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Reading: इस्लामाबाद वार्ता पर सस्पेंस: ट्रंप की चेतावनी, ईरान के ‘नए पत्ते’ और बढ़ता युद्ध का खतरा
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इस्लामाबाद वार्ता पर सस्पेंस: ट्रंप की चेतावनी, ईरान के ‘नए पत्ते’ और बढ़ता युद्ध का खतरा

The Hill India News
Last updated: April 21, 2026 4:42 am
The Hill India News
Published: April 21, 2026
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अमेरिका और ईरान के बीच संभावित दूसरे दौर की शांति वार्ता को लेकर पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। दुनिया भर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों देश बातचीत की मेज पर लौटेंगे या फिर हालात एक बार फिर युद्ध की ओर बढ़ेंगे। दो हफ्तों के युद्धविराम (सीजफायर) की अवधि समाप्त होने के करीब है, और इसी के साथ तनाव भी लगातार बढ़ता जा रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले संकेत दिया था कि शांति वार्ता का दूसरा दौर पाकिस्तान में शुरू हो सकता है, लेकिन ईरान की ओर से अब तक इसमें शामिल होने की कोई स्पष्ट पुष्टि नहीं की गई है। इस वजह से बैठक होगी या नहीं, इस पर सस्पेंस बना हुआ है।

व्हाइट हाउस की ओर से यह भी कहा गया है कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस्लामाबाद जाने के लिए तैयार हैं। उनके साथ ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और दामाद जारेड कुशनर भी इस यात्रा में शामिल हो सकते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका बातचीत के लिए पूरी तरह तैयार है और वह इस वार्ता को आगे बढ़ाना चाहता है।

हालांकि, ईरान का रुख अब तक सख्त बना हुआ है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी कर और एक जहाज को जब्त कर युद्धविराम का उल्लंघन किया है। गालिबाफ ने यह भी कहा कि ट्रंप बातचीत को “सरेंडर की मेज” में बदलना चाहते हैं, जिसे ईरान किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा।

ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह “धमकी की छाया में” कोई बातचीत नहीं करेगा। साथ ही, उसने संकेत दिया है कि पिछले दो हफ्तों में उसने “नए पत्ते” तैयार किए हैं, जिससे यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि अगर युद्ध दोबारा शुरू होता है तो ईरान और ज्यादा आक्रामक रणनीति अपना सकता है।

दूसरी ओर, ट्रंप लगातार दबाव की रणनीति अपनाए हुए हैं। उन्होंने साफ कहा है कि जब तक ईरान शांति समझौते पर सहमत नहीं होता, तब तक अमेरिका नाकाबंदी नहीं हटाएगा। ट्रंप के अनुसार, इस नाकाबंदी से ईरान को हर दिन भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है, जो लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।

ट्रंप ने यह भी दावा किया कि अमेरिका इस संघर्ष में मजबूत स्थिति में है और उसकी सैन्य कार्रवाई ने ईरान को कमजोर कर दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर युद्धविराम समाप्त हुआ, तो “फिर से बम गिरने शुरू हो जाएंगे।” इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है।

अमेरिका के भीतर भी इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेद सामने आ रहे हैं। सीनेट में डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ युद्ध शक्तियों से जुड़े प्रस्ताव को फिर से लाने की बात कही है। उनका कहना है कि कांग्रेस को इस युद्ध पर अपनी भूमिका निभानी चाहिए, क्योंकि संविधान के अनुसार युद्ध घोषित करने का अधिकार राष्ट्रपति के बजाय कांग्रेस के पास होता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच संयुक्त राष्ट्र की ओर से भी चिंता जताई गई है। यूएन की मानवीय एजेंसी के प्रमुख टॉम फ्लेचर ने कहा कि अमेरिका हर हफ्ते इस युद्ध पर भारी रकम खर्च कर रहा है, जिसे मानवता की भलाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था।

इधर, मध्य पूर्व के अन्य हिस्सों में भी तनाव बना हुआ है। इजरायल और लेबनान के बीच वॉशिंगटन में एक अलग वार्ता की तैयारी चल रही है। हिज्बुल्लाह की भागीदारी और ईरान के समर्थन ने इस संघर्ष को और जटिल बना दिया है।

कुल मिलाकर, इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता को लेकर स्थिति बेहद अनिश्चित है। एक तरफ अमेरिका बातचीत के लिए तैयार दिख रहा है, वहीं ईरान की शर्तें और आरोप इस प्रक्रिया को मुश्किल बना रहे हैं। यदि आखिरी समय तक कोई सहमति नहीं बनती, तो युद्धविराम समाप्त होते ही संघर्ष फिर तेज हो सकता है।

ऐसे में आने वाले कुछ दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं। यह तय करेंगे कि दुनिया एक और बड़े युद्ध की ओर बढ़ेगी या कूटनीति के जरिए शांति की कोई राह निकलेगी।

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