
देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड में पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) की किल्लत को लेकर सोशल मीडिया पर तैर रही खबरों ने आम जनता के बीच बेचैनी पैदा कर दी है। हालांकि, सरकारी आंकड़ों और तेल कंपनियों के दावों ने इन तमाम कयासों पर विराम लगा दिया है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) के डिविजनल रिटेल सेल्स हेड और स्टेट लेवल कोऑर्डिनेटर कृष्ण कुमार गुप्ता ने स्पष्ट किया है कि राज्य में ईंधन की कोई कमी नहीं है और सप्लाई चेन पूरी तरह सुचारु है।
आंकड़ों की जुबानी: पर्याप्त है पेट्रोल और डीजल का स्टॉक
राज्य में ईंधन की उपलब्धता पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए कृष्ण कुमार गुप्ता ने बताया कि उत्तराखंड के बुनियादी ढांचे में तेल की कमी का कोई स्थान नहीं है। वर्तमान में प्रदेश भर में कुल 978 पेट्रोल पंप संचालित हो रहे हैं। इनमें प्रमुख कंपनियों की भागीदारी इस प्रकार है:
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इंडियन ऑयल (IOCL): 431 पंप
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हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL): 254 पंप
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भारत पेट्रोलियम (BPCL): 214 पंप
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रिलायंस व नायरा: क्रमशः 28 और 50 पंप
आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड में हर महीने औसतन 60 हजार किलोलीटर पेट्रोल और 75 हजार किलोलीटर डीजल की खपत होती है। विशेष बात यह है कि इस साल मार्च महीने में पेट्रोल की खपत में 2% और डीजल में 6% की वृद्धि दर्ज की गई है। अधिकारियों का तर्क है कि यदि सप्लाई में बाधा होती, तो खपत के इन बढ़ते आंकड़ों को छूना संभव नहीं था।
एलपीजी पर ‘फेक न्यूज’ का वार: 6 दिन का बना बैकलॉग
रसोई गैस को लेकर फैली भ्रांतियों ने स्थिति को थोड़ा चुनौतीपूर्ण बना दिया है। कृष्ण कुमार गुप्ता ने स्वीकार किया कि पैनिक बुकिंग (डर के कारण समय से पहले बुकिंग) की वजह से करीब 6 दिन का बैकलॉग तैयार हो गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य में हर महीने 18 लाख सिलेंडरों की खपत होती है।
तुलनात्मक आंकड़ों को देखें तो मार्च 2025 में प्रतिदिन 55 हजार सिलेंडर की सप्लाई होती थी, जो इस मार्च 2026 में बढ़कर 56 हजार सिलेंडर प्रतिदिन हो गई है। यानी सप्लाई कम होने के बजाय बढ़ी है, लेकिन अफवाहों के चलते उपभोक्ताओं ने जरूरत से ज्यादा बुकिंग कर दी, जिससे वितरण व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है।
नियमों में कड़ाई: बुकिंग का नया शेड्यूल
गैस वितरण को पारदर्शी बनाने के लिए सरकार ने नए नियम लागू किए हैं। अब शहरी क्षेत्रों में 25 दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिन के अनिवार्य अंतराल पर ही बुकिंग की जा सकेगी। इसके अलावा, डिलीवरी ऑथेंटिकेशन कोड (DAC) की व्यवस्था को कड़ाई से लागू किया गया है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि गैस सिलेंडर सही और पंजीकृत उपभोक्ता तक ही पहुंचे।
कमर्शियल सेक्टर की बात करें तो अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को 100% सप्लाई दी जा रही है, जबकि अन्य कमर्शियल सेक्टर्स को फिलहाल 70% आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। रिफाइनरीज अपनी पूरी क्षमता पर काम कर रही हैं ताकि जल्द ही बैकलॉग को खत्म किया जा सके।
ग्राउंड जीरो: रामनगर में बढ़ा बवाल
एक ओर जहां अधिकारी सब कुछ सामान्य होने का दावा कर रहे हैं, वहीं धरातल पर कुछ जगहों से अव्यवस्था की खबरें भी आ रही हैं। नैनीताल जिले के रामनगर में गैस वितरण को लेकर विवाद गहरा गया है। सोमवार को यूथ कांग्रेस के जिला अध्यक्ष सुमित लोहनी के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने गैस एजेंसी परिसर में जमकर हंगामा किया।
कांग्रेस का आरोप है कि एजेंसी परिसर में गैस से भरे वाहन खड़े हैं, लेकिन उपभोक्ताओं को खाली हाथ लौटाया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों ने इसे कृत्रिम किल्लत करार देते हुए प्रबंधन पर कालाबाजारी के गंभीर आरोप लगाए हैं। इस धरने ने प्रशासन की ‘ऑल इज वेल’ की रिपोर्ट पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
अपील: पैनिक न हों, अफवाहों से बचें
स्टेट कोऑर्डिनेटर ने जनता से अपील की है कि वे किसी भी प्रकार की भ्रामक सूचनाओं पर ध्यान न दें। उन्होंने कहा, “उत्तराखंड में पेट्रोल डीजल और एलपीजी सप्लाई को लेकर कोई संकट नहीं है। रिफाइनरी से लेकर स्थानीय डिपो तक स्टॉक पर्याप्त है। उपभोक्ता केवल अपनी जरूरत के हिसाब से ही बुकिंग करें, ताकि बैकलॉग को जल्द से जल्द खत्म कर वितरण को फिर से सामान्य पटरी पर लाया जा सके।”
विशेषज्ञों की राय: सप्लाई चेन का प्रबंधन है जरूरी
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड जैसे भौगोलिक रूप से विषम राज्य में सप्लाई चेन का प्रबंधन बेहद संवेदनशील होता है। पर्यटन सीजन शुरू होने से ठीक पहले इस तरह की अफवाहें न केवल स्थानीय निवासियों को परेशान करती हैं, बल्कि राज्य की पर्यटन छवि पर भी बुरा असर डालती हैं। सरकार को चाहिए कि वह न केवल आपूर्ति बढ़ाए, बल्कि स्थानीय स्तर पर हो रही वितरण की अनियमितताओं पर भी सख्त निगरानी रखे।
कुल मिलाकर, उत्तराखंड में ईंधन की उपलब्धता को लेकर तस्वीर साफ है—तेल और गैस की कमी नहीं है, बल्कि ‘डिमांड और पैनिक’ के बीच का संतुलन बिगड़ गया है। अधिकारियों के आश्वासनों और रामनगर जैसे आंदोलनों के बीच जनता को यह समझना होगा कि पैनिक बुकिंग समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या की जड़ है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन कब तक इस 6 दिन के बैकलॉग को खत्म कर जनता को राहत दिला पाता है।



