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होर्मुज संकट के बीच रूस बना भारत का ऊर्जा ‘सुरक्षा कवच’, तेल-गैस सप्लाई बढ़ाने का बड़ा प्रस्ताव

नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने की आशंका के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं गहराती जा रही हैं। इसी संवेदनशील समय में रूस ने भारत को बड़ा राहत पैकेज देने का संकेत दिया है। रूस के पहले डिप्टी प्रधानमंत्री डेनिस मंटूरोव की हालिया भारत यात्रा के दौरान मॉस्को ने साफ किया कि वह भारत को पहले से अधिक मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस सप्लाई करने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह प्रस्ताव ऐसे वक्त आया है जब वैश्विक सप्लाई चेन दबाव में है और ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ती जा रही है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक है और उसकी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है। लेकिन ईरान-इजराइल तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की आशंका ने भारत के लिए स्थिति को जटिल बना दिया है। होर्मुज स्ट्रेट से होकर वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है, ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ता है। इसी पृष्ठभूमि में रूस का यह प्रस्ताव भारत के लिए रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

डेनिस मंटूरोव ने अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की। इन बैठकों में ऊर्जा, उर्वरक, व्यापार, कनेक्टिविटी और औद्योगिक सहयोग जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने इस सहयोग को “म्यूचुअली बेनिफिशियल” बताते हुए दोनों देशों के बीच गहराते रिश्तों पर जोर दिया। वहीं, एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि बातचीत का मुख्य फोकस ऊर्जा और औद्योगिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर रहा।

रूस की ओर से यह दावा किया गया है कि उसकी कंपनियों के पास भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की पर्याप्त क्षमता है। रूसी दूतावास के अनुसार, तेल और एलएनजी की सप्लाई को लगातार बढ़ाने की योजना तैयार है। इसके अलावा, रूस ने उर्वरकों की सप्लाई में भी उल्लेखनीय वृद्धि की है। 2025 के अंत तक रूस ने भारत को उर्वरकों की आपूर्ति में करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की है, जो भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है। इससे यह साफ होता है कि रूस सिर्फ ऊर्जा ही नहीं, बल्कि कृषि और औद्योगिक जरूरतों में भी भारत का महत्वपूर्ण साझेदार बनता जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम में “रूस फैक्टर” की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि भारत पहले से ही रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदता रहा है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए रूस से तेल आयात जारी रखा है। हाल ही में अमेरिका की ओर से कुछ नरमी के संकेत मिलने के बाद रूस एक बार फिर भारत का प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है।

ऊर्जा के अलावा, इस यात्रा में न्यूक्लियर एनर्जी सेक्टर पर भी विशेष ध्यान दिया गया। तमिलनाडु स्थित कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट पर काम तय समयसीमा के अनुसार आगे बढ़ रहा है। दोनों देशों ने इस क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति जताई है। इसके साथ ही टेक्नोलॉजी, स्पेस और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी के नए अवसरों की तलाश की जा रही है।

हालांकि, रूस के इस प्रस्ताव के साथ भारत के सामने एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती भी खड़ी होती है। एक ओर सस्ता और भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत है, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी देशों के साथ संबंधों का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ भारत के रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं, ऐसे में रूस के साथ बढ़ता सहयोग एक संतुलनकारी नीति की मांग करता है।

इसके बावजूद, मौजूदा वैश्विक हालात में भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है। सरकार का फोकस इस बात पर है कि देश में तेल और गैस की आपूर्ति बाधित न हो और कीमतों पर नियंत्रण बना रहे। रूस का प्रस्ताव इस दिशा में एक मजबूत विकल्प के रूप में सामने आया है।

कुल मिलाकर, मिडिल ईस्ट संकट के बीच रूस का यह कदम भारत के लिए “दोस्त के सहारे” जैसा साबित हो सकता है। यदि आने वाले समय में रूस से तेल और गैस की सप्लाई बढ़ती है, तो भारत में ऊर्जा संकट की आशंकाएं काफी हद तक कम हो सकती हैं। यह सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।

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