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उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तराखंड में DPC चुनाव की तैयारी पूरी: पंचायतों को मिलेगी नई रफ्तार, शासन की मंजूरी का इंतजार

The Hill India News
Last updated: April 28, 2026 6:16 am
The Hill India News
Published: April 28, 2026
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उत्तराखंड में पंचायत और निकाय चुनावों के बाद अब जिला योजना समिति (DPC) के गठन की प्रक्रिया तेज होने जा रही है। राज्य के विभिन्न जिलों में DPC चुनावों को लेकर सभी तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं और अब सिर्फ शासन की अंतिम मंजूरी का इंतजार है। जैसे ही सरकार की ओर से अधिसूचना जारी होगी, चुनाव प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू कर दी जाएगी। यह कदम ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के समन्वित विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

देहरादून से मिली जानकारी के अनुसार, पंचायती राज विभाग ने DPC के गठन को लेकर अपना पूरा होमवर्क कर लिया है। विभाग ने शासन को प्रस्ताव भेज दिया है और अब आगे की कार्रवाई शासन स्तर पर होनी है। जिला योजना समिति के गठन से विकास योजनाओं को गति मिलने की उम्मीद है, क्योंकि यह समिति जिला स्तर पर विकास कार्यों की प्राथमिकताओं को तय करती है।

पंचायती राज निदेशक निधि यादव ने बताया कि DPC के गठन के लिए शहरी निकायों और ग्राम पंचायतों के चुनाव अनिवार्य होते हैं। इन चुनावों के माध्यम से चुने गए प्रतिनिधियों में से ही जिला योजना समिति का गठन किया जाता है। उन्होंने कहा कि जिलाधिकारियों को परिसीमन (डिलिमिटेशन) की प्रक्रिया पूरी करनी होगी, जिसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव संपन्न कराए जाएंगे। जैसे ही शासन अधिसूचना जारी करेगा, पूरी प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ेगी।

DPC चुनावों के साथ ही राज्य में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के तरीके में भी बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। खासतौर पर मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) के तहत काम करने की प्रक्रिया में सुधार किया गया है। केंद्र सरकार द्वारा लाई गई नई योजना ‘GRAM G’ के तहत अब ग्राम पंचायतों को वार्षिक योजना (एनुअल प्लान) के आधार पर ही कार्य करना होगा। इससे योजनाओं में पारदर्शिता और प्रभावशीलता बढ़ेगी।

निधि यादव ने बताया कि सभी ग्राम पंचायतों को अपने विकास प्रस्ताव “पीपुल प्लान कैंपेन” के तहत तैयार करने होंगे। यह अभियान हर साल 2 अक्टूबर से 31 जनवरी तक चलता है, जिसमें पंचायतें अगले वित्तीय वर्ष के लिए अपनी योजनाएं तैयार करती हैं। इन योजनाओं के आधार पर ही विकास कार्यों को मंजूरी दी जाएगी। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य विकास कार्यों में होने वाली डुप्लीकेसी को रोकना है।

पहले अक्सर यह देखा जाता था कि एक ही काम को अलग-अलग योजनाओं में दिखाकर बार-बार फंड लिया जाता था, जिससे नए कार्यों को मौका नहीं मिल पाता था। अब पंचायती राज योजनाओं और मनरेगा को एकीकृत कर दिया गया है, जिससे इस तरह की गड़बड़ियों पर रोक लगेगी और संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।

इसके अलावा, राज्य में ई-गवर्नेंस को भी काफी मजबूत किया गया है। ग्राम पंचायतों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इंडेक्स किया गया है, जिससे ग्राम प्रधान अपनी कार्यप्रणाली का मूल्यांकन खुद कर सकते हैं। सरकारी वेबसाइटों पर जाकर वे अपनी परफॉर्मेंस, स्कोर और कमजोरियों का विश्लेषण कर सकते हैं। इससे पंचायतों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी।

पंचायती राज विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर ग्राम प्रधानों के लिए कई ट्रेनिंग मॉड्यूल भी उपलब्ध हैं। इन मॉड्यूल्स के माध्यम से प्रधान यह सीख सकते हैं कि विकास योजनाओं की योजना कैसे बनाई जाए, प्रस्ताव कैसे तैयार किए जाएं और फंड का सही उपयोग कैसे किया जाए। यह पहल पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

निधि यादव ने यह भी स्पष्ट किया कि अब ग्राम पंचायतों के लिए खुद का राजस्व (Own Source Revenue – OSR) उत्पन्न करना बेहद जरूरी हो गया है। 16वें वित्त आयोग की गाइडलाइन के अनुसार, यदि कोई पंचायत खुद के आय स्रोत विकसित नहीं करती है, तो उसे मिलने वाले फंड में 20% की कटौती की जा सकती है। इसका मतलब है कि पंचायतों को अब सिर्फ सरकारी अनुदान पर निर्भर रहने के बजाय अपनी आय के साधन भी विकसित करने होंगे।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण भारत की कई पंचायतों ने अपने स्तर पर हजारों करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया है। इसी मॉडल को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड में भी पंचायतों को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

कुल मिलाकर, DPC चुनावों के साथ उत्तराखंड में स्थानीय शासन व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। इससे न केवल विकास योजनाओं को नई गति मिलेगी, बल्कि पंचायतों में पारदर्शिता, जवाबदेही और आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी। अब सबकी नजरें शासन की हरी झंडी पर टिकी हैं, जिसके बाद यह पूरी प्रक्रिया जमीन पर उतरती नजर आएगी।

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