नई दिल्ली: भारतीय राजनीति और आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में सोमवार का दिन एक मील का पत्थर साबित हुआ। लोकसभा में नियम 193 के तहत ‘वामपंथी उग्रवाद‘ पर हुई महत्वपूर्ण चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक ऐतिहासिक घोषणा की। शाह ने सदन को संबोधित करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि दशकों से देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए नासूर बना नक्सलवाद अब पूरी तरह खत्म हो चुका है और “भारत अब नक्सलमुक्त हो गया है।”
अपने लंबे और ओजस्वी संबोधन में गृह मंत्री ने न केवल सुरक्षा बलों की उपलब्धियों को गिनाया, बल्कि विपक्षी दल कांग्रेस और विशेष रूप से राहुल गांधी पर तीखे प्रहार करते हुए उन्हें कटघरे में खड़ा किया।
‘संविधान को चुनौती देने वालों के दिन लद गए’
अमित शाह ने सदन में दहाड़ते हुए कहा कि जो लोग भारत के लोकतंत्र और संविधान को बंदूक की नोक पर निशाना बनाने का ख्वाब देखते थे, उनके दिन अब लद चुके हैं। उन्होंने कहा, “नक्सलियों का नेटवर्क अब ध्वस्त हो चुका है। हमने न केवल उनके सुरक्षित ठिकानों को तबाह किया है, बल्कि उनकी विचारधारा को भी जड़ से उखाड़ फेंका है।” शाह ने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति ने इस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया है।
राहुल गांधी पर सीधा हमला: “नक्सल समर्थकों के साथ दिखे हैं विपक्ष के नेता”
अमित शाह के संबोधन का सबसे आक्रामक हिस्सा वह था जब उन्होंने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को सीधे निशाने पर लिया। शाह ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी का झुकाव कई बार नक्सली विचारधारा और उनके समर्थकों की ओर देखा गया है।
गृह मंत्री ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा:
“राहुल गांधी कई बार नक्सली समर्थकों के साथ देखे गए हैं। उन्होंने नक्सली समर्थकों के साथ न केवल मंच साझा किया, बल्कि उनके एजेंडे का समर्थन भी किया। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि राहुल गांधी ने उस वीडियो को भी साझा किया जिसमें खूंखार नक्सली हिडमा के मारे जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया जा रहा था।”
अमित शाह यहीं नहीं रुके, उन्होंने पिछली यूपीए सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में कांग्रेस नक्सलियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने के बजाय उन्हें बचाने के रास्ते तलाशती थी, जिसके कारण नक्सलवाद का विस्तार हुआ।
“गोली का जवाब गोली से”: सरकार की दो-टूक नीति
नक्सलवाद के खिलाफ केंद्र सरकार की भविष्य की रणनीति को स्पष्ट करते हुए अमित शाह ने साफ संदेश दिया कि अब ‘नरमी’ का दौर बीत चुका है। उन्होंने सरकार की ‘टॉक एंड फायर’ नीति को विस्तार से समझाया:
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बातचीत की शर्त: सरकार केवल उन्हीं से बात करेगी जो लोकतंत्र में विश्वास रखते हुए हथियार डाल देंगे।
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करारा जवाब: जो लोग देश के जवानों पर गोली चलाएंगे, उन्हें गोली से ही जवाब दिया जाएगा। इसमें किसी भी तरह की कोई रियायत नहीं होगी।
शाह ने कहा, “हम एक जीवंत लोकतंत्र हैं और हमने देश के संविधान को पूरी निष्ठा से अपनाया है। मोदी सरकार किसी की धमकियों से डरने वाली नहीं है। यह सरकार हर वर्ग के साथ न्याय करने वाली सरकार है, लेकिन राष्ट्रविरोधी तत्वों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है।”
सुरक्षा और विकास का समन्वय
गृह मंत्री ने अपनी चर्चा के दौरान उन आंकड़ों को भी पेश किया जो पिछले कुछ वर्षों में नक्सली हिंसा में आई भारी कमी को दर्शाते हैं। उन्होंने बताया कि कैसे ‘नक्सल प्रभावित जिलों’ की संख्या अब सिमटकर न के बराबर रह गई है। उन्होंने सुरक्षा बलों के बलिदान को नमन करते हुए कहा कि आज बस्तर से लेकर झारखंड के जंगलों तक विकास की किरण पहुँच रही है, सड़कें बन रही हैं और स्कूलों का जाल बिछाया जा रहा है, जिसने नक्सलियों की भर्ती के आधार को ही खत्म कर दिया है।
विपक्ष का पलटवार और सदन में हंगामा
अमित शाह के संबोधन के दौरान जब उन्होंने राहुल गांधी और कांग्रेस पर सीधे प्रहार किए, तो सदन में विपक्षी सांसदों ने भारी हंगामा किया। कांग्रेस सदस्यों ने शाह के आरोपों को “निराधार और राजनीति से प्रेरित” बताया। हालांकि, शाह ने अपने दावों पर कायम रहते हुए कहा कि सुरक्षा के मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब तथ्य सामने हों तो सच बोलना जरूरी है।
अमित शाह का यह संबोधन केवल एक सरकारी बयान नहीं, बल्कि 2026 के नए भारत का एक संकल्प है। अमित शाह लोकसभा संबोधन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार वामपंथी उग्रवाद को इतिहास के पन्नों में दफन करने के लिए आखिरी प्रहार कर चुकी है। अब देखना यह होगा कि इस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच सुरक्षा एजेंसियां इस ‘नक्सलमुक्त’ दर्जे को कितनी मजबूती से बरकरार रखती हैं।



