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उत्तराखंडफीचर्ड

पहाड़ का दर्द: चमोली में ‘डिजिटल इंडिया’ की दावों के बीच डंडी-कंडी का सफर, 10 किमी पालकी में तड़पती रही घायल महिला

The Hill India News
Last updated: April 4, 2026 2:16 am
The Hill India News
Published: April 4, 2026
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Photo: Social Media
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चमोली/गोपेश्वर। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में ‘विकास की बयार’ बहने के सरकारी दावों के बीच चमोली जनपद से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-नियंताओं को आईना दिखाने के लिए काफी है। जनपद के दशोली विकासखंड के अंतर्गत आने वाली निजमुला घाटी का मौली हडूंगा गांव आज भी मध्यकालीन युग जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ताजा घटनाक्रम में, सड़क मार्ग न होने के कारण एक घायल महिला को ग्रामीणों ने लकड़ी की पालकी (डंडी-कंडी) के सहारे करीब 10 किलोमीटर के पथरीले और दुर्गम रास्तों से होकर अस्पताल पहुंचाया।

Contents
हादसे ने फिर ताजा किया सड़क का जख्म10 किलोमीटर का ‘यम सफर’ और सिस्टम की चुप्पीप्रधान का फूटा गुस्सा: “कब तक ढोएंगे अपनों की लाशें और लाचारगी?”विकास की फाइलों में गुम ‘मौली हडूंगा’सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरें, सरकार से तीखे सवालसमाधान की दरकार

हादसे ने फिर ताजा किया सड़क का जख्म

मिली जानकारी के अनुसार, मौली हडूंगा निवासी गुड्डी देवी (पत्नी वीरेंद्र सिंह) अन्य दिनों की तरह जंगल में चारा-पत्ती लेने गई थीं। इसी दौरान पेड़ से पैर फिसलने के कारण वह अनियंत्रित होकर नीचे गिर गईं और गंभीर रूप से घायल हो गईं। चीख-पुकार सुनकर परिजन और ग्रामीण मौके पर पहुंचे, लेकिन असली चुनौती घायल महिला को उपचार दिलाने की थी।

गाँव से मुख्य सड़क तक पहुँचने का कोई सीधा साधन नहीं है। चमोली मौली हडूंगा सड़क समस्या की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ग्रामीणों को तत्काल लकड़ी की एक डंडी (पालकी) तैयार करनी पड़ी। महिला को उस पर लिटाकर गांव के युवाओं और बुजुर्गों ने बारी-बारी से अपने कंधों पर लादा और 10 किलोमीटर लंबे पहाड़ी उबड़-खाबड़ रास्तों को पार कर सड़क तक पहुंचे।

10 किलोमीटर का ‘यम सफर’ और सिस्टम की चुप्पी

ग्रामीणों ने बताया कि घायल महिला दर्द से कराह रही थी, लेकिन रास्ते इतने संकरे और खतरनाक थे कि एक छोटी सी चूक महिला और उसे ले जा रहे ग्रामीणों की जान पर भारी पड़ सकती थी। करीब 4 से 5 घंटे के संघर्ष के बाद महिला को सड़क तक लाया गया, जहाँ से निजी वाहन के जरिए उन्हें जिला चिकित्सालय गोपेश्वर में भर्ती कराया गया।

अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार, महिला का उपचार जारी है, लेकिन समय पर इलाज न मिलने की स्थिति में चोटें और भी घातक साबित हो सकती थीं। यह पहली बार नहीं है जब इस घाटी में कोई मरीज डंडी-कंडी के भरोसे अस्पताल पहुंचा हो। यहाँ गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए ले जाना हो या बुजुर्गों को इलाज के लिए, कंधे ही एंबुलेंस की भूमिका निभाते हैं।

प्रधान का फूटा गुस्सा: “कब तक ढोएंगे अपनों की लाशें और लाचारगी?”

मौली हडूंगा के ग्राम प्रधान भगत फरस्वाण ने शासन-प्रशासन के खिलाफ गहरा रोष व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में जहाँ दुनिया चांद और मंगल की बातें कर रही है, वहाँ हमारे गांव के लोग 8 से 10 किलोमीटर का पैदल सफर तय करने को मजबूर हैं।

“सड़क के बिना गाँव का अस्तित्व खतरे में है। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं यहाँ के लोगों के लिए आज भी सपना बनी हुई हैं। हम लगातार मांग कर रहे हैं, ज्ञापन दे रहे हैं, लेकिन हमारी पुकार सुनने वाला कोई नहीं है। क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है?” — भगत फरस्वाण, ग्राम प्रधान

विकास की फाइलों में गुम ‘मौली हडूंगा’

चमोली मौली हडूंगा सड़क समस्या केवल एक गाँव की कहानी नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों की उस कड़वी हकीकत का दस्तावेज है, जो हर चुनाव में ‘वोट बैंक’ तो बनता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही भुला दिया जाता है। निजमुला घाटी की भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं, लेकिन क्या 2026 के दौर में भी एक गांव को सड़क से जोड़ना इतना नामुमकिन है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क न होने के कारण गांव के युवाओं का पलायन तेजी से बढ़ रहा है। बीमार होने पर लोग भगवान भरोसे रहते हैं। कई बार गंभीर स्थिति में मरीज सड़क तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरें, सरकार से तीखे सवाल

महिला को पालकी में ले जाते हुए ग्रामीणों की तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं, जिससे सरकार के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक तरफ चारधाम ऑल वेदर रोड जैसी परियोजनाएं बन रही हैं, तो दूसरी तरफ ऐसे गांव भी हैं जहां लोग बुनियादी पैदल रास्तों के लिए तरस रहे हैं।

समाधान की दरकार

प्रशासन की ओर से इस मामले में अब तक केवल औपचारिक आश्वासन ही मिले हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या गुड्डी देवी जैसी महिलाओं को अपनी जान जोखिम में डालकर ही इलाज मिलेगा? क्या मौली हडूंगा के बच्चों और बुजुर्गों को सड़क देखने के लिए अभी और कई दशक इंतजार करना होगा?

ग्रामीणों ने अब दो-टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही सड़क मार्ग का निर्माण शुरू नहीं किया गया, तो वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मानवीय संकट पर कब जागता है या फिर यह घटना भी फाइलों के नीचे दबी रह जाएगी।

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