तेहरान/वॉशिंगटन: 110 दिनों तक चले तनाव, सैन्य टकराव और आर्थिक दबाव के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान के बीच समझौता हो गया है। दोनों देशों ने युद्धविराम के साथ एक व्यापक समझौता ज्ञापन (MoU) पर सहमति जताई है। हालांकि युद्ध के मैदान में किसकी जीत हुई, इसका स्पष्ट जवाब अभी नहीं मिला है, लेकिन समझौते की शर्तों को देखकर कई विश्लेषक यह मानने लगे हैं कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से ईरान ने अमेरिका से कहीं अधिक लाभ हासिल कर लिया है।
दिलचस्प बात यह है कि खुद को दुनिया का सबसे बड़ा ‘डील मेकर’ बताने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब आलोचनाओं के घेरे में हैं। आलोचकों का कहना है कि जिस समझौते को अमेरिका अपनी कूटनीतिक जीत बता रहा है, उसके सबसे बड़े लाभार्थी के रूप में ईरान उभरकर सामने आया है। प्रतिबंधों में राहत, तेल निर्यात की स्वतंत्रता, विदेशों में जब्त अरबों डॉलर की संपत्तियों तक पहुंच और संभावित विदेशी निवेश जैसे फायदे ईरान की अर्थव्यवस्था को नई ताकत दे सकते हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य से टोल वसूली का रास्ता खुला
समझौते का सबसे चर्चित पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है।
समझौते के अनुसार अगले 60 दिनों तक ईरान किसी प्रकार का टोल नहीं वसूलेगा। हालांकि इसके बाद ओमान के साथ मिलकर वह इस समुद्री मार्ग के प्रबंधन के लिए नए नियम बना सकेगा। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने संकेत दिया है कि भविष्य में इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाया जा सकता है।
यदि ऐसा होता है तो ईरान को हर साल अरबों डॉलर की अतिरिक्त आय प्राप्त हो सकती है। युद्ध से पहले ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी और ईरान लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा था।
आर्थिक प्रतिबंध हटने से खुलेगा व्यापार का रास्ता
समझौते का दूसरा बड़ा लाभ आर्थिक प्रतिबंधों से जुड़ा है। वर्षों से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया था। बैंकिंग, ऊर्जा, शिपिंग और अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे कई क्षेत्रों पर इसका असर पड़ा था।
अब समझौते के तहत अमेरिका ईरान के खिलाफ लगाए गए अधिकांश आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने पर सहमत हुआ है। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से जुड़े कुछ प्रतिबंधों और अमेरिका द्वारा लगाए गए एकतरफा प्रतिबंध भी शामिल बताए जा रहे हैं।
प्रतिबंध हटने के बाद ईरानी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में खुलकर व्यापार कर सकेंगी। विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा और ईरान की बैंकिंग प्रणाली को वैश्विक वित्तीय नेटवर्क से दोबारा जोड़ने का रास्ता साफ होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए किसी ऑक्सीजन सपोर्ट से कम नहीं होगा।
100 अरब डॉलर से अधिक की जब्त संपत्तियां मिल सकती हैं वापस
समझौते की एक और महत्वपूर्ण शर्त विदेशों में फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों को लेकर है। वर्षों से अमेरिका और अन्य देशों के बैंकों में ईरान की बड़ी रकम और संपत्तियां जब्त पड़ी हुई हैं।
MoU के अनुसार अमेरिका इन संपत्तियों को चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराने पर सहमत हुआ है। विभिन्न अनुमानों के मुताबिक ईरान की 124 अरब डॉलर से 167 अरब डॉलर तक की संपत्तियां विदेशी बैंकों में फंसी हुई हैं।
यदि यह राशि ईरान को वापस मिलती है तो उसकी आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है। सरकार के पास विकास परियोजनाओं, बुनियादी ढांचे, सामाजिक योजनाओं और औद्योगिक विस्तार के लिए भारी पूंजी उपलब्ध हो जाएगी।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि यह राशि कई छोटे देशों की कुल वार्षिक जीडीपी के बराबर है और इसका प्रभाव लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।
तेल निर्यात में जबरदस्त उछाल की उम्मीद
ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तेल निर्यात पर निर्भर करती है। सरकारी राजस्व का लगभग आधा हिस्सा तेल बिक्री से आता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण पिछले कई वर्षों में ईरान को अपना तेल भारी छूट पर और सीमित मात्रा में बेचना पड़ रहा था।
अब प्रतिबंधों में राहत मिलने के बाद ईरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में खुलकर तेल बेच सकेगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि ईरान प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल तेल निर्यात करने की स्थिति में पहुंच सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब उसे तेल को छिपाकर या कम कीमत पर बेचने की मजबूरी नहीं होगी। वैश्विक बाजार में कानूनी और पारदर्शी तरीके से बिक्री होने से उसे बेहतर मूल्य मिलेगा।
तेल निर्यात में बढ़ोतरी से ईरान के विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार होगा और देश की वित्तीय स्थिति मजबूत हो सकती है।
300 अरब डॉलर के निवेश की संभावना
समझौते का एक और बड़ा आकर्षण 300 अरब डॉलर तक के संभावित निवेश की योजना है। MoU में कहा गया है कि अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगी ईरान के आर्थिक पुनर्निर्माण और विकास के लिए एक व्यापक निवेश कार्यक्रम तैयार करेंगे।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका सीधे ईरान को पैसा देगा। अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह निवेश निजी कंपनियों और क्षेत्रीय साझेदार देशों के माध्यम से आएगा।
विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों की कंपनियां ऊर्जा, बुनियादी ढांचे, परिवहन, तकनीक और औद्योगिक परियोजनाओं में निवेश कर सकती हैं।
यदि यह योजना जमीन पर उतरती है तो ईरान आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया के सबसे बड़े निवेश केंद्रों में से एक बन सकता है।
बदले में ईरान को क्या करना होगा?
इतने बड़े आर्थिक लाभों के बदले ईरान को अपेक्षाकृत सीमित प्रतिबद्धताएं निभानी होंगी। सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा।
ईरान लंबे समय से दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और नागरिक उद्देश्यों के लिए है। अब उसने एक बार फिर यही आश्वासन दोहराया है।
समझौते के तहत उच्च स्तर पर संवर्धित यूरेनियम (Highly Enriched Uranium) को कम संवर्धित यूरेनियम में बदलने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इस प्रक्रिया को डाउन-ब्लेंडिंग कहा जाता है।
यह काम अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में होगा। समझौते के अनुसार यह प्रक्रिया ईरान के भीतर ही की जाएगी।
इसके अलावा दोनों देशों ने अगले 60 दिनों के भीतर व्यापक परमाणु वार्ता शुरू करने पर भी सहमति जताई है, जिसके बाद एक बड़े और स्थायी समझौते का खाका तैयार किया जा सकता है।
ट्रंप की कूटनीतिक जीत या ईरान का आर्थिक जैकपॉट?
समझौते के बाद सबसे बड़ी बहस इसी सवाल को लेकर शुरू हो गई है। ट्रंप प्रशासन इसे युद्ध रोकने और परमाणु संकट टालने की बड़ी उपलब्धि बता रहा है। वहीं आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या अमेरिका ने बहुत अधिक रियायतें दे दी हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के बाद ईरान को जो आर्थिक अवसर मिले हैं, वे शायद उसे युद्ध से पहले भी उपलब्ध नहीं थे। तेल व्यापार, निवेश, प्रतिबंधों से राहत और फ्रीज संपत्तियों की वापसी जैसे कदम उसकी अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकते हैं।
दूसरी ओर अमेरिका का तर्क है कि परमाणु हथियारों की दिशा में बढ़ रहे ईरान को रोकना और क्षेत्र में स्थिरता लाना सबसे बड़ी प्राथमिकता थी।
अगले 60 दिन होंगे बेहद अहम
फिलहाल यह समझौता दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी। अगले 60 दिनों में परमाणु वार्ता, निवेश योजनाओं की रूपरेखा, प्रतिबंधों में राहत और अन्य वादों को अमल में लाना होगा।
यदि समझौते की शर्तें सफलतापूर्वक लागू होती हैं तो यह पश्चिम एशिया की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजार दोनों के लिए ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।
फिलहाल तस्वीर यही दिखा रही है कि युद्ध भले बंदूक और मिसाइलों से लड़ा गया हो, लेकिन समझौते की मेज पर ईरान ने ऐसे आर्थिक फायदे हासिल कर लिए हैं, जिन्होंने दुनिया भर में यह बहस छेड़ दी है कि कहीं यह समझौता वास्तव में ईरान के लिए अरबों डॉलर का “पोस्ट-वॉर जैकपॉट” तो नहीं बन गया।
