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बंगाल में क्यों टूटा ममता मैजिक? 2024 से 2026 के बीच क्या बदला कि टीएमसी सत्ता से बाहर होने की कगार पर पहुंच गई

The Hill India News
Last updated: May 4, 2026 8:03 am
The Hill India News
Published: May 4, 2026
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में साल 2026 का विधानसभा चुनाव एक बड़े राजनीतिक भूचाल की तरह देखा जा रहा है। करीब डेढ़ दशक तक राज्य की राजनीति पर मजबूत पकड़ बनाए रखने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस चुनाव में भारी दबाव में दिखाई दी। शुरुआती रुझानों और नतीजों ने साफ संकेत दे दिए कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) राज्य में ऐतिहासिक प्रदर्शन कर रही है और सत्ता के बेहद करीब पहुंच चुकी है। सवाल यही उठ रहा है कि आखिर 2024 के लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने वाली टीएमसी महज दो साल के भीतर इतनी कमजोर कैसे हो गई?

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी ने बीजेपी को बड़ा झटका दिया था। उस चुनाव में टीएमसी ने 29 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि बीजेपी सिर्फ 12 सीटों तक सिमट गई थी। ममता बनर्जी ने तब यह संदेश दिया था कि बंगाल में उनका जनाधार अब भी मजबूत है और बीजेपी का उभार स्थायी नहीं है। लेकिन 2026 आते-आते राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल गई। विधानसभा चुनाव में बीजेपी दो तिहाई बहुमत की ओर बढ़ती दिखाई दी, जबकि टीएमसी 100 सीटों के आसपास सिमटती नजर आई।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बदलाव के पीछे कई बड़े कारण रहे, जिन्होंने धीरे-धीरे टीएमसी की छवि को कमजोर किया और जनता के बीच असंतोष पैदा कर दिया। सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार और घोटालों को माना जा रहा है। पिछले दो वर्षों में टीएमसी सरकार और उसके नेताओं पर लगे आरोपों ने पार्टी की “ईमानदार और गरीबों की हितैषी” वाली छवि को गहरी चोट पहुंचाई। शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला और विभिन्न विभागों में अनियमितताओं के आरोप लगातार चर्चा में रहे। कई बड़े नेताओं और मंत्रियों के यहां ईडी और सीबीआई की छापेमारी में भारी मात्रा में नकदी और संपत्ति मिलने की खबरों ने जनता को झकझोर दिया।

ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत छवि मानी जाती थी। उन्हें एक फाइटर नेता और जमीन से जुड़ी हुई मुख्यमंत्री के तौर पर देखा जाता था। लेकिन इन घोटालों के बाद विपक्ष ने यह प्रचार करने में सफलता हासिल की कि सरकार भ्रष्टाचार पर नियंत्रण खो चुकी है। बीजेपी ने चुनाव प्रचार में इसी मुद्दे को सबसे आक्रामक तरीके से उठाया। भाजपा नेताओं ने लगातार यह दावा किया कि बंगाल में सरकारी नौकरियों से लेकर राशन व्यवस्था तक हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार फैला हुआ है। इसका असर खासकर युवाओं और मध्यम वर्ग के वोटरों पर दिखाई दिया।

इसके अलावा आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल से जुड़ा विवाद भी इस चुनाव में निर्णायक मुद्दा बन गया। इस घटना ने राज्य में महिला सुरक्षा और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बड़े सवाल खड़े किए। बीजेपी ने इस मामले को सिर्फ एक अपराध नहीं बल्कि “सिस्टम की विफलता” के तौर पर पेश किया। पार्टी ने राज्यभर में प्रदर्शन किए और महिला वोटरों तक यह संदेश पहुंचाने की कोशिश की कि बंगाल में कानून व्यवस्था कमजोर हो चुकी है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बीजेपी इस मुद्दे को भावनात्मक रूप से जनता के बीच ले जाने में सफल रही।

बीजेपी ने चुनावी रणनीति में भी बड़ा बदलाव किया। पार्टी ने सिर्फ हिंदुत्व या राष्ट्रीय मुद्दों पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय असंतोष और भावनात्मक मुद्दों पर फोकस किया। आरजी कर मामले में पीड़िता के परिवार को आगे लाकर बीजेपी ने जनता के बीच सहानुभूति हासिल करने की कोशिश की। इससे टीएमसी पर नैतिक दबाव बढ़ा और ममता सरकार को लगातार सफाई देनी पड़ी।

एक और महत्वपूर्ण कारण “एंटी इनकंबेंसी” फैक्टर रहा। ममता बनर्जी लगातार 15 वर्षों तक सत्ता में रहीं। इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद सरकार के खिलाफ स्वाभाविक नाराजगी पैदा होना तय माना जाता है। राज्य के कई इलाकों में लोगों के बीच यह भावना बनने लगी थी कि अब बदलाव होना चाहिए। बेरोजगारी, उद्योगों की कमी और निवेश के अभाव जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहे। युवा वर्ग के बीच नौकरी और भविष्य को लेकर असंतोष बढ़ा। बीजेपी ने इन्हीं मुद्दों को अपने चुनावी अभियान का केंद्र बनाया।

टीएमसी के भीतर संगठनात्मक चुनौतियां भी इस हार का बड़ा कारण बनीं। पार्टी के कई पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष की खबरें सामने आती रहीं। स्थानीय स्तर पर गुटबाजी और टिकट वितरण को लेकर नाराजगी ने भी पार्टी को नुकसान पहुंचाया। दूसरी ओर बीजेपी ने बूथ स्तर तक संगठन मजबूत किया और ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी पकड़ बढ़ाई।

महिला वोटरों के रुझान में बदलाव भी चुनाव परिणामों में अहम साबित हुआ। पिछले चुनावों में ममता बनर्जी को महिला वोटरों का बड़ा समर्थन मिलता रहा था। लेकिन इस बार महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे मुद्दों ने महिला मतदाताओं को प्रभावित किया। बीजेपी ने महिला मोर्चा और विभिन्न अभियानों के जरिए इस वर्ग तक लगातार पहुंच बनाई।

हालांकि टीएमसी के लिए यह हार सिर्फ एक चुनावी झटका नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश के तौर पर देखी जा रही है। 2024 में जिस पार्टी को बंगाल की सबसे मजबूत ताकत माना जा रहा था, वही पार्टी 2026 में सत्ता से बाहर होने की स्थिति में पहुंच गई। इससे साफ संकेत मिलता है कि जनता अब सिर्फ करिश्माई नेतृत्व के आधार पर वोट नहीं कर रही, बल्कि शासन, पारदर्शिता और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों को भी प्राथमिकता दे रही है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह बदलाव आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है। बीजेपी के लिए यह जीत सिर्फ एक राज्य में सत्ता हासिल करने का मौका नहीं बल्कि पूर्वी भारत में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का संकेत है। वहीं ममता बनर्जी और टीएमसी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी खोई हुई विश्वसनीयता वापस हासिल करने की होगी।

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