
चेन्नई/चेन्नई डेस्क: तमिलनाडु की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव की पटकथा आखिरकार मुकम्मल हो गई है। हफ्तों तक चले सियासी ड्रामे, दांव-पेच और अनिश्चितता के बाद अभिनेता से राजनेता बने ‘थलापति’ विजय के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया है। तमिलनाडु वेत्री कझगम (TVK) के नेतृत्व में नई सरकार के गठन को लेकर अब कोई संवैधानिक बाधा शेष नहीं रह गई है। शनिवार को विदुथलाई चिरूथईगल काची (VCK) के समर्थन पत्र मिलते ही विजय ने 120 विधायकों का जादुई आंकड़ा हासिल कर लिया है, जो बहुमत के लिए अनिवार्य 118 के आंकड़े से दो अधिक है।
विजय अब जल्द ही राजभवन जाकर राज्यपाल को विधायकों के समर्थन की आधिकारिक सूची सौंपेंगे और सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। इस राजनीतिक घटनाक्रम ने न केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
सियासी समीकरण: कैसे जुटाया ‘विजय’ ने बहुमत?
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने किसी भी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया था, जिससे राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बन गई थी। विजय की पार्टी TVK 108 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, लेकिन तकनीकी पेचों के कारण सरकार बनाने में देरी हुई।
वर्तमान में विजय के पास निम्नलिखित दलों का समर्थन है:
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तमिलनाडु वेत्री कझगम (TVK): 107 सीटें (विजय दो सीटों से जीते थे, एक सीट छोड़ने के बाद प्रभावी संख्या)।
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इंडियन नेशनल कांग्रेस (INC): 05 सीटें।
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इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML): 02 सीटें।
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कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI): 02 सीटें।
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विदुथलाई चिरूथईगल काची (VCK): 02 सीटें।
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सीपीएम (CPIM): 02 सीटें।
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कुल समर्थन: 120 विधायक।
शनिवार शाम को जैसे ही वीसीके (VCK) ने अपना समर्थन पत्र विजय को सौंपा, चेन्नई की सड़कों पर टीवीके कार्यकर्ताओं ने जश्न मनाना शुरू कर दिया। वहीं, आईयूएमएल (IUML) ने भी साफ कर दिया है कि वे नई सरकार को बिना शर्त समर्थन देंगे।
वह ‘रणनीतिक चूक’ जिसने विजय को 5 दिन तक उलझाए रखा
4 मई को आए चुनाव परिणामों के बाद विजय सबसे बड़ी पार्टी के नेता थे। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विजय ‘सिंगल लार्जेस्ट पार्टी’ के तौर पर सरकार बनाने का दावा पेश करते, तो उन्हें राज्यपाल से आसानी से न्योता मिल जाता। लेकिन उन्होंने कांग्रेस के 5 विधायकों के साथ गठबंधन की सरकार बनाने की जल्दबाजी दिखाई।
राज्यपाल ने संवैधानिक नियमों का हवाला देते हुए गठबंधन के सभी सहयोगियों का हस्ताक्षरित समर्थन पत्र मांगा। इस प्रक्रिया में पांच दिन लग गए और विजय को तीन बार राजभवन के चक्कर लगाने पड़े। अंततः शनिवार को ‘अरिवालयम’ से लेकर ‘विजय निवास’ तक चली लंबी वार्ताओं के बाद समर्थन पत्र इकट्ठा हुए और संकट टला।
एमके स्टालिन का भावुक संबोधन: ‘एक रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे’
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने एक परिपक्व राजनेता की मिसाल पेश करते हुए विजय को बधाई दी। स्टालिन ने एक विस्तृत बयान जारी कर अपनी हार स्वीकार की और नई सरकार से जनहित की योजनाओं को जारी रखने की अपील की।
स्टालिन ने कहा, “द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) की अगुवाई वाले गठबंधन को अपेक्षित सीटें नहीं मिलीं, लेकिन हमें जनता का प्यार और वोट पर्याप्त मात्रा में मिले हैं। हम नई सरकार के गठन में कोई बाधा नहीं डालेंगे और एक ‘कंस्ट्रक्टिव अपोजिशन’ (रचनात्मक विपक्ष) के रूप में काम करेंगे।”
उन्होंने कांग्रेस द्वारा गठबंधन तोड़ने पर भी चुटकी ली, लेकिन वामपंथी दलों और वीसीके के साथ अपने संबंधों को अटूट बताया। स्टालिन ने भावुक होते हुए कहा कि वह चाहते हैं कि नई सरकार महिलाओं, युवाओं और पिछड़ों के लिए शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखे ताकि राज्य का विकास बाधित न हो।
क्या हैं नई सरकार के सामने चुनौतियां?
विजय के लिए यह जीत केवल शुरुआत है। एक अभिनेता की छवि से बाहर निकलकर ‘प्रशासनिक प्रमुख’ के तौर पर खुद को साबित करना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी।
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गठबंधन का प्रबंधन: पांच अलग-अलग विचारधारा वाले दलों को साथ लेकर चलना विजय की पहली परीक्षा होगी।
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स्टालिन की विरासत: एमके स्टालिन ने पिछले पांच वर्षों में कई विकासोन्मुख योजनाएं लागू की हैं, उन पर आगे बढ़ना या उनसे बेहतर विकल्प देना एक कठिन कार्य होगा।
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उपचुनाव: विजय को खुद एक सीट छोड़नी होगी, जिस पर होने वाला उपचुनाव नई सरकार के लिए पहला ‘लिटमस टेस्ट’ होगा।
तमिलनाडु अब एक नए राजनीतिक युग की दहलीज पर खड़ा है। क्या ‘थलापति’ विजय द्रविड़ राजनीति के गढ़ में अपनी नई पहचान स्थापित कर पाएंगे? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल चेन्नई की हवाओं में बदलाव की खुशबू साफ महसूस की जा सकती है।


