श्रीनगर (गढ़वाल): देवभूमि उत्तराखंड की शैक्षणिक नगरी श्रीनगर एक बार फिर देश की बहुरंगी संस्कृति के रंगों में सराबोर नजर आई। अवसर था केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन ‘उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, पटियाला’ द्वारा आयोजित भव्य श्रीनगर लोकरंग उत्सव का। राजकीय मेडिकल कॉलेज, श्रीकोट के विशाल सभागार में जब छह राज्यों के लोक कलाकारों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा और वाद्य यंत्रों के साथ मंच संभाला, तो पूरा वातावरण ‘मिनी इंडिया’ के रूप में जीवंत हो उठा। नगर निगम श्रीनगर और पराज इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के सहयोग से हुए इस आयोजन ने राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक सद्भाव की एक नई इबारत लिखी है।
दीप प्रज्वलन के साथ हुआ सांस्कृतिक अनुष्ठान का शुभारंभ
उत्सव का औपचारिक शुभारंभ मेडिकल कॉलेज की प्रभारी प्राचार्य डॉ. विनिता रावत ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि श्रीनगर लोकरंग उत्सव जैसे आयोजन केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये हमारी उस साझी विरासत के प्रतीक हैं जो उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भारत को एक सूत्र में पिरोती है। उन्होंने विशेष रूप से युवा पीढ़ी और मेडिकल के छात्रों के लिए इसे एक सीखने वाला अनुभव बताया, जिससे वे किताबों से इतर देश के वास्तविक लोकजीवन और परंपराओं से रूबरू हो सकें।
कश्मीर की कली से लेकर राजस्थान के रेगिस्तान तक का सफर
कार्यक्रम की शुरुआत होते ही सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को देश के विभिन्न कोनों की सैर करा दी:
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कश्मीर का रऊफ: केसर की क्यारियों की खुशबू समेटे कश्मीरी कलाकारों ने जब अपनी पारंपरिक धुनें छेड़ीं, तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए।
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गुजरात का गरबा और डांडिया: रंग-बिरंगे केडियू और चनिया-चोली पहने कलाकारों ने गुजरात की ऊर्जावान संस्कृति को मंच पर उतारा।
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राजस्थान का घूमर: मरुभूमि की मर्यादा और भव्यता को दर्शाते हुए राजस्थानी दल ने अपनी कला से सबका मन मोह लिया।
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उत्तर प्रदेश और हरियाणा: ब्रज की लठमार होली की झलक और हरियाणा के दमदार लोकनृत्यों ने कार्यक्रम में जोश भर दिया।
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उत्तराखंड की गौरवशाली परंपरा: स्थानीय कलाकारों ने छपेली और झौड़ा नृत्य के माध्यम से पहाड़ों की सुकोमल संस्कृति और लोक गाथाओं को प्रस्तुत किया।
‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की जीवंत मिसाल
डॉ. विनिता रावत ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री के ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ अभियान का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे मंचों से राज्यों के बीच की दूरियां मिटती हैं। जब एक कश्मीरी कलाकार उत्तराखंड के मंच पर थिरकता है और उत्तर प्रदेश का कलाकार राजस्थान की धुन पर ताल मिलाता है, तो राष्ट्रीय अखंडता की भावना और भी प्रबल होती है। श्रीनगर लोकरंग उत्सव ने यह सिद्ध किया कि कला की कोई भाषा नहीं होती, वह सीधे हृदय से संवाद करती है।
पारंपरिक वाद्य यंत्रों और परिधानों का जादू
इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता कलाकारों की वेशभूषा और उनके पारंपरिक साज रहे। आधुनिकता के इस दौर में ढोल-दमाऊ, हुड़का, इकतारा और सारंगी जैसे दुर्लभ वाद्य यंत्रों की गूँज ने दर्शकों को जड़ों की ओर लौटने का अहसास कराया। कलाकारों के भारी आभूषण और जटिल कढ़ाई वाले परिधानों ने फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के शौकीन युवाओं को अपनी ओर आकर्षित किया। मेडिकल कॉलेज के छात्रों के लिए यह तनाव भरे शैक्षणिक माहौल के बीच एक मानसिक सुकून और ऊर्जा भरने वाला सत्र साबित हुआ।
जनता की मांग: नियमित हों ऐसे आयोजन
कार्यक्रम के समापन पर दर्शकों की प्रतिक्रिया अभूतपूर्व रही। स्थानीय निवासियों और छात्रों ने इस बात पर जोर दिया कि श्रीनगर जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह के उच्च स्तरीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अभाव रहता है। लोगों ने अपेक्षा जताई कि केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय भविष्य में भी श्रीनगर लोकरंग उत्सव को एक वार्षिक आयोजन के रूप में निरंतरता प्रदान करे। कार्यक्रम के अंत में कलाकारों का उत्साहवर्धन करते हुए उन्हें स्मृति चिह्न भेंट किए गए।
सांस्कृतिक चेतना का संचार
श्रीनगर गढ़वाल में आयोजित यह ‘लोकरंग उत्सव’ न केवल एक सफल आयोजन रहा, बल्कि इसने समाज में सांस्कृतिक चेतना के संचार का कार्य भी किया। विविधताओं के बीच एकता का जो संदेश इस मंच से निकला है, वह लंबे समय तक स्थानीय लोगों की स्मृतियों में ताजा रहेगा। राजकीय मेडिकल कॉलेज के सभागार में गूंजी उन लोकधुनों ने यह साबित कर दिया कि हमारी लोक कलाएं ही हमारी असली पहचान हैं और इन्हें सहेज कर रखना ही भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती और उपलब्धि है।



