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उत्तराखंडफीचर्ड

Uttarakhand: हाईकोर्ट ने HRDA को दिया कृषि भूमि पर अवैध प्लॉटिंग का आदेश वापस लेने का अल्टीमेटम

The Hill India News
Last updated: March 11, 2026 1:25 pm
The Hill India News
Published: March 11, 2026
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नैनीताल/हरिद्वार: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हरिद्वार में कृषि और बागों की भूमि के संरक्षण को लेकर एक ऐतिहासिक और सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने हरिद्वार रुड़की विकास प्राधिकरण (HRDA) द्वारा नियमों और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को दरकिनार कर दी गई अवैध प्लॉटिंग और ग्रुप हाउसिंग की अनुमतियों पर गहरा रोष व्यक्त किया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने प्राधिकरण को दो टूक शब्दों में निर्देश दिया है कि वह अपने विवादास्पद आदेश को एक सप्ताह के भीतर वापस ले, अन्यथा कोर्ट उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए विवश होगा।

Contents
क्या है पूरा मामला?2018 का ऐतिहासिक आदेश और सुप्रीम कोर्ट की मुहरHRDA की मनमानी पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणीहरिद्वार के पर्यावरण और भूगोल पर संकटआदेश का प्रभाव और भविष्य की राह

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद हरिद्वार निवासी अतुल कुमार चौहान द्वारा वर्ष 2023 में दायर एक जनहित याचिका से शुरू हुआ था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि हरिद्वार रुड़की विकास प्राधिकरण ने माननीय उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए कृषि और बागवानी की भूमि पर बड़े पैमाने पर प्लॉटिंग और ग्रुप हाउसिंग की अनुमति प्रदान की है। याचिकाकर्ता के अनुसार, प्राधिकरण की बोर्ड मीटिंग में लिया गया यह निर्णय न केवल पर्यावरण के लिए घातक है, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा को भी चुनौती देता है।

2018 का ऐतिहासिक आदेश और सुप्रीम कोर्ट की मुहर

मामले की जड़ें 19 जून 2018 के उस आदेश में हैं, जिसमें उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि राज्य में कृषि और बागों की भूमि अत्यंत सीमित है, इसलिए इन पर किसी भी प्रकार की प्लॉटिंग या ग्रुप हाउसिंग की अनुमति नहीं दी जा सकती।

राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, 30 अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की विशेष अपील को निस्तारित करते हुए हाईकोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि यदि सरकार को कोई आपत्ति है, तो वह संशोधन के लिए वापस हाईकोर्ट जा सकती है। लेकिन, सरकार ने ऐसा करने के बजाय प्राधिकरण के माध्यम से पिछले दरवाजों से अनुमतियाँ देना जारी रखा।

HRDA की मनमानी पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि HRDA ने अपनी बोर्ड बैठक में एक ऐसा प्रस्ताव पारित किया जो सीधे तौर पर अदालती आदेशों के उलट था। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि 4 सितंबर 2023 को भी कोर्ट ने रोक के आदेश के अनुपालन की बात कही थी, लेकिन धरातल पर प्राधिकरण ने उन आदेशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

खंडपीठ ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यह सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना का मामला बनता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “विकास के नाम पर नियमों की धज्जियां नहीं उड़ाई जा सकतीं।”

हरिद्वार के पर्यावरण और भूगोल पर संकट

जनहित याचिका में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि अवैध प्लॉटिंग की वजह से हरिद्वार के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों से कृषि भूमि और हरे-भरे बाग पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं। कंक्रीट के जंगल खड़े होने से क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) बिगड़ रहा है। यदि इन गतिविधियों पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए खेती योग्य भूमि का संकट पैदा हो जाएगा।

आदेश का प्रभाव और भविष्य की राह

हाईकोर्ट के इस सख्त रवैये के बाद अब हरिद्वार रुड़की विकास प्राधिकरण के अधिकारियों में हड़कंप मच गया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि एक सप्ताह की समय सीमा के बाद किसी भी प्रकार की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

इस मामले के मुख्य बिंदु:

  • अवमानना की चेतावनी: आदेश वापस न लेने पर जिम्मेदार अधिकारियों पर गिरेगी गाज।

  • कृषि भूमि का संरक्षण: कोर्ट ने दोहराया कि सीमित कृषि भूमि का व्यवसायीकरण अवैध है।

  • सुप्रीम कोर्ट का रुख: शीर्ष अदालत ने भी हाईकोर्ट के 2018 के आदेश को सही माना है।

  • प्राधिकरण की बोर्ड बैठक: बोर्ड के उन फैसलों को अवैध माना गया है जो न्यायिक आदेशों के विरुद्ध थे।

उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह निर्देश उन अधिकारियों और भू-माफियाओं के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाकर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं। यह मामला न केवल हरिद्वार, बल्कि पूरे उत्तराखंड में कृषि भूमि के संरक्षण के लिए एक नजीर साबित होगा। अब देखना यह है कि HRDA प्रशासन एक सप्ताह के भीतर अपनी गलतियों को सुधारता है या फिर उसे कोर्ट की सख्त अवमानना कार्यवाही का सामना करना पड़ता है।

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