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कोटा अस्पताल में मातृत्व वार्ड बना मौत का गलियारा, 2 प्रसूताओं की मौत, 4 जिंदगी की जंग में, सरकार का बड़ा एक्शन

The Hill India News
Last updated: May 9, 2026 5:09 am
The Hill India News
Published: May 9, 2026
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राजस्थान के कोटा स्थित न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल (NMCH) में सिजेरियन डिलीवरी के बाद प्रसूताओं की तबीयत बिगड़ने का मामला अब पूरे देश में चर्चा का विषय बन चुका है। जयपुर से लेकर दिल्ली तक इस घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल में भर्ती 6 महिलाओं में से अब तक 2 की मौत हो चुकी है, जबकि 4 अन्य की हालत गंभीर बनी हुई है और उनका इलाज नेफ्रोलॉजी व ICU वार्ड में चल रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने हाई लेवल जांच शुरू कर दी है और शुरुआती कार्रवाई करते हुए एक डॉक्टर को नौकरी से हटाने, एक डॉक्टर समेत दो नर्सों को सस्पेंड करने का फैसला लिया है।

Contents
सरकार का बड़ा एक्शन, डॉक्टर और नर्सों पर गिरी गाजकैसे शुरू हुआ पूरा मामला?मेडिकल रिपोर्ट में सामने आए चौंकाने वाले तथ्यपरिजनों का आरोप — अस्पताल ने गायब की फाइलेंप्रशासन और अस्पताल के बयान में विरोधाभासलोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पहुंचे पीड़ित परिवार के घरकांग्रेस ने बनाई फैक्ट फाइंडिंग कमेटीअस्पताल के बाहर प्रदर्शन और मुआवजे की मांगअस्पताल में डर और सन्नाटाजांच में क्या-क्या हो रहा है?स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने सरकारी अस्पतालों की कार्यप्रणाली, दवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा को लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। पीड़ित परिवार लगातार आरोप लगा रहे हैं कि ऑपरेशन के बाद महिलाओं को गलत दवा या इंजेक्शन दिया गया, जिसके बाद उनकी हालत अचानक बिगड़ गई। वहीं प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन के बयान अलग-अलग होने से मामला और उलझता जा रहा है।

सरकार का बड़ा एक्शन, डॉक्टर और नर्सों पर गिरी गाज

9 मई 2026 को राजस्थान सरकार ने इस मामले में बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया। लापरवाही के आरोपों के बीच डॉक्टर नवनीत कुमार और दो नर्सों गुरजौत कौर तथा निमेश वर्मा को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया। इसके अलावा कॉन्ट्रैक्ट पर कार्यरत डॉक्टर श्रद्धा उपाध्याय को सेवा से हटा दिया गया।

सरकार ने दो वरिष्ठ डॉक्टरों — यूनिट हेड डॉ. बीएल पटीदार और डॉ. नेहा सीहरा — को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है कि उनकी निगरानी में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई। चिकित्सा विभाग ने स्पष्ट कहा है कि यदि किसी भी कर्मचारी की भूमिका मरीजों की जान से खिलवाड़ करने में सामने आती है तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

राज्य सरकार के निर्देश पर जयपुर के SMS अस्पताल और AIIMS के विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम कोटा पहुंच चुकी है। यह टीम मरीजों के इलाज के साथ-साथ पूरे घटनाक्रम की मेडिकल जांच भी कर रही है।

कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार 3 मई से 5 मई के बीच कई महिलाओं की सिजेरियन डिलीवरी हुई थी। शुरुआत में सभी महिलाएं सामान्य स्थिति में थीं, लेकिन ऑपरेशन के कुछ समय बाद एक-एक कर उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। महिलाओं में पेशाब बंद होना, प्लेटलेट्स कम होना, ब्लड प्रेशर गिरना और किडनी फेलियर जैसे गंभीर लक्षण सामने आए।

सबसे पहले पायल नाम की प्रसूता की हालत बिगड़ी और बाद में उसकी मौत हो गई। इसके बाद ज्योति नाम की महिला ने भी दम तोड़ दिया। दोनों महिलाओं की मौत के बाद अस्पताल में हंगामा मच गया और परिजनों ने डॉक्टरों पर गंभीर आरोप लगाए।

अब भी चार महिलाएं अस्पताल में भर्ती हैं, जिनका डायलिसिस और ICU में इलाज जारी है। डॉक्टर लगातार उनकी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।

मेडिकल रिपोर्ट में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

गंभीर रूप से बीमार प्रसूता रागिनी की मेडिकल रिपोर्ट ने पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया है। रिपोर्ट के अनुसार उसकी दोनों किडनी में “Increased Echogenicity” पाया गया, जो गंभीर संक्रमण या किडनी डैमेज का संकेत माना जाता है।

इसके अलावा पेट के अंदर खून जमा होने, लिवर बढ़ने और शरीर के अन्य अंगों पर असर पड़ने जैसी बातें भी रिपोर्ट में सामने आईं। डॉक्टरों का मानना है कि किसी जहरीले तत्व, संक्रमित दवा या गलत इंजेक्शन की वजह से शरीर के महत्वपूर्ण अंग प्रभावित हुए हो सकते हैं।

रागिनी के पति लोकेश मीणा ने आरोप लगाया कि ऑपरेशन के बाद रात में कोई इंजेक्शन लगाया गया था, जिसके बाद उसकी हालत बिगड़ती चली गई। उन्होंने कहा कि पहले सब कुछ सामान्य था, लेकिन अचानक यूरिन बंद हो गया और तबीयत तेजी से खराब होने लगी।

परिजनों का आरोप — अस्पताल ने गायब की फाइलें

मृतका ज्योति के परिवार ने अस्पताल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। परिजनों का कहना है कि ऑपरेशन के बाद एक इंजेक्शन दिए जाने के तुरंत बाद उसकी तबीयत खराब हो गई। जब उन्होंने मेडिकल रिकॉर्ड और दवा की जानकारी मांगी तो अस्पताल प्रशासन ने नई फाइल बनाने की बात कही।

परिजनों ने आरोप लगाया कि पुरानी फाइलें और दवाओं का रिकॉर्ड गायब कर दिया गया है ताकि सच्चाई सामने न आ सके। इस आरोप के बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया है।

परिवार के लोगों का कहना है कि यदि सही समय पर सही इलाज मिलता तो महिलाओं की जान बचाई जा सकती थी। अब वे दोषियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग कर रहे हैं।

प्रशासन और अस्पताल के बयान में विरोधाभास

इस पूरे मामले में जिला प्रशासन और मेडिकल कॉलेज प्रशासन के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं।

जिला कलेक्टर पीयूष सामरिया ने कहा कि जब महिलाओं को भर्ती किया गया था तब उनकी स्थिति सामान्य थी। बाद में अचानक तबीयत क्यों बिगड़ी, इसकी हर एंगल से जांच की जा रही है। उन्होंने बताया कि दवाओं के सैंपल फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) भेजे गए हैं।

वहीं मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. नीलेश कुमार जैन ने शुरुआती जांच में अस्पताल स्टाफ को क्लीन चिट देते हुए कहा कि अब तक किसी तरह की मानवीय लापरवाही सामने नहीं आई है। उन्होंने इसे मेडिकल कॉम्प्लिकेशन बताया।

हालांकि बाद में सरकार द्वारा डॉक्टरों और नर्सों पर कार्रवाई किए जाने के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं कि आखिर शुरुआती जांच में स्टाफ को क्लीन चिट कैसे दे दी गई थी।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पहुंचे पीड़ित परिवार के घर

कोटा से सांसद और लोकसभा अध्यक्ष Om Birla ने इस घटना को बेहद दुखद बताया है। घटना की जानकारी मिलते ही वे अस्पताल पहुंचे और बाद में मृतका ज्योति के घर जाकर परिवार से मुलाकात की।

उन्होंने परिजनों को न्याय का भरोसा दिलाते हुए कहा कि दोषियों को किसी भी हालत में बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर भी संवेदना व्यक्त करते हुए लिखा कि यह घटना अत्यंत हृदयविदारक है और इसकी गंभीर जांच कराई जाएगी।

ओम बिरला की सक्रियता के बाद प्रशासन पर भी दबाव बढ़ गया है और जांच प्रक्रिया तेज कर दी गई है।

कांग्रेस ने बनाई फैक्ट फाइंडिंग कमेटी

मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने इस घटना की जांच के लिए चार सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई है।

PCC अध्यक्ष Govind Singh Dotasra ने समिति को तीन दिन में रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं। समिति में पूर्व मंत्री परसादी लाल मीणा, विधायक डूंगरराम गेदर, महासचिव पुष्पेंद्र भारद्वाज और चिकित्सा प्रकोष्ठ के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. विकास महला को शामिल किया गया है।

कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सरकारी अस्पतालों में लापरवाही और अव्यवस्था के कारण मरीजों की जान जा रही है।

अस्पताल के बाहर प्रदर्शन और मुआवजे की मांग

घटना के बाद अस्पताल परिसर में भारी तनाव का माहौल बन गया। कांग्रेस नेता चेतन सोलंकी के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने मुंडन कराकर विरोध प्रदर्शन किया और मृतकों के परिवार को 20-20 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की।

भाजपा विधायक संदीप शर्मा और मंत्री हीरालाल नागर भी अस्पताल पहुंचे और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह सिर्फ मेडिकल लापरवाही नहीं बल्कि सिस्टम की विफलता है। उनका आरोप है कि अस्पताल में दवाओं की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था बेहद खराब है।

अस्पताल में डर और सन्नाटा

इस घटना के बाद अस्पताल के प्रसूति वार्ड में डर और तनाव का माहौल है। जिन महिलाओं की हालत गंभीर है उनका लगातार डायलिसिस किया जा रहा है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम चौबीस घंटे निगरानी कर रही है।

सबसे दर्दनाक स्थिति उन नवजात बच्चों की है जिनकी मांएं अब इस दुनिया में नहीं रहीं या जिंदगी की जंग लड़ रही हैं। कई नवजातों को अलग वार्ड में शिफ्ट किया गया है और परिवार के सदस्य उनकी देखभाल कर रहे हैं।

अस्पताल में भर्ती अन्य मरीजों और उनके परिजनों में भी डर का माहौल है। लोग इलाज को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

जांच में क्या-क्या हो रहा है?

सरकार ने पूरे मामले की बहुस्तरीय जांच शुरू कर दी है। जांच के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं—

  • ऑपरेशन के बाद कौन-कौन सी दवाएं दी गईं?
  • क्या दवाओं की गुणवत्ता सही थी?
  • इंजेक्शन या फ्लूइड में किसी तरह का संक्रमण तो नहीं था?
  • क्या मरीजों की मॉनिटरिंग में लापरवाही हुई?
  • मेडिकल रिकॉर्ड में छेड़छाड़ हुई या नहीं?
  • ICU और पोस्ट ऑपरेटिव प्रोटोकॉल का पालन हुआ या नहीं?

FSL जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि मामला मेडिकल कॉम्प्लिकेशन था या फिर किसी गंभीर लापरवाही का परिणाम।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

कोटा मेडिकल कॉलेज की यह घटना सिर्फ एक अस्पताल तक सीमित नहीं रह गई है। इसने पूरे सरकारी स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर कैसे सिजेरियन डिलीवरी के बाद एक साथ कई महिलाओं की हालत बिगड़ गई? यदि दवाओं में गड़बड़ी थी तो उसकी जांच पहले क्यों नहीं हुई? और यदि लापरवाही नहीं थी तो फिर सरकार ने डॉक्टरों और नर्सों पर कार्रवाई क्यों की?

इन सवालों के जवाब अब जांच रिपोर्ट से ही मिल पाएंगे। लेकिन फिलहाल यह मामला राजस्थान की राजनीति, स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही के केंद्र में आ चुका है।

राज्य सरकार पर अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि पीड़ित परिवारों को न्याय मिले, दोषियों की पहचान हो और भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।

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