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उत्तराखंड में वन संरक्षण और आजीविका का ‘जायका मॉडल’: ₹1500 करोड़ से शुरू होगा फेज-2, 47 वन रेंजों की बदलेगी सूरत

The Hill India News
Last updated: April 14, 2026 3:08 am
The Hill India News
Published: April 14, 2026
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Photo: @subodhuniyal Facebook
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देहरादून। उत्तराखंड में जंगलों के संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की दिशा में ‘उत्तराक्रम वन संसाधन प्रबंधन परियोजना’ (जायका) एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। परियोजना के पहले चरण की शानदार सफलता के बाद अब इसके दूसरे चरण (फेज-2) की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। हाल ही में जायका इंडिया के मुख्य प्रतिनिधि टेकुची टकुरो और प्रदेश के वन मंत्री सुबोध उनियाल के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक में इस महत्वाकांक्षी योजना के भविष्य के रोडमैप पर मुहर लगा दी गई है।

Contents
फेज-2: 10 साल का विजन और ₹1500 करोड़ का निवेशपहले चरण की उपलब्धियां: उम्मीद से बेहतर नतीजेजापानी तकनीक से भू-कटाव पर लगामआजीविका संवर्धन: स्वरोजगार की नई राहफेज-2 की प्राथमिकताएं: मानव-वन्यजीव संघर्ष और जड़ी-बूटीजैव विविधता का संरक्षण और भविष्य की राहसतत विकास की ओर बढ़ते कदम

फेज-2: 10 साल का विजन और ₹1500 करोड़ का निवेश

जायका परियोजना उत्तराखंड का दूसरा चरण वर्ष 2026 से 2035 तक के लिए प्रस्तावित किया गया है। 10 वर्षों की इस दीर्घकालिक योजना की कुल लागत ₹1500 करोड़ आंकी गई है। वित्तीय ढांचे की बात करें तो इसमें 85 प्रतिशत की भारी भरकम हिस्सेदारी जायका (जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी) द्वारा वहन की जाएगी, जबकि शेष 15 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार निवेश करेगी।

दूसरे चरण का दायरा पहले के मुकाबले काफी व्यापक होगा। इसके तहत राज्य की 47 वन रेंजों को शामिल करने का प्रस्ताव है, जहाँ आधुनिक जापानी तकनीक और स्थानीय ज्ञान के मेल से पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया जाएगा।

पहले चरण की उपलब्धियां: उम्मीद से बेहतर नतीजे

परियोजना के पहले चरण ने उत्तराखंड के 13 वन प्रभागों की 36 रेंजों में अपनी प्रभावशीलता साबित की है। आंकड़ों के नजरिए से देखें तो:

  • ईको-रेस्टोरेशन: पहले फेज में 38,000 हेक्टेयर के लक्ष्य के विपरीत 38,393 हेक्टेयर क्षेत्र में पुनर्स्थापना कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया गया।

  • वित्तीय अनुशासन: ₹807 करोड़ के कुल बजट के मुकाबले 95 प्रतिशत से अधिक राशि का सदुपयोग किया जा चुका है।

  • सामाजिक सशक्तिकरण: 839 वन पंचायतों में 1503 स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का गठन किया गया, जो ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन का आधार बने हैं।

वन मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार, “यह परियोजना केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समयबद्धता और वित्तीय अनुशासन के साथ पर्यावरण और आजीविका के बीच संतुलन बनाने का एक सफल वैश्विक मॉडल है।”

जापानी तकनीक से भू-कटाव पर लगाम

उत्तराखंड के पहाड़ी भूगोल के लिए भूस्खलन और मृदा अपरदन एक बड़ी चुनौती है। जायका परियोजना के तहत जापानी विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में तीन मॉडल साइट्स विकसित की गई हैं। यहाँ जापानी तकनीक का उपयोग कर भू-कटाव रोकने के कार्य किए जा रहे हैं, जिन्हें इस माह के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य है। यह प्रयोग सफल रहने पर इसे दूसरे चरण में पूरे प्रदेश के संवेदनशील इलाकों में लागू किया जाएगा।

आजीविका संवर्धन: स्वरोजगार की नई राह

इस परियोजना की सबसे बड़ी खूबी इसका ‘कम्युनिटी-लिंक्ड’ होना है। 18 अलग-अलग मूल्य वृद्धि श्रृंखलाओं (Value Chains) के माध्यम से स्थानीय लोगों को जोड़ा गया है। इसमें विशेष रूप से:

  1. सेब उत्पादन और अखरोट रोपण: बागवानी के जरिए किसानों की आय बढ़ाने पर जोर।

  2. मधुमक्खी पालन: स्थानीय शहद को ब्रांडिंग के जरिए बाजार तक पहुँचाना।

  3. क्लस्टर फेडरेशन: 20 क्लस्टर फेडरेशन और एक राज्य स्तरीय शीर्ष फेडरेशन के माध्यम से उत्पादों की मार्केटिंग सुनिश्चित की जा रही है।

फेज-2 की प्राथमिकताएं: मानव-वन्यजीव संघर्ष और जड़ी-बूटी

आगामी फेज-2 में कुछ नए और चुनौतीपूर्ण विषयों को भी शामिल किया गया है। उत्तराखंड में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार की गई है। इसके अलावा, जड़ी-बूटी रोपण और कृषि वानिकी (Agro-forestry) को प्राथमिकता दी जाएगी ताकि ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन को रोका जा सके।

परियोजना के तहत जड़ी-बूटियों के उत्पादन से लेकर उनकी प्रोसेसिंग और पैकेजिंग तक का बुनियादी ढांचा तैयार किया जाएगा, जिससे उत्तराखंड के ‘आयुष प्रदेश’ बनने के सपने को भी बल मिलेगा।

जैव विविधता का संरक्षण और भविष्य की राह

जायका परियोजना उत्तराखंड न केवल राज्य के हरित आवरण को बढ़ाने का काम कर रही है, बल्कि यह जल स्रोतों के पुनर्जीवन (Water Conservation) में भी सहायक सिद्ध हुई है। ईको-रेस्टोरेशन के कार्यों से जंगलों के भीतर नमी बढ़ी है, जिससे वनाग्नि जैसी घटनाओं में भी कमी आने की उम्मीद है।

सतत विकास की ओर बढ़ते कदम

उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य के लिए विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना हमेशा से एक चुनौती रही है। लेकिन जायका परियोजना ने यह दिखा दिया है कि यदि समुदायों को संरक्षण के साथ आर्थिक लाभ से जोड़ दिया जाए, तो स्थायी परिवर्तन संभव है। ₹1500 करोड़ का दूसरा चरण निश्चित रूप से देवभूमि की पारिस्थितिकी और आर्थिकी, दोनों के लिए एक संजीवनी साबित होगा।

आने वाले वर्षों में, यह मॉडल न केवल भारत बल्कि अन्य पहाड़ी देशों के लिए भी वन प्रबंधन का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश करेगा।

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