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दिल्ली आबकारी मामला: हाईकोर्ट में आज फिर दलीलें रख सकते हैं अरविंद केजरीवाल, जवाबी हलफनामा रिकॉर्ड पर लेने की मांग तेज

The Hill India News
Last updated: April 20, 2026 4:57 am
The Hill India News
Published: April 20, 2026
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नई दिल्ली: दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े चर्चित मामले में आज एक बार फिर कानूनी हलचल तेज रहने की संभावना है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal आज दिल्ली हाईकोर्ट में पेश होकर अपनी दलीलें रख सकते हैं। इस बीच उन्होंने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के जवाब के खिलाफ अपना जवाबी हलफनामा दाखिल किया है और अदालत से इसे रिकॉर्ड पर लेने की मांग की है।

इस मामले ने नया मोड़ तब लिया जब केजरीवाल ने अपने हलफनामे में जस्टिस Swarnkanta Sharma की बेंच पर सवाल उठाते हुए उनसे खुद को सुनवाई से अलग करने की मांग की। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जस्टिस शर्मा के परिवारिक संबंध मामले की निष्पक्ष सुनवाई पर असर डाल सकते हैं। केजरीवाल के अनुसार, जस्टिस शर्मा के दोनों बच्चे सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta के अधीन कार्यरत हैं, जो इस केस में सीबीआई की ओर से पेश हो रहे हैं।

केजरीवाल ने अपने हलफनामे में तर्क दिया कि जब मामले में सरकार की ओर से तुषार मेहता पैरवी कर रहे हैं, तो ऐसे में जस्टिस शर्मा के लिए उनके खिलाफ निष्पक्ष आदेश देना कठिन हो सकता है। उन्होंने इस स्थिति को न्यायिक निष्पक्षता के सिद्धांतों के विपरीत बताया और अदालत से अनुरोध किया कि इस केस की सुनवाई किसी अन्य बेंच को सौंपी जाए।

इससे पहले 13 अप्रैल को भी केजरीवाल ने स्वयं अदालत में पेश होकर जस्टिस शर्मा की बेंच पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि अब तक की सुनवाई की प्रक्रिया को देखते हुए उन्हें निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद कम दिखाई दे रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अदालत ने शुरुआती सुनवाई में ही बिना दोनों पक्षों की दलीलें सुने सत्र अदालत के आदेश को “प्रथम दृष्टया गलत” करार दे दिया।

केजरीवाल ने 9 मार्च की सुनवाई का जिक्र करते हुए कहा कि उस दिन कोर्ट में 23 में से एक भी आरोपी मौजूद नहीं था और केवल सीबीआई की ओर से पक्ष रखा गया। इसके बावजूद अदालत ने जल्दबाजी में राय बना ली। उन्होंने सवाल उठाया कि बिना रिकॉर्ड मंगवाए और बिना सभी पक्षों की दलीलें सुने अदालत इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंच सकती है।

एक अन्य अहम मुद्दे पर केजरीवाल ने आरोप लगाया कि अदालत ने बिना किसी औपचारिक अर्जी के प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्यवाही पर भी रोक लगा दी। उन्होंने कहा कि उस दिन सुनवाई सीबीआई की अपील पर हो रही थी, लेकिन जस्टिस शर्मा ने स्वयं ही ED से जुड़े पहलुओं पर रोक लगा दी, जबकि न तो केंद्र सरकार और न ही ED ने इसके लिए कोई अनुरोध किया था।

केजरीवाल का कहना है कि यदि मुख्य केस में अपराध साबित नहीं होता, तो ED का मामला स्वतः कमजोर हो जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि सत्र अदालत पहले ही सीबीआई केस को खारिज कर चुकी थी, जिससे ED केस भी प्रभावित होना तय था। इसके बावजूद हाईकोर्ट द्वारा हस्तक्षेप करना कई सवाल खड़े करता है।

इसके अलावा, केजरीवाल ने यह भी आरोप लगाया कि अदालत ने सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पर भी रोक लगा दी, जबकि संबंधित अधिकारी ने इसके लिए कोई याचिका नहीं दी थी। उन्होंने इस तरह की “असामान्य सक्रियता” को संदेह पैदा करने वाला बताया।

उन्होंने कोर्ट की कार्यवाही की टाइमिंग पर भी सवाल उठाए। केजरीवाल के अनुसार, सामान्य मामलों में अदालत 3 से 7 महीने तक की तारीख देती है, लेकिन इस केस में आरोपियों को जवाब दाखिल करने के लिए सिर्फ एक सप्ताह का समय दिया गया। उनका कहना है कि 600 पन्नों के आदेश और जटिल अपील का जवाब इतने कम समय में देना लगभग असंभव है।

केजरीवाल ने अपने हलफनामे में यह भी उल्लेख किया कि जब पिछले वर्ष कुछ आरोपियों ने जमानत की मांग की थी, तब जस्टिस शर्मा ने कठोर टिप्पणियां करते हुए जमानत खारिज कर दी थी। उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार बेल की सुनवाई के दौरान किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन आदेश में आरोपियों को पहले ही दोषी बताया गया, जो पूर्वाग्रह को दर्शाता है।

उन्होंने यह भी दावा किया कि जस्टिस शर्मा द्वारा दिए गए कई जमानत आदेशों को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल आरोपियों को राहत दी, बल्कि जस्टिस शर्मा के रुख पर भी सख्त टिप्पणियां की थीं।

पूरे मामले में केजरीवाल का मुख्य तर्क यह है कि जांच एजेंसियों की दलीलों को बिना गहराई से जांचे स्वीकार किया जा रहा है, जिससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि अदालत को सभी पक्षों को समान अवसर देना चाहिए ताकि न्याय की पारदर्शिता बनी रहे।

अब सभी की नजरें आज की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय हो सकता है कि केजरीवाल का जवाबी हलफनामा रिकॉर्ड पर लिया जाएगा या नहीं, और क्या जज के खिलाफ उठाए गए सवालों पर कोई ठोस फैसला सामने आता है।

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