैं।

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