रुद्रपुर (विशेष संवाददाता): उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार के ‘लैंड जिहाद’ और सरकारी भूमि पर अवैध अतिक्रमण के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति का असर अब धरातल पर प्रचंड रूप से दिखने लगा है। इसी कड़ी में सोमवार तड़के ऊधमसिंह नगर जिले के रुद्रपुर क्षेत्र में वन विभाग और जिला प्रशासन ने एक संयुक्त ऑपरेशन चलाकर वन भूमि पर स्थापित दो अवैध मजारों को मलबे में तब्दील कर दिया। उत्तराखंड अवैध मजार ध्वस्तीकरण की इस कार्रवाई ने उन लोगों को स्पष्ट संदेश दे दिया है जो सरकारी संपत्तियों पर धार्मिक आड़ में कब्जा जमाने की कोशिश कर रहे हैं।
तड़के सुबह शुरू हुआ ‘क्लीन स्वीप’ ऑपरेशन
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई बेहद गोपनीय तरीके से और पूरी योजना के साथ अंजाम दी गई। सुबह होने से पहले ही वन विभाग की टीमें भारी पुलिस बल के साथ किच्छा और सितारगंज वन क्षेत्र के चिन्हित स्थलों पर पहुंच गईं। कार्रवाई के दौरान डोला और पुलभट्टा फॉरेस्ट रेंज में वन भूमि पर बनी दो मजारों को जेसीबी मशीनों की मदद से ढहा दिया गया। इस दौरान क्षेत्र में किसी भी प्रकार के विरोध की स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त सुरक्षा प्रबंध किए गए थे।
दो महीने पहले दिया गया था ‘अल्टीमेटम’
तराई केंद्रीय वन प्रभाग के डीएफओ (DFO) हिंमाशु बागड़ी ने मामले की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि विभाग ने इन अवैध संरचनाओं को हटाने के लिए अचानक कोई कदम नहीं उठाया है। उन्होंने कहा, “पुलभट्टा और डोला रेंज में वन भूमि पर ये मजारें बिना किसी वैध अनुमति के बनाई गई थीं। हमने करीब दो महीने पहले ही संबंधित पक्षों और खादिमों को नोटिस जारी कर दिया था। उनसे स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यदि उनके पास भूमि के स्वामित्व या निर्माण की अनुमति से संबंधित कोई भी वैध दस्तावेज हैं, तो वे प्रस्तुत करें।”
डीएफओ ने आगे बताया कि नोटिस की अवधि समाप्त होने के बावजूद किसी भी पक्ष की ओर से कोई संतोषजनक जवाब या साक्ष्य पेश नहीं किया गया। इसके बाद विभाग ने नियमानुसार ध्वस्तीकरण की फाइल तैयार की और जिला प्रशासन के सहयोग से आज इसे अंजाम दिया गया।
मलबे को भी किया गया ‘आउट’, पुन: कब्जे की गुंजाइश खत्म
आमतौर पर ध्वस्तीकरण के बाद मलबा वहीं छोड़ दिया जाता है, जिसका लाभ उठाकर अतिक्रमणकारी दोबारा वहां संरचना खड़ी कर लेते हैं। लेकिन इस बार प्रशासन ने रणनीति बदलते हुए मलबे को भी वन क्षेत्र से बाहर फिंकवा दिया है। एडीएम पंकज उपाध्याय ने बताया कि वन विभाग और जिला प्रशासन के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक में यह तय किया गया था कि वन क्षेत्र को पूरी तरह से ‘क्लीन’ किया जाएगा। सभी कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद ही यह कदम उठाया गया है ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार के कानूनी विवाद की स्थिति न बने।
धामी सरकार का ‘एंटी-अतिक्रमण’ अभियान: अब तक 570+ पर प्रहार
उत्तराखंड में सरकारी भूमि को कब्जा मुक्त कराने का अभियान पिछले एक साल से चरम पर है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि देवभूमि के स्वरूप को बिगाड़ने वाली किसी भी अवैध संरचना को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक राज्यभर में 577 से अधिक अवैध धार्मिक और व्यावसायिक संरचनाओं को हटाया जा चुका है।
इसमें सबसे अधिक कार्रवाई वन भूमि पर हुई है, जहां मजारों और मंदिरों की आड़ में सैकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन दबा ली गई थी। रुद्रपुर की यह ताजा कार्रवाई उसी अभियान का एक हिस्सा है, जो यह दर्शाता है कि प्रशासन अब दूरस्थ जंगलों के भीतर छिपे अतिक्रमणों तक भी पहुंच रहा है।
स्थानीय राजनीति और कानून-व्यवस्था
इस उत्तराखंड अवैध मजार ध्वस्तीकरण की खबर फैलते ही जिले की सियासत में भी सुगबुगाहट तेज हो गई है। हालांकि, प्रशासन की सख्त घेराबंदी और पहले से जारी किए गए नोटिसों के कारण विरोध के स्वर धीमे पड़ गए हैं। स्थानीय लोगों का एक बड़ा वर्ग इस कार्रवाई का समर्थन कर रहा है, जिनका मानना है कि जंगलों की सुरक्षा के लिए अवैध निर्माणों का हटना अनिवार्य है।
एडीएम पंकज उपाध्याय ने पुष्टि की कि पूरी प्रक्रिया के दौरान कानून-व्यवस्था की कोई स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। उन्होंने चेतावनी दी कि सरकारी भूमि पर बिना अनुमति के किसी भी प्रकार का निर्माण करना न केवल कानूनन अपराध है, बल्कि इसके परिणाम भी ध्वस्तीकरण और भारी दंड के रूप में भुगतने होंगे।
स्थायी समाधान की ओर बढ़ते कदम
रुद्रपुर में हुई यह कार्रवाई केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को बचाने की एक बड़ी पहल है। वन विभाग ने अब उन सभी क्षेत्रों की ड्रोन मैपिंग शुरू कर दी है जहां संदिग्ध निर्माण होने की आशंका है।
अवैध अतिक्रमण के खिलाफ यह हंटर तब तक चलता रहेगा जब तक राज्य की पूरी सरकारी जमीन ‘कब्जा मुक्त’ नहीं हो जाती। रुद्रपुर की जनता और पर्यावरण प्रेमियों ने प्रशासन के इस साहसिक कदम की सराहना की है, लेकिन असली चुनौती भविष्य में इन जमीनों को दोबारा अतिक्रमण से बचाए रखने की होगी।



