
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान हुए चर्चित रामपुर तिराहा गोलीकांड मामले में नैनीताल हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को निर्देश दिया कि वह 15 दिनों के भीतर तत्कालीन मुजफ्फरनगर जिलाधिकारी अनंत कुमार सिंह से जुड़े केस की वर्तमान स्थिति अदालत के सामने पेश करे। यह मामला उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास के सबसे दर्दनाक और विवादित घटनाक्रमों में से एक माना जाता है।
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ में हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि अदालत ने पहले भी इस मामले की स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए थे, लेकिन अब तक न तो उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कोई जवाब दाखिल किया गया और न ही CBI ने कोई स्पष्ट जानकारी दी। इस पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए CBI को 15 दिन के भीतर केस संख्या 42/1996 में आरोपी रहे तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह के मामले की पूरी स्थिति बताने को कहा।
सुनवाई के दौरान CBI की ओर से अदालत को बताया गया कि उत्तराखंड राज्य गठन से पहले यह मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच और प्रक्रिया को इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास भेज दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट से यह प्रकरण उत्तराखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को भेजा गया, जिसके बाद संबंधित फाइलें देहरादून कोर्ट से मुजफ्फरनगर ट्रांसफर कर दी गईं। CBI ने अदालत से कहा कि फाइलों के स्थानांतरण के बाद केस की वर्तमान स्थिति जानने के लिए उन्हें कुछ समय दिया जाए। अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए 15 दिन का समय दिया है।
यह पूरा मामला उत्तराखंड आंदोलनकारी अधिवक्ता मंच के अध्यक्ष अधिवक्ता रमन साह द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। उन्होंने देहरादून की जिला एवं विशेष CBI अदालत द्वारा रामपुर तिराहा कांड से जुड़े मुकदमे को मुजफ्फरनगर ट्रांसफर किए जाने के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इतने संवेदनशील मामले में वर्षों बाद भी न्याय प्रक्रिया स्पष्ट नहीं हो पाई है और कई महत्वपूर्ण सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।
दरअसल, 2 अक्टूबर 1994 को अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर बड़ी संख्या में आंदोलनकारी दिल्ली की ओर कूच कर रहे थे। उसी दौरान मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा क्षेत्र में पुलिस और प्रशासन द्वारा आंदोलनकारियों को रोकने का प्रयास किया गया। आरोप है कि इस दौरान आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज, गोलीबारी और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार जैसी गंभीर घटनाएं हुईं। इस घटना ने पूरे उत्तराखंड क्षेत्र में भारी आक्रोश पैदा कर दिया था और आंदोलन और तेज हो गया था।
मामले की जांच बाद में CBI को सौंपी गई थी। जांच एजेंसी ने देहरादून की अदालत में आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए धारा 302 के तहत संज्ञान लिया था। इस केस में तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका को लेकर लंबे समय से विवाद बना हुआ है।
अधिवक्ता रमन साह ने पहले इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दाखिल की थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें हाईकोर्ट जाने की अनुमति देते हुए याचिका वहां दायर करने को कहा था। इसके बाद यह मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट में लंबित है। अब हाईकोर्ट द्वारा CBI से जवाब मांगे जाने के बाद एक बार फिर इस ऐतिहासिक और संवेदनशील मामले में नई हलचल देखने को मिल रही है।
रामपुर तिराहा गोलीकांड उत्तराखंड आंदोलन का ऐसा अध्याय है, जिसे आज भी लोग नहीं भूले हैं। आंदोलनकारियों और उनके परिवारों का मानना है कि इस मामले में पूरी तरह न्याय अब तक नहीं मिल पाया है। हाईकोर्ट की ताजा टिप्पणी और CBI को दिए गए निर्देशों के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि लंबे समय से लंबित इस मामले में अब कुछ ठोस प्रगति देखने को मिल सकती है।



