
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी के हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों ने देश की विपक्षी राजनीति को नई दिशा दे दी है। खास तौर पर INDIA गठबंधन के भीतर अब खुलकर असंतोष और अविश्वास दिखाई देने लगा है। जिन दलों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को चुनौती देने के लिए एकजुटता दिखाई थी, अब उन्हीं दलों के बीच राजनीतिक दूरियां बढ़ती नजर आ रही हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि आने वाले महीनों में INDIA ब्लॉक दो या उससे ज्यादा हिस्सों में टूट सकता है।
इन नतीजों के बाद सबसे ज्यादा चर्चा कांग्रेस की रणनीति को लेकर हो रही है। कांग्रेस के लिए यह स्थिति “कभी खुशी, कभी गम” जैसी बन गई है। एक तरफ उसे पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की कमजोर होती स्थिति में अपने पुनरुत्थान का मौका दिखाई दे रहा है, तो दूसरी ओर तमिलनाडु में DMK के कमजोर पड़ने के बाद पार्टी नए राजनीतिक समीकरण बनाने में जुटी दिखाई दे रही है।
बंगाल में कांग्रेस को दिख रहा नया अवसर
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन हालिया चुनावी झटकों के बाद पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। खासकर ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के रिश्तों में तनाव की खबरों ने राजनीतिक अटकलों को और हवा दे दी है।
कांग्रेस के रणनीतिकार मानते हैं कि यदि TMC के भीतर टूट होती है, तो पार्टी के कई पुराने नेता कांग्रेस में वापसी कर सकते हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि बंगाल में वह एक बार फिर खुद को मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में स्थापित कर सकती है। पार्टी के अंदर यह धारणा मजबूत हो रही है कि ममता बनर्जी की पकड़ अब पहले जैसी नहीं रही और भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस भी इसका राजनीतिक लाभ उठा सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा ने पहले भी शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और आम आदमी पार्टी (AAP) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों में टूट पैदा कर अपनी राजनीतिक रणनीति को सफल बनाया है। ऐसे में TMC भी इस तरह के दबाव से अछूती नहीं रह सकती। कांग्रेस इसी संभावना को अपने लिए अवसर के रूप में देख रही है।
तमिलनाडु में बदले राजनीतिक समीकरण
तमिलनाडु में स्थिति और भी दिलचस्प हो गई है। DMK की चुनावी कमजोरी और अभिनेता विजय की पार्टी TVK के उभार ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस अब यह महसूस कर रही है कि उसने DMK के साथ बने रहकर शायद बड़ी रणनीतिक गलती कर दी।
सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी को मतदान के दौरान ही यह एहसास होने लगा था कि तमिलनाडु में कांग्रेस की स्थिति कमजोर पड़ रही है। बताया जाता है कि उन्होंने अपने करीबी नेताओं से कहा कि पार्टी ने “बहुत बड़ी गलती” कर दी है। अब कांग्रेस के भीतर यह राय बन रही है कि भविष्य में उसे DMK पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय नए विकल्प तलाशने होंगे।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अभिनेता विजय युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। उनकी “सामाजिक न्याय” और “धर्मनिरपेक्ष राजनीति” की बातों ने खास असर डाला है। कांग्रेस अब इस उभरती ताकत के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश कर सकती है।
हालांकि, DMK इस बदले रुख से बेहद नाराज बताई जा रही है। पार्टी को लगता है कि कांग्रेस ने सहयोगी धर्म नहीं निभाया। खासकर तब, जब हाल ही में DMK ने कांग्रेस को राज्यसभा सीट देकर राजनीतिक सहयोग किया था।
क्या INDIA गठबंधन टूटने की ओर?
इन चुनावी नतीजों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या INDIA गठबंधन अब अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रहा है? ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और एमके स्टालिन जैसे नेता कांग्रेस के रवैये से नाराज बताए जा रहे हैं। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि ये दल कांग्रेस को अलग-थलग करने की रणनीति पर काम कर सकते हैं।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यदि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी इस नए समीकरण का हिस्सा बनते हैं, तो कांग्रेस के लिए मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए अखिलेश यादव के सामने भी चुनौती कम नहीं है।
समाजवादी पार्टी के लिए कांग्रेस के साथ बने रहना या अलग होना दोनों ही राजनीतिक रूप से जोखिम भरे फैसले हो सकते हैं। क्योंकि BSP के साथ गठबंधन की संभावना फिलहाल कमजोर दिख रही है। ऐसे में SP के सामने विकल्प सीमित हैं।
सूत्रों की मानें तो समाजवादी पार्टी के कई नेता राहुल गांधी की कार्यशैली से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें लगता है कि राहुल गांधी कई बार अनिश्चित और हिचकिचाने वाले नेता की तरह व्यवहार करते हैं। हालांकि पार्टी के कुछ नेता प्रियंका गांधी को बेहतर गठबंधन प्रबंधक मानते हैं।
कांग्रेस में बढ़ा उत्साह
इन तमाम राजनीतिक उठापटक के बावजूद कांग्रेस मुख्यालय में माहौल काफी उत्साहित बताया जा रहा है। पार्टी का एक बड़ा वर्ग मानता है कि मौजूदा हालात कांग्रेस के लिए “सुनहरा अवसर” बन सकते हैं। पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, बिहार, दिल्ली, पंजाब, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में पार्टी फिर से खुद को मजबूत करने की रणनीति बना रही है।
“एकला चलो रे” की सोच अब कांग्रेस के भीतर तेजी से लोकप्रिय हो रही है। पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों पर निर्भर रहने के बजाय अकेले दम पर अपनी ताकत बढ़ानी चाहिए। 2029 के लोकसभा चुनाव में “200 पार” का सपना भी पार्टी के भीतर चर्चा का विषय बना हुआ है।
लेकिन जमीनी सच्चाई कांग्रेस के लिए अब भी चुनौतीपूर्ण है। केरल को छोड़ दें, तो अधिकांश बड़े राज्यों में पार्टी का वोट शेयर अभी भी एक अंक में सिमटा हुआ है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, आंध्र प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में कांग्रेस संगठनात्मक रूप से कमजोर बनी हुई है।
राहुल गांधी की रणनीति पर सवाल
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती भरोसे की है। INDIA गठबंधन के कई सहयोगी दलों को लगता है कि कांग्रेस अपने सहयोगियों के हितों से ज्यादा अपनी राजनीतिक जमीन बचाने पर ध्यान दे रही है।
कुछ वरिष्ठ नेताओं की राय है कि राहुल गांधी को बड़े नेता की भूमिका निभाते हुए ममता बनर्जी, शरद पवार और जगन मोहन रेड्डी जैसे नेताओं को फिर से साथ लाने की कोशिश करनी चाहिए। उनका मानना है कि अगर विपक्ष को 2029 में NDA का मुकाबला करना है, तो एक मजबूत और भरोसेमंद गठबंधन जरूरी होगा।
हालांकि कांग्रेस के भीतर मौजूद गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर असमंजस इस रणनीति को कमजोर कर सकता है। पार्टी के कई नेता मानते हैं कि केवल भाजपा विरोध के आधार पर गठबंधन लंबे समय तक नहीं चल सकता। क्षेत्रीय दल अब अपने-अपने राजनीतिक हितों को ज्यादा महत्व देने लगे हैं।
NDA को मिल सकता है बड़ा फायदा
यदि INDIA गठबंधन कमजोर होता है या टूटता है, तो इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा और NDA को मिल सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में NDA पहले से ही कई राज्यों में मजबूत स्थिति में है। विपक्ष के बिखराव से भाजपा को 2029 के चुनावों में और ज्यादा बढ़त मिल सकती है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी नेतृत्व का अभाव है। जहां NDA के पास मोदी जैसा स्पष्ट चेहरा है, वहीं INDIA गठबंधन अब तक अपना साझा नेतृत्व तय नहीं कर पाया है। यही कारण है कि चुनावी नतीजों के बाद क्षेत्रीय दल अब अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन बचाने में जुट गए हैं।
आने वाले समय में क्या होगा?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि INDIA गठबंधन पूरी तरह टूट जाएगा, लेकिन इतना साफ है कि विपक्षी राजनीति एक बड़े संक्रमण काल से गुजर रही है। कांग्रेस अपने पुराने गौरव को वापस पाने की कोशिश में है, जबकि क्षेत्रीय दल अपने प्रभाव और अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि कांग्रेस सहयोगियों को साथ लेकर चलती है या “एकला चलो” की रणनीति अपनाती है। वहीं ममता बनर्जी, केजरीवाल, स्टालिन और अखिलेश यादव जैसे नेता भी अपने राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए नए समीकरण बना सकते हैं।
देश की राजनीति अब 2029 की दिशा में तेजी से बढ़ रही है, और मौजूदा घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि विपक्ष के सामने भाजपा से लड़ने से पहले अपनी अंदरूनी लड़ाई सुलझाना सबसे बड़ी चुनौती बनने वाली है।



