कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सियासत और आर्थिक इतिहास में आज यानी सोमवार का दिन एक बहुत बड़े और युगांतरकारी मोड़ के रूप में दर्ज होने जा रहा है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नवनिर्वाचित भाजपा सरकार आज राज्य की विधानसभा में बंगाल का पहला पूर्ण बजट पेश करने जा रही है। दोपहर करीब 12 बजे पटल पर रखे जाने वाले इस बजट पर न केवल बंगाल, बल्कि देश भर के नीति-नियंताओं, उद्योगपतियों और आम जनता की निगाहें टिकी हुई हैं। राज्य के नवनियुक्त वित्त मंत्री स्वप्न दासगुप्ता, जो कि देश के एक प्रख्यात पत्रकार, बौद्धिक विचारक और सांसद रह चुके हैं, आज अपना पहला बजट भाषण देंगे। उम्मीद की जा रही है कि वे अपने इस पहले बजटीय दस्तावेज में व्यावहारिक अर्थशास्त्र और वैचारिक स्पष्टता का एक बेहतरीन मेल पेश करेंगे, जो दशकों से ठहराव का शिकार रही बंगाल की अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दे सके।
आधी सदी के नैरेटिव को बदलने की चुनौती: क्या अतीत से सचमुच अलग होगा बजट?
पश्चिम बंगाल के लिए यह बजट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि एक बड़े नीतिगत बदलाव का प्रतीक है। पिछले लगभग 50 सालों (आधी सदी) से राज्य की वित्तीय नीतियां या तो वामपंथी मोर्चे (लेफ्ट फ्रंट) ने तय कीं या फिर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने। इन दोनों ही शासनों में एक बात समान थी—अपनी आर्थिक विफलताओं और राजस्व घाटे के लिए लगातार केंद्र की तत्कालीन सरकारों को दोषी ठहराना।
लेकिन अब, राज्य में ‘डबल-इंजन’ (केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही दल की सरकार) की व्यवस्था आने के बाद यह बहानेबाजी खत्म हो चुकी है। समाज के हर वर्ग, चाहे वह आम वेतनभोगी हो, छोटा व्यापारी हो या बड़े कॉर्पोरेट घराने, सबमें यह उत्सुकता है कि क्या यह बजट अतीत की घिसी-पिटी लोकलुभावन खैरात संस्कृति से अलग होगा? वित्त मंत्री स्वप्न दासगुप्ता के समक्ष चुनौती यह है कि वे कैसे वित्तीय अनुशासन को बनाए रखते हुए विकास कार्यों की गति को तेज करते हैं।
दशकों की संरचनात्मक समस्याओं से जूझता सोनार बांग्ला
स्वप्न दासगुप्ता जब आज अपना बजट प्रस्ताव पढ़ेंगे, तो उनके सामने राज्य की उन पुरानी और गहरी आर्थिक बीमारियों का कच्चा चिट्ठा भी होगा जो बंगाल को विरासत में मिली हैं। पश्चिम बंगाल दशकों से निम्नलिखित गंभीर आर्थिक मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है:
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भारी कर्ज का जाल: पूर्ववर्ती सरकारों की अत्यधिक कर्ज-निर्भरता और केवल चुनावी लाभ वाली कल्याणकारी योजनाओं के कारण राज्य पर कर्ज का भारी बोझ है।
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बुनियादी ढांचे में रुकावट: सड़कों, बिजली और कनेक्टिविटी के मोर्चे पर पर्याप्त निवेश न होने से ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाके विकास की मुख्यधारा से कटे रहे।
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लॉजिस्टिक्स और बंदरगाहों की दुर्दशा: कोलकाता और हल्दिया बंदरगाहों के आधुनिकीकरण में हुई देरी ने वैश्विक व्यापार में बंगाल की हिस्सेदारी को कम कर दिया।
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कृषि क्षेत्र में ठहराव: आधुनिक सिंचाई सुविधाओं की कमी और कम उत्पादकता के कारण राज्य का किसान परंपरागत खेती तक ही सीमित रह गया।
आम बंगाली से लेकर उद्योगपतियों तक: किसकी क्या हैं उम्मीदें?
1. आम आदमी और मिडिल क्लास:
बढ़ती महंगाई, विशेषकर खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों ने बंगाली परिवारों के घरेलू बजट को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। आम आदमी की मांग बेहद साफ है—महंगाई से फौरी राहत, रोजगार के नए अवसर और बेहतर सरकारी सब्सिडी। इसके अलावा अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा और प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए बड़े आवंटन की उम्मीद की जा रही है।
2. व्यापारी और एमएसएमई (MSME) सेक्टर:
बंगाल का छोटा व्यापारी और मारवाड़ी-बंगाली कारोबारी समुदाय लंबे समय से जटिल टैक्स सिस्टम और नौकरशाही (इंस्पेक्टर राज) की बाधाओं से त्रस्त रहा है। व्यापारियों की मांग है कि नियमों के अनुपालन की लागत (Compliance Cost) को कम किया जाए, प्रक्रियाओं को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जाए और परिवहन व्यवस्था (Transport Infrastructure) को सुधारा जाए ताकि माल ढुलाई आसान हो सके।
3. बड़े कॉर्पोरेट और उद्योगपति:
दशकों से बंगाल से उद्योगों का पलायन हुआ है। टाटा के नैनो प्रोजेक्ट के सिंगूर से जाने के बाद से बड़े निवेश के मामले में राज्य पीछे ही रहा है। उद्योगपति इस बजट में एक पारदर्शी, विवाद-मुक्त और निवेशकों के अनुकूल ‘भूमि अधिग्रहण नीति’ की घोषणा की उम्मीद कर रहे हैं। इसके साथ ही प्रतिस्पर्धी बिजली दरें और विनिर्माण (Manufacturing Sector) को बढ़ावा देने के लिए विशेष रियायतों की मांग की जा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी के ‘अंग, बंग, कलिंग’ विजन को साकार करने का दारोमदार
यह बजट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस राष्ट्रीय विजन के बिल्कुल अनुकूल होने की उम्मीद है, जिसमें उन्होंने बार-बार रेखांकित किया है कि भारत को यदि साल 2047 तक एक ‘विकसित राष्ट्र’ बनना है, तो देश के पूर्वी हिस्से का मजबूत होना अनिवार्य है। पीएम मोदी के अनुसार, बिहार (अंग), ओडिशा (कलिंग) के साथ-साथ एक आर्थिक रूप से समृद्ध बंगाल (बंग) ही देश के विकास का नया इंजन बन सकता है।
भौगोलिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो बंगाल के पास दक्षिण-पूर्व एशिया (Act East Policy) का प्रवेश द्वार बनने की अद्भुत क्षमता है। लेकिन यह क्षमता तभी हकीकत में बदलेगी जब मौजूदा राज्य सरकार निवेशकों के लिए एक सुरक्षित, रंगदारी-मुक्त और भरोसेमंद माहौल तैयार करने का खाका इस बजट में पेश करे।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश देने का मौका
ममता बनर्जी के अभेद्य माने जाने वाले राजनीतिक किले को ढहाकर सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के लिए यह बजट अपनी प्रशासनिक साख साबित करने का सबसे बड़ा हथियार है। विपक्ष लगातार उन पर केवल राजनीतिक जोड़-तोड़ करने का आरोप लगाता रहा है, ऐसे में शुभेंदु प्रशासन को इस बजट के जरिए यह दिखाना होगा कि वे न केवल राजनीति करना जानते हैं, बल्कि राज्य को सुशासन (Governance) और तेज आर्थिक विकास (Development) की राह पर भी ले जा सकते हैं।
यह बजट इस बात का फैसला करेगा कि सरकार मुश्किल आर्थिक फैसले लेने का माद्दा रखती है या फिर वह भी पुरानी सरकारों की तरह कर्ज के संकट को आने वाले कल पर टालने का काम करेगी। कुल मिलाकर, स्वप्न दासगुप्ता का यह वित्तीय दस्तावेज बंगाल के पुनरुत्थान की पटकथा लिखेगा।
