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उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तराखंड हाईकोर्ट का सख्त रुख: वक्फ बोर्ड के नामित सदस्यों की सदस्यता पर गहराया संकट, सरकार से 4 सप्ताह में मांगा जवाब

The Hill India News
Last updated: February 1, 2026 3:43 am
The Hill India News
Published: February 1, 2026
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नैनीताल। उत्तराखंड वक्फ बोर्ड में नामित सदस्यों के कार्यकाल और उनकी वैधानिकता को लेकर कानूनी रस्साकशी तेज हो गई है। नैनीताल हाईकोर्ट ने एक अहम सुनवाई के दौरान वक्फ बोर्ड के नामित सदस्यों की सदस्यता को चुनौती देने वाली याचिका पर राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड को नोटिस जारी किया है। न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।

Contents
क्या है पूरा मामला?‘संशोधित नियमावली 2025’ और कानूनी पेंचहाईकोर्ट की कार्यवाही और बोर्ड का पक्षअगली सुनवाई 10 मार्च कोराजनीतिक और सामाजिक मायने

क्या है पूरा मामला?

हल्द्वानी निवासी नसीम अहमद वारसी द्वारा दायर जनहित याचिका में वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली और सदस्यों के मनोनयन पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह है कि बोर्ड में निर्वाचित और नामित सदस्यों के लिए अलग-अलग नियम निर्धारित हैं, लेकिन वर्तमान में नियमों की अनदेखी कर नामित सदस्यों को पद पर बनाए रखा गया है।

न्यायालय में दी गई दलीलों के अनुसार, उत्तराखंड वक्फ बोर्ड की संरचना में कुल 11 सदस्य होते हैं। इस संरचना का गणित कुछ इस प्रकार है:

  • निर्वाचित सदस्य: 6 (इनका कार्यकाल नए बोर्ड के गठन तक प्रभावी रहता है)।

  • नामित सदस्य: 5 (इनकी नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती है और इनका कार्यकाल स्थायी नहीं होता)।

‘संशोधित नियमावली 2025’ और कानूनी पेंच

याचिकाकर्ता नसीम अहमद वारसी का कहना है कि वक्फ बोर्ड का पिछला चुनाव साल 2022 में संपन्न हुआ था। तब से लेकर अब तक नामित सदस्य अपने पदों पर काबिज हैं, जो कि वक्फ बोर्ड संशोधित नियमावली 2025 के स्पष्ट उल्लंघन का मामला प्रतीत होता है।

याचिका में विशेष रूप से संशोधित नियमावली की धारा 14 का हवाला दिया गया है। इस धारा के अनुसार:

“नामित सदस्यों का कार्यकाल स्थायी नहीं है और उन्हें नए बोर्ड की प्रक्रिया के साथ निरंतरता का अधिकार नहीं मिलता। केवल निर्वाचित सदस्य ही तब तक अपने पद पर बने रह सकते हैं जब तक कि नई कार्यकारिणी या बोर्ड का विधिवत गठन नहीं हो जाता।”

आंदोलनकारी और याचिकाकर्ता का आरोप है कि 2022 से अब तक नामित सदस्यों का पद पर बने रहना न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि यह बोर्ड की लोकतांत्रिक पारदर्शिता पर भी सवाल खड़ा करता है।

हाईकोर्ट की कार्यवाही और बोर्ड का पक्ष

शनिवार को हुई इस विशेष सुनवाई के दौरान अवकाशकालीन न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की पीठ ने याचिकाकर्ता के तर्कों को सुना। दूसरी ओर, वक्फ बोर्ड की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने याचिका का विरोध करते हुए इसे ‘पोषणीय’ (Maintainable) न होने की दलील दी। बोर्ड का तर्क था कि याचिका कानून के मानकों पर खरी नहीं उतरती, इसलिए इसे तत्काल खारिज कर दिया जाना चाहिए।

हालांकि, कोर्ट ने बोर्ड की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए मामले को विस्तार से सुनने का निर्णय लिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि मामला नियमों की व्याख्या और वैधानिकता से जुड़ा है, इसलिए राज्य सरकार और बोर्ड का पक्ष जानना अनिवार्य है।

अगली सुनवाई 10 मार्च को

हाईकोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 10 मार्च 2026 की तिथि निर्धारित की है। तब तक राज्य सरकार और वक्फ बोर्ड को यह स्पष्ट करना होगा कि किस आधार पर और किन नियमों के तहत नामित सदस्य अभी भी बोर्ड की बैठकों और निर्णयों में हिस्सा ले रहे हैं।

राजनीतिक और सामाजिक मायने

उत्तराखंड में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और बोर्ड के गठन को लेकर पिछले कुछ समय से काफी चर्चाएं रही हैं। ऐसे में हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप बोर्ड के भीतर की राजनीति को प्रभावित कर सकता है। यदि न्यायालय नामित सदस्यों की सदस्यता को अवैध पाता है, तो सरकार को नए सदस्यों के मनोनयन की प्रक्रिया तत्काल शुरू करनी पड़ सकती है। इसके अलावा, वक्फ बोर्ड द्वारा 2022 के बाद लिए गए निर्णयों पर भी वैधानिक सवाल उठ सकते हैं।

नैनीताल हाईकोर्ट के इस नोटिस ने राज्य सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। 10 मार्च की सुनवाई यह तय करेगी कि क्या वक्फ बोर्ड में ‘पॉवर बैलेंस’ (शक्ति संतुलन) बदलेगा या वर्तमान सदस्य अपनी कुर्सी बचाए रखने में सफल होंगे। फिलहाल, वक्फ बोर्ड के गलियारों में इस कानूनी चुनौती को लेकर हलचल तेज है।

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