
देहरादून | 25 नवंबर: उत्तराखंड की राजनीति और राज्य आंदोलन के इतिहास में एक स्तंभ माने जाने वाले पूर्व कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट अब हमारे बीच नहीं रहे। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे भट्ट ने मंगलवार शाम 4:30 बजे हरिद्वार स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। 78 वर्षीय यह जननेता अपने पीछे संघर्ष, आंदोलन और जनसेवा की एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं, जिसे उत्तराखंड की राजनीति में भर पाना मुश्किल है।
उनके निधन की पुष्टि उनके पुत्र ललित भट्ट ने की। उन्होंने बताया कि विगत दिनों दिवाकर भट्ट की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें देहरादून के इंद्रेश अस्पताल में भर्ती कराया गया था। स्वास्थ्य लगातार बिगड़ने और चिकित्सकों द्वारा आगे उपचार की सीमाएं बताने के बाद दोपहर में उन्हें हरिद्वार लाया गया था। परिवार के अनुसार, घर पहुंचने के कुछ ही घंटों बाद उनकी स्थिति गंभीर हुई और उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।
निधन की खबर फैलते ही हरिद्वार से देहरादून तक शोक की लहर दौड़ गई और राजनीतिक दलों, आंदोलनकारियों, सामाजिक संगठनों और आम लोगों का उनके आवास पर जुटना शुरू हो गया।
कल होगा अंतिम संस्कार: खड़खड़ी श्मशान घाट में अंतिम विदाई
परिजनों ने बताया कि दिवाकर भट्ट का अंतिम संस्कार बुधवार, 26 नवंबर को हरिद्वार के खड़खड़ी श्मशान घाट में किया जाएगा। उत्तराखंड सरकार, विभिन्न राजनीतिक दलों, यूकेडी कार्यकर्ताओं और राज्य आंदोलन से जुड़े हजारों लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुँच सकते हैं।
उत्तराखंड आंदोलन का आक्रामक चेहरा: क्यों कहा जाता था ‘फील्ड मार्शल’
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास को अगर आक्रामक नेतृत्व, कठोर संघर्ष और अटूट समर्पण के आधार पर याद किया जाए, तो दिवाकर भट्ट का नाम शीर्ष पंक्ति में आता है।
वे उन नेताओं में रहे जिन्होंने उत्तराखंड की स्वतंत्र पहचान को लेकर 1970 से 2000 तक चले संघर्ष को प्रखर, जीवंत और जनसरोकार वाला बनाए रखा।
यूकेडी की केंद्रीय मीडिया प्रभारी किरन रावत कश्यप ने उनके निधन को “अपूर्णीय क्षति” करार देते हुए कहा—
“दिवाकर भट्ट केवल नेता नहीं थे, वे राज्य आंदोलन की धड़कन थे। उनकी आवाज़ में वह आग थी जिसने लाखों युवाओं को सड़कों पर उतरने की प्रेरणा दी। उनकी आक्रामकता और नेतृत्व क्षमता के कारण ही आंदोलन के दौरान उन्हें ‘फील्ड मार्शल’ कहा गया।”
राज्य आंदोलन के दौरान नारे, धरने, आमरण अनशन और पुलिस दमन के बीच भट्ट उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे, जिसने पहाड़ की उपेक्षा के खिलाफ अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
राजनीतिक सफर: आंदोलन से सत्ता के केंद्र तक
दिवाकर भट्ट का राजनीतिक जीवन लंबा, संघर्षमयी और बहुआयामी था। यूकेडी के संस्थापक सदस्य के रूप में उन्हें हमेशा एक विचारधारा वाले, साफ-सुथरी छवि के नेता के रूप में देखा गया।
• जन्म: वर्ष 1946
• शिक्षा व प्रारंभिक जीवन: पहाड़ी जीवन की कठिनाइयों ने उनके राजनीतिक विचार गढ़े
• आंदोलनकारी: 1970 से अलग राज्य की लड़ाई के अग्रिम पंक्ति में सक्रिय
• विधायक:
2007 में देवप्रयाग विधानसभा क्षेत्र से यूकेडी के टिकट पर विधायक चुने गए
• कैबिनेट मंत्री (2007–2012):
उत्तराखंड की बीजेपी सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया। उन्होंने शहरी विकास, स्थानीय निकाय और पहाड़ी क्षेत्रों की बुनियादी संरचना को मजबूत करने से जुड़े कई विभागों का नेतृत्व किया।
उनके निकट सहयोगियों का कहना है कि—“भट्ट कभी कुर्सी के लिए राजनीति नहीं करते थे। चाहे विपक्ष में हों या सत्ता में, उनकी प्राथमिकता हमेशा पहाड़, पर्यावरण, पलायन और लोगों की समस्याएँ ही रहीं।” उनके कार्यकाल में कई छोटे नगरों का ढांचा मजबूत करने, ग्रामीण सड़कों को विकसित करने और ठोस कचरा प्रबंधन जैसी योजनाओं को दिशा मिली।
राजनीतिक मतभेद, फिर भी सम्मान बरकरार
हालांकि यूकेडी के भीतर कई बार मतभेदों और टूट-फूट की स्थिति बनी, लेकिन दिवाकर भट्ट की वैचारिक निष्ठा और साफ राजनीतिक छवि हमेशा सबके बीच सम्मानित रही।
वे राजनीति की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे जो संगठन को व्यक्ति से ऊपर मानती थी।
आंदोलनकारी बताते हैं कि—“वह वक्त भी आया जब दलों ने उन्हें अपने मंच से दूर रखा, लेकिन जनता ने कभी नहीं।” उनका प्रभाव देवप्रयाग, टिहरी, श्रीनगर, पौड़ी और अल्मोड़ा तक दिखाई देता रहा।
सीएम पुष्कर सिंह धामी ने जताया गहरा शोक
दिवाकर भट्ट के निधन पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गहरी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा—
“उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ आंदोलनकारी एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट जी के निधन का समाचार अत्यंत दुःखद है। राज्य निर्माण आंदोलन से लेकर जनसेवा तक उनके योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेंगे।” मुख्यमंत्री ने परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि भट्ट का निधन पूरे राज्य की सामूहिक क्षति है।
यूकेडी और आंदोलनकारियों ने भी जताया शोक
यूकेडी के कई नेताओं ने दिवाकर भट्ट के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने “पार्टी का नहीं, प्रदेश का हित पहले रखा।” राज्य आंदोलन से जुड़े कई वरिष्ठ नेताओं ने कहा—“आज हमने उस नेता को खो दिया जिसने पहाड़ के दर्द को अपने भीतर उतारकर राजनीति की। उसका स्थान कोई नहीं भर सकता।”
एक जननेता का अंत, लेकिन संघर्ष की विरासत जिंदा रहेगी
दिवाकर भट्ट का जाना उत्तराखंड के लिए सिर्फ एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि एक युग का अंत है— एक ऐसा युग जिसमें आंदोलन राजनीति से बड़ा था, और जनसेवा सत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण। उनकी जीवन यात्रा यह याद दिलाती है कि किसी नेता की ऊँचाई पद से नहीं, बल्कि उसके संघर्षों से मापी जाती है।
उनके समर्थकों, आंदोलनकारियों और उत्तराखंड की जनता के बीच वे हमेशा एक ऐसे नेता के रूप में याद किए जाएंगे—जो पहाड़ के लिए लड़ा, पहाड़ के लिए जिया और अंत तक पहाड़ के लिए समर्पित रहा।



