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उत्तराखंड कांग्रेस में ‘हरदा’ का मौन व्रत: क्या संजय नेगी की वापसी बनेगी हरीश रावत की सक्रियता का आधार?

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड की सियासत में ‘सियासी ड्रामे’ और ‘मौन संदेश’ का पुराना इतिहास रहा है। वर्तमान में प्रदेश की राजनीति के केंद्र बिंदु पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत (हरदा) बने हुए हैं। उनके द्वारा घोषित 15 दिनों के ‘राजनीतिक अवकाश’ ने न केवल कांग्रेस संगठन के भीतर हलचल पैदा कर दी है, बल्कि पार्टी के भीतर गुटबाजी की परतों को भी एक बार फिर उघाड़ कर रख दिया है। दिलचस्प मोड़ तब आया जब इस पूरे विवाद की जड़ माने जा रहे रामनगर के नेता संजय नेगी ने खुद हरीश रावत से मिलकर उनसे ‘वनवास’ खत्म करने की गुहार लगाई है।

विवाद की धुरी: संजय नेगी की कांग्रेस में वापसी

उत्तराखंड कांग्रेस में इस समय सबसे बड़ा सवाल संजय नेगी की ज्वाइनिंग को लेकर है। रामनगर के ज्येष्ठ ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी, जिनकी पत्नी ब्लॉक प्रमुख हैं, 2022 के विधानसभा चुनाव में बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़े थे। उस वक्त कांग्रेस ने उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में निष्कासित कर दिया था। अब उनकी घर वापसी की कोशिशों ने पार्टी के भीतर एक बड़ा ‘पावर गेम’ शुरू कर दिया है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हरीश रावत, संजय नेगी को पार्टी में वापस लाने के पक्षधर हैं, लेकिन पार्टी का एक धड़ा, जिसमें रणजीत रावत और महेंद्र पाल जैसे नेता शामिल हैं, इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। इसी खींचतान और संगठन के भीतर अपनी अनदेखी से क्षुब्ध होकर हरीश रावत ने 15 दिनों के लिए राजनीति से दूरी बनाने का ऐलान कर दिया।

मुलाकात और मान-मनौव्वल: बंद कमरे की कहानी

बृहस्पतिवार को इस घटनाक्रम में तब नया मोड़ आया जब संजय नेगी खुद देहरादून स्थित हरीश रावत के आवास पर पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच बंद कमरे में लंबी वार्ता हुई। मुलाकात के बाद संजय नेगी ने मीडिया से मुखातिब होते हुए कहा:

“मैंने ‘हरदा’ से विनम्र आग्रह किया है कि वे अपना राजनीतिक अवकाश समाप्त करें। उनके जैसे वरिष्ठ नेता का सक्रिय राजनीति से दूर रहना पार्टी और कार्यकर्ताओं के मनोबल के लिए ठीक नहीं है। जहां तक मेरी ज्वाइनिंग का सवाल है, मैंने स्पष्ट कर दिया है कि हाईकमान का जो भी निर्णय होगा, मुझे स्वीकार होगा। मैं पार्टी की एकजुटता की कीमत पर अपनी वापसी नहीं चाहता।”

पार्टी के भीतर बंटा हुआ है नेतृत्व

हरीश रावत के इस कदम पर कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की प्रतिक्रियाएं पार्टी की आंतरिक गुटबाजी को साफ दर्शाती हैं।

  • हरक सिंह रावत और गोविंद सिंह कुंजवाल जैसे नेताओं का मानना है कि हरीश रावत उत्तराखंड में कांग्रेस का पर्याय हैं और उनके बिना पार्टी ‘बिना इंजन की ट्रेन’ जैसी है।

  • वहीं, विधायक हरीश धामी और कुछ अन्य नेताओं का तर्क है कि संगठन किसी व्यक्ति विशेष से बड़ा होता है। पार्टी एक संस्था है और इसे किसी एक नेता की नाराजगी के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए।

इन सबके बीच, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह ने बेहद संतुलित रुख अपनाया है। उन्होंने कुछ नेताओं के बयानों को ‘भावनात्मक आवेग’ करार देते हुए कहा कि हरीश रावत जल्द ही सक्रिय होंगे और पार्टी को उनके अनुभव की सख्त जरूरत है।


रामनगर का गणित: क्यों उलझी है गुत्थी?

2022 के विधानसभा चुनाव में रामनगर सीट ‘हॉट सीट’ बन गई थी। तब हरीश रावत और रणजीत रावत के बीच टिकट को लेकर सीधी जंग छिड़ी थी। अंततः टिकट महेंद्र पाल को मिला, जिससे नाराज होकर संजय नेगी ने निर्दलीय ताल ठोक दी। संजय नेगी को हरीश रावत का करीबी माना जाता है, यही कारण है कि रणजीत रावत गुट उनकी वापसी को अपनी राजनीतिक जमीन के लिए खतरे के तौर पर देख रहा है।

इस हरीश रावत राजनीतिक अवकाश के पीछे असल मंशा संगठन पर दबाव बनाना है या फिर वाकई यह आत्ममंथन का समय है, यह तो आने वाले चंद दिनों में साफ हो जाएगा। लेकिन एक बात तय है कि संजय नेगी की वापसी का रास्ता दिल्ली दरबार (हाईकमान) से होकर ही गुजरेगा।

फिलहाल, उत्तराखंड कांग्रेस की नजरें हरीश रावत के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या वे संजय नेगी को पार्टी में ससम्मान वापस दिला पाएंगे? या फिर विरोधियों का पलड़ा भारी रहेगा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस को आगामी निकाय चुनावों और भविष्य की चुनौतियों का सामना करना है, तो उसे ‘हरदा’ की नाराजगी दूर करनी होगी। संजय नेगी की पहल ने गेंद अब पूरी तरह से हरीश रावत और कांग्रेस हाईकमान के पाले में डाल दी है।

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