
पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने देश की राजनीति को कई बड़े संदेश दिए हैं। इन चुनावों में जहां एक तरफ बीजेपी ने बंगाल और असम में शानदार प्रदर्शन करते हुए सरकार बनाने की ओर मजबूत बढ़त बनाई है, वहीं तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके ने बड़ा राजनीतिक उलटफेर कर दिया है। केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ ने सत्ता में वापसी के संकेत दिए हैं।
लेकिन इन चुनावों की सबसे ज्यादा चर्चा जिस मुद्दे को लेकर हो रही है, वह है मुस्लिम राजनीति और मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों का खराब प्रदर्शन। बंगाल से लेकर असम तक कई मुस्लिम नेता और दल अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की उम्मीद में चुनावी मैदान में उतरे थे, लेकिन जनता ने उन्हें खास समर्थन नहीं दिया। हुमायूं कबीर, बदरुद्दीन अजमल, असदुद्दीन ओवैसी और इंडियन सेकुलर फ्रंट जैसे बड़े नाम इस चुनाव में कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ सके।
बंगाल में हुमायूं कबीर का दांव पूरी तरह फेल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर ने अपनी नई पार्टी “आम जनता उन्नयन पार्टी” यानी AJUP बनाकर बड़ा राजनीतिक दांव खेला था। उन्होंने दावा किया था कि उनकी पार्टी मुस्लिम बहुल इलाकों में मजबूत पकड़ बनाएगी और टीएमसी को चुनौती देगी।
हुमायूं कबीर ने राज्य की 115 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। खुद वे मुर्शिदाबाद जिले की रेजीनगर और नोआदा सीट से चुनाव मैदान में उतरे। लेकिन शुरुआती रुझानों और मतगणना के आंकड़ों में उनकी पार्टी कहीं भी मुकाबले में नजर नहीं आई।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुस्लिम वोटरों ने बीजेपी को रोकने के लिए रणनीतिक वोटिंग की और बड़ी संख्या में ममता बनर्जी की टीएमसी के साथ चले गए। इसका सीधा नुकसान हुमायूं कबीर की पार्टी को हुआ।
चुनाव के दौरान हुमायूं कबीर कई विवादों में भी रहे। बाबरी मस्जिद को लेकर दिए गए बयान और बेलडांगा इलाके में बाबरी मस्जिद की नींव रखने जैसे मुद्दों ने उन्हें सुर्खियों में जरूर रखा, लेकिन इसका चुनावी फायदा नहीं मिला।
इंडियन सेकुलर फ्रंट भी नहीं बचा पाया साख
फुरफुरा शरीफ से जुड़े पीरजादा नौशाद सिद्दीकी के नेतृत्व वाला इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) भी बंगाल चुनाव में बड़ी उम्मीदों के साथ उतरा था। पार्टी ने लगभग 120 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और कई सीटों पर वाम दलों के साथ गठबंधन किया।
हालांकि चुनाव परिणामों में ISF का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। नौशाद सिद्दीकी खुद भांगड़ विधानसभा सीट पर पीछे चल रहे हैं। यहां टीएमसी नेता शौकत मोल्ला ने मजबूत बढ़त बनाई हुई है।
ISF ने दक्षिण 24 परगना, उत्तर 24 परगना, हावड़ा, हुगली और मालदा जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में जोरदार प्रचार किया था। लेकिन पार्टी मुस्लिम वोटों को एकजुट करने में सफल नहीं हो पाई।
विश्लेषकों के मुताबिक, बंगाल में इस बार मुस्लिम वोटरों ने छोटे दलों के बजाय सीधे टीएमसी का समर्थन किया ताकि बीजेपी को सत्ता में आने से रोका जा सके। यही वजह रही कि ISF जैसी पार्टियों का आधार कमजोर पड़ गया।
असम में बदरुद्दीन अजमल की राजनीति को बड़ा झटका
असम की राजनीति में कभी “किंगमेकर” कहे जाने वाले बदरुद्दीन अजमल और उनकी पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) को भी इस चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा।
AIUDF ने 27 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन पार्टी केवल दो सीटों पर ही बढ़त बनाती दिखाई दी। खुद बदरुद्दीन अजमल बिन्नाकांडी सीट से आगे चल रहे हैं, लेकिन पार्टी का कुल प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा।
2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और AIUDF ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उस समय दोनों दलों के गठबंधन “महाजोत” ने बीजेपी को चुनौती देने की कोशिश की थी। लेकिन बाद में कांग्रेस ने ध्रुवीकरण से बचने के लिए AIUDF से दूरी बना ली।
इस बार कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ा और मुस्लिम वोट हासिल करने में कुछ हद तक सफल भी रही, लेकिन हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण को रोक नहीं पाई। दूसरी ओर, AIUDF का पारंपरिक वोट बैंक भी कमजोर पड़ गया।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि असम में मतदाताओं ने अब केवल धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीति को समर्थन देना कम कर दिया है और विकास तथा स्थिर सरकार को प्राथमिकता दी है।
बंगाल में ओवैसी का प्रयोग भी फ्लॉप
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार चुनावों में मिली सफलता के बाद पश्चिम बंगाल में भी अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश की थी। AIMIM ने बंगाल की आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे।
हालांकि पार्टी किसी भी सीट पर मजबूत स्थिति में नजर नहीं आई। कई सीटों पर AIMIM उम्मीदवार तीसरे और चौथे स्थान पर चले गए।
ओवैसी ने चुनाव प्रचार के दौरान मुस्लिम मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की, लेकिन बंगाल में उनकी रणनीति काम नहीं आई। हुमायूं कबीर के साथ विवाद और बाद में अलग चुनाव लड़ने के फैसले ने भी AIMIM को नुकसान पहुंचाया।
असम में भी ओवैसी ने AIUDF का समर्थन किया और बदरुद्दीन अजमल के पक्ष में कई रैलियां कीं। उन्होंने मतदाताओं से “ताला-चाबी” चुनाव चिन्ह पर वोट देने की अपील की, लेकिन इसका कोई बड़ा असर नहीं दिखा।
क्या है इन नतीजों का बड़ा राजनीतिक संदेश?
2026 के विधानसभा चुनाव नतीजों ने साफ संकेत दिया है कि केवल धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीति करना अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है। बंगाल और असम में मुस्लिम वोटरों ने छोटे दलों की बजाय बड़े राजनीतिक दलों को प्राथमिकता दी।
विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता अब स्थिर सरकार, विकास, रोजगार और मजबूत नेतृत्व जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। यही वजह है कि अलग-अलग मुस्लिम दलों और नेताओं को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया।
इन चुनावों ने यह भी दिखाया कि क्षेत्रीय राजनीति में नई रणनीतियों और मजबूत संगठन के बिना केवल भावनात्मक मुद्दों के सहारे चुनाव जीतना मुश्किल होता जा रहा है। बंगाल से असम तक मुस्लिम राजनीति के कई बड़े चेहरे इस बार चुनावी मैदान में धूल चाटते नजर आए।



