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शासनादेश को दरकिनार कर ‘खास’ पर मेहरबानी! उत्तराखंड शासन में सम्बद्धीकरण के खेल पर उठे गंभीर सवाल

The Hill India News
Last updated: May 14, 2026 1:27 am
The Hill India News
Published: May 14, 2026
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देहरादून: उत्तराखंड में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति और सुशासन के दावों के बीच नौकरशाही के गलियारों से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने शासन की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता की कलई खोलकर रख दी है। मामला महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग से जुड़ा है, जहाँ नियमों को ताक पर रखकर एक अधिकारी को न केवल देहरादून में ‘अटैच’ किया गया, बल्कि साल 2007 से प्रभावी प्रतिबंधों को भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।

Contents
नियमों की फाइल दफन, अपनों को ‘देहरादून’ का शगुनचमोली में ‘प्रभारी’ का सहारा, राजधानी में ‘साहब’ का नजारा‘तीन साल’ का तिलस्म और ‘अनु सचिव’ की कुर्सीयक्ष प्रश्न: आखिर किसके संरक्षण में हो रहा है यह खेल?पारदर्शिता और सुशासन पर गहराता संकट

नियमों की फाइल दफन, अपनों को ‘देहरादून’ का शगुन

उत्तराखंड शासन में नियमों की अनदेखी का यह सिलसिला नया नहीं है, लेकिन ताजा मामला इसलिए चौंकाने वाला है क्योंकि इसमें 16 साल पुराने एक सख्त शासनादेश की धज्जियाँ उड़ाई गई हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग ने 6 अप्रैल 2023 को जिला कार्यक्रम अधिकारी (DPO), चमोली को उत्तराखंड बाल अधिकार संरक्षण आयोग, देहरादून में “अनु सचिव” के पद पर सम्बद्ध कर दिया।

हैरानी की बात यह है कि वर्ष 2007 में तत्कालीन मुख्य सचिव द्वारा एक स्पष्ट शासनादेश जारी किया गया था, जिसमें किसी भी विभाग में कर्मचारियों के सम्बद्धीकरण (Attachment) पर पूर्णतः रोक लगाई गई थी। उस आदेश में तर्क दिया गया था कि सम्बद्धीकरण से न केवल मूल तैनाती स्थल का कार्य प्रभावित होता है, बल्कि यह प्रशासनिक ढांचे को भी कमजोर करता है। बावजूद इसके, चमोली जैसे सीमांत और संवेदनशील जनपद से अधिकारी को हटाकर राजधानी की सुख-सुविधाओं के बीच तैनात कर दिया गया।

चमोली में ‘प्रभारी’ का सहारा, राजधानी में ‘साहब’ का नजारा

इस उत्तराखंड शासन सम्बद्धीकरण घोटाला या अनियमितता का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि अधिकारी की मूल तैनाती चमोली में है, जो भौगोलिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण जिला है। वहां जिला कार्यक्रम अधिकारी का पद महत्वपूर्ण होता है, लेकिन शासन ने जनहित से ऊपर व्यक्तिगत सुविधा को तरजीह दी।

आदेश के मुताबिक, संबंधित अधिकारी का वेतन आज भी चमोली से ही आहरित (Draw) हो रहा है, जबकि उनके पद का अतिरिक्त कार्यभार किसी दूसरे अधिकारी को सौंप दिया गया है। सवाल यह उठता है कि यदि काम दूसरे अधिकारी को ही करना है, तो मूल अधिकारी को देहरादून में बिठाकर सरकारी खजाने पर बोझ क्यों डाला जा रहा है? क्या चमोली की जनता और वहां की बाल विकास योजनाओं की बलि किसी ‘रसूख’ के कारण चढ़ाई गई है?

‘तीन साल’ का तिलस्म और ‘अनु सचिव’ की कुर्सी

प्रशासनिक गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि अधिकारी की समय अवधि को लेकर भी रहस्य बना हुआ है। नियमानुसार किसी भी प्रतिनियुक्ति या सम्बद्धीकरण की एक निश्चित समय सीमा होती है। लेकिन यहाँ तीन साल की अवधि पूर्ण होने के बावजूद अधिकारी आज की तिथि तक पद पर जमे हुए हैं। यह उत्तराखंड शासन सम्बद्धीकरण घोटाला केवल एक अधिकारी के ट्रांसफर का मामला नहीं है, बल्कि यह एक व्यवस्थित प्रशासनिक विफलता का संकेत है।

“जब शासन स्वयं अपने आदेशों का पालन नहीं करता, तो निचले स्तर पर अनुशासन की उम्मीद करना बेमानी है। 2007 का शासनादेश आज भी अस्तित्व में है, फिर 2023 में उसे क्यों नजरअंदाज किया गया?” – प्रशासनिक विश्लेषक

यक्ष प्रश्न: आखिर किसके संरक्षण में हो रहा है यह खेल?

इस पूरे मामले ने शासन की कार्यशैली पर कई गंभीर ‘यक्ष प्रश्न’ खड़े कर दिए हैं:

  1. जब वर्ष 2007 से सम्बद्धीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध है, तो किस विशेष नियम के तहत यह आदेश पारित किया गया?

  2. क्या महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग के पास देहरादून में तैनात करने योग्य योग्य अधिकारियों का अभाव है?

  3. सीमांत जिले चमोली के कार्यों को प्रभावित कर एक अधिकारी को राजधानी में ‘अनु सचिव’ बनाने के पीछे की असली मंशा क्या है?

  4. क्या शासन के वरिष्ठ अधिकारियों को इस बात की जानकारी नहीं है कि उनके ही पुराने आदेशों की अवहेलना हो रही है?

पारदर्शिता और सुशासन पर गहराता संकट

उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में जहाँ संसाधनों की कमी है, वहां अधिकारियों की फील्ड में तैनाती सबसे ज्यादा जरूरी है। लेकिन “देहरादून अटैचमेंट” का यह मोह शासन के सुशासन के दावों को खोखला साबित कर रहा है। यह मामला दर्शाता है कि कैसे रसूखदार अधिकारी नियमों की गलियों से रास्ता निकालकर अपने लिए आरामदायक तैनातियाँ सुनिश्चित कर लेते हैं।

अब गेंद मुख्यमंत्री सचिवालय और मुख्य सचिव के पाले में है। क्या इस उत्तराखंड शासन सम्बद्धीकरण घोटाला की जांच होगी? क्या 2007 के शासनादेश का सम्मान करते हुए अधिकारी को उनके मूल तैनाती स्थल चमोली वापस भेजा जाएगा? या फिर ‘नियम सबके लिए समान हैं’ का नारा केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा?

यह मामला अब शासन की साख का सवाल बन चुका है। यदि ऐसे सम्बद्धीकरणों को चुपचाप हवा दी जाती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब जिलों में काम करने के लिए कोई अधिकारी नहीं बचेगा और पूरी व्यवस्था राजधानी के कमरों में सिमट कर रह जाएगी।

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