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उत्तराखंडफीचर्ड

गंगा की धारा बदलने से उपजे यूपी-उत्तराखंड सीमा विवाद पर हाईकोर्ट सख्त, DM को दिए बड़े निर्देश

The Hill India News
Last updated: February 3, 2026 1:27 pm
The Hill India News
Published: February 3, 2026
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नैनीताल/हरिद्वार: प्रकृति की अनिश्चितता और नदियों के बदलते रुख ने अक्सर भौगोलिक सीमाओं को चुनौती दी है, लेकिन जब यह मामला दो राज्यों के बीच ‘अधिकार क्षेत्र’ का बन जाए, तो सबसे अधिक मार आम किसान पर पड़ती है। उत्तराखंड के हरिद्वार जिले और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित दर्जनों गांवों में इन दिनों ऐसा ही संकट गहराया हुआ है।

Contents
क्या है पूरा मामला? (The Core Dispute)किसानों की आजीविका पर संकट और कानूनी लड़ाईग्रामीणों की प्रमुख मांगें: संयुक्त सर्वे और पिलर निर्माणविशेषज्ञों की राय और प्रशासनिक चुनौतियां

गंगा नदी की धारा में आए बदलाव के कारण उपजे अंतरराज्यीय सीमा विवाद पर कड़ा रुख अपनाते हुए, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की अवकाशकालीन पीठ ने हरिद्वार के जिलाधिकारी (DM) को निर्देशित किया है कि वे प्रभावित ग्रामीणों द्वारा दिए गए प्रत्यावेदनों पर छः सप्ताह के भीतर निर्णय लें, ताकि किसान अपनी आजीविका के लिए कृषि कार्य निर्बाध रूप से कर सकें।

क्या है पूरा मामला? (The Core Dispute)

विवाद की जड़ें हरिद्वार जिले के उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे गांवों—रायपुर, रायघाटी, काबुलपुरी, भिक्कमपुर और जीतपुर—से जुड़ी हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से गंगा नदी इन गांवों के बीच से बहती थी, जो उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बीच एक प्राकृतिक सीमा का काम करती थी।

बीते कुछ वर्षों में गंगा नदी ने अपना मार्ग (धारा) परिवर्तित कर लिया है। नदी के इस भौगोलिक बदलाव के कारण राजस्व अभिलेखों में दर्ज कृषि योग्य भूमि की स्थिति संदिग्ध हो गई है। इसका परिणाम यह हुआ कि जिस जमीन पर ग्रामीण दशकों से खेती कर रहे थे, अब उस पर उत्तर प्रदेश वन प्रभाग अपना दावा ठोक रहा है।

किसानों की आजीविका पर संकट और कानूनी लड़ाई

ग्रामीणों का पक्ष रखते हुए कोर्ट में दलील दी गई कि सीमा विवाद के चलते उत्तर प्रदेश वन प्रभाग उन्हें उनके ही खेतों में काम करने से रोक रहा है। किसानों का कहना है कि:

  • सीमा स्पष्ट न होने के कारण उन्हें “अतिक्रमणकारी” माना जा रहा है।

  • कृषि कार्य रुकने से सैकड़ों परिवारों की आर्थिक स्थिति बदहाल हो गई है।

  • राजस्व विभाग को बार-बार शिकायत करने के बावजूद दोनों राज्यों के बीच कोई समन्वय नहीं बन पाया है।

न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार से भी चार सप्ताह के भीतर जवाब तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई अब छह सप्ताह बाद तय की गई है।

ग्रामीणों की प्रमुख मांगें: संयुक्त सर्वे और पिलर निर्माण

याचिका के माध्यम से ग्रामीणों ने प्रशासन और न्यायालय के समक्ष ठोस समाधान की मांग रखी है। उनकी मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:

  1. संयुक्त टीम का गठन: उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के राजस्व अधिकारियों की एक ज्वाइंट सर्वे टीम बनाई जाए।

  2. सीमा निर्धारण (Demarcation): वैज्ञानिक पद्धति और पुराने राजस्व नक्शों के आधार पर सीमा का पुनः निर्धारण हो।

  3. पिलर स्थापना: विवाद को स्थाई रूप से खत्म करने के लिए सीमा पर कंक्रीट के पिलर लगाए जाएं।

  4. सुरक्षा और अनुमति: जब तक अंतिम फैसला न हो, किसानों को पुलिस सुरक्षा के बीच खेती करने की अनुमति दी जाए।

विशेषज्ञों की राय और प्रशासनिक चुनौतियां

भू-वैज्ञानिकों और राजस्व विशेषज्ञों का मानना है कि ‘एलुवियन और डिलुवियन’ (Alluvion and Diluvion) के सिद्धांत के तहत जब नदियां रास्ता बदलती हैं, तो मालिकाना हक का निर्धारण जटिल हो जाता है। हरिद्वार के इन गांवों में स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यहां दो राज्यों की पुलिस और वन विभाग आमने-सामने आ जाते हैं।

उच्च न्यायालय के इस हस्तक्षेप के बाद अब गेंद जिलाधिकारी हरिद्वार के पाले में है। 6 सप्ताह की समय सीमा यह सुनिश्चित करने के लिए दी गई है कि प्रशासन किसानों की शिकायतों का निस्तारण प्राथमिकता के आधार पर करे।

यह मामला केवल कुछ एकड़ जमीन का नहीं, बल्कि संघीय ढांचे के भीतर दो राज्यों के आपसी समन्वय और सैकड़ों किसानों के जीवन के अधिकार (Article 21) का है। यदि प्रशासन समय रहते ठोस कदम नहीं उठाता, तो यह विवाद न केवल कानूनी रूप से उलझेगा, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था की स्थिति भी पैदा कर सकता है।

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