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जेएनयू छात्र संघ चुनाव 2025: मतगणना जारी, कैंपस में उच्च सुरक्षा के बीच छात्रों की नजरें नतीजों पर

The Hill India News
Last updated: November 5, 2025 2:26 pm
The Hill India News
Published: November 5, 2025
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नई दिल्ली, 5 नवंबर।देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में से एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्र राजनीति का ताप एक बार फिर अपने चरम पर है। मंगलवार को संपन्न हुए जेएनयू छात्र संघ (JNUSU) चुनाव के बाद मतगणना का दौर देर रात शुरू हुआ, जो बुधवार को भी जारी रहा। इस बार भी परिसर में छात्र संगठनों के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है।

Contents
कड़ी सुरक्षा और पारदर्शी प्रक्रियामुख्य मुकाबला वाम गठबंधन और ABVP के बीचमतदाता उत्साह और उच्च मतदान प्रतिशतसोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार का असरपिछले वर्षों की पृष्ठभूमिप्रमुख मुद्दे: फीस, हॉस्टल, और अकादमिक स्वतंत्रतापरिणामों की प्रतीक्षा में कैंपस में उत्सुकतादेशभर में जेएनयू छात्र संघ चुनावों को केवल एक कैंपस गतिविधि नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के युवा चेहरे के रूप में देखा जाता है। 6 नवंबर को घोषित होने वाले नतीजे न केवल विश्वविद्यालय की राजनीति की दिशा तय करेंगे, बल्कि यह भी दिखाएंगे कि नई पीढ़ी किस विचारधारा में अपना भरोसा जता रही है।

चुनाव समिति ने जानकारी दी है कि मतगणना पूरी होने के बाद 6 नवंबर (गुरुवार) को परिणाम घोषित किए जाएंगे।


कड़ी सुरक्षा और पारदर्शी प्रक्रिया

जेएनयू प्रशासन और चुनाव समिति ने इस बार मतदान और मतगणना दोनों चरणों में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की। विश्वविद्यालय परिसर में पुलिस बल की तैनाती के साथ-साथ चुनाव केंद्रों पर CCTV निगरानी और वीडियो रिकॉर्डिंग की व्यवस्था की गई थी।
मतगणना स्थल, जो विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में स्थित है, को पूरी तरह से घेराबंदी कर केवल अधिकृत प्रतिनिधियों को ही प्रवेश की अनुमति दी गई है।
चुनाव समिति के एक अधिकारी ने बताया,

“हमने यह सुनिश्चित किया है कि मतगणना की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रहे। प्रत्येक संगठन को उनके एजेंटों के माध्यम से मतगणना स्थल पर उपस्थिति की अनुमति दी गई है।”


मुख्य मुकाबला वाम गठबंधन और ABVP के बीच

हर साल की तरह इस बार भी जेएनयू का चुनाव वामपंथी संगठनों के गठबंधन (Left Unity) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के बीच कड़ा मुकाबला बन गया है।
वाम गठबंधन में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI), डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन (DSF) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) शामिल हैं।
वहीं दूसरी ओर, भाजपा की छात्र इकाई ABVP ने भी अपने युवा उम्मीदवारों और “राष्ट्रीय विचारधारा” के मुद्दे पर जोरदार प्रचार अभियान चलाया।

विश्वविद्यालय के भीतर छात्र संगठनों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से शैक्षणिक माहौल, फीस वृद्धि, छात्रवृत्ति, महिला सुरक्षा, और राजनीतिक स्वतंत्रता जैसे विषयों को प्रमुखता दी।
एक छात्र प्रतिनिधि ने कहा,

“जेएनयू का छात्र चुनाव केवल छात्र राजनीति का नहीं, बल्कि पूरे देश में लोकतांत्रिक सोच और बहस की संस्कृति का प्रतीक बन गया है।”


मतदाता उत्साह और उच्च मतदान प्रतिशत

चुनाव समिति के अनुसार, इस वर्ष मतदान में 68 प्रतिशत से अधिक छात्रों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जो पिछले कुछ वर्षों की तुलना में अधिक है।
कई छात्रों ने सुबह से ही लंबी कतारों में लगकर मतदान किया। मतदान शांतिपूर्ण रहा और किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली।
छात्रों के उत्साह से स्पष्ट था कि कैंपस में लोकतांत्रिक भागीदारी के प्रति रुचि अब भी बरकरार है।

एक प्रथम वर्ष की छात्रा ने कहा,

“यह मेरा पहला वोट था और मुझे गर्व है कि मैंने ऐसे संस्थान में वोट दिया जहां बहस, असहमति और संवाद को सम्मान दिया जाता है।”


सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार का असर

इस बार का चुनाव प्रचार पारंपरिक पोस्टरों और नुक्कड़ बहसों के साथ-साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी काफी सक्रिय रहा।
छात्र संगठनों ने इंस्टाग्राम, X (पूर्व ट्विटर), और टेलीग्राम चैनलों के ज़रिए अपनी विचारधाराओं और घोषणापत्र को प्रसारित किया।
ABVP ने डिजिटल अभियानों के जरिए “राष्ट्रीयता और रोजगार”, जबकि वाम गठबंधन ने “शिक्षा के अधिकार और असमानता के खिलाफ लड़ाई” को मुख्य विषय बनाया।

चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि डिजिटल रणनीति और जमीनी संवाद दोनों ही इस बार परिणाम तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।


पिछले वर्षों की पृष्ठभूमि

जेएनयू छात्र संघ चुनावों का इतिहास हमेशा से विचारधाराओं के संघर्ष का रहा है।
2019 में वाम गठबंधन ने चारों प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की थी, जबकि 2023 में ABVP ने केंद्रीय पैनल में एक पद पर कब्जा जमाकर वापसी की थी।
इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प है क्योंकि दोनों पक्षों ने अपने-अपने छात्र आधार को मजबूत करने के लिए महीने भर पहले से कैंपेन शुरू कर दिया था।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जेएनयू चुनावों के नतीजे अक्सर राष्ट्रीय छात्र राजनीति की दिशा तय करते हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय और हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के छात्र संगठन भी इन नतीजों को ध्यान से देखते हैं।


प्रमुख मुद्दे: फीस, हॉस्टल, और अकादमिक स्वतंत्रता

जेएनयू छात्र चुनाव के दौरान उठाए गए मुख्य मुद्दों में फीस वृद्धि, हॉस्टल की सीमित उपलब्धता, संशोधित शैक्षणिक नीतियाँ, और अकादमिक स्वतंत्रता प्रमुख रहे।
वाम संगठनों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर छात्रों की आवाज़ दबाने और शिक्षकों की नियुक्तियों में देरी का आरोप लगाया, जबकि ABVP ने आरोप लगाया कि वाम संगठनों ने “छात्र राजनीति को राष्ट्रीय राजनीति का रंग” दे दिया है।

दोनों पक्षों ने अपने घोषणापत्र में जेएनयू के बौद्धिक वातावरण को सशक्त बनाने का वादा किया।
छात्र समुदाय की राय में, इस बार के परिणाम न केवल संगठनात्मक संतुलन तय करेंगे, बल्कि यह भी संकेत देंगे कि विश्वविद्यालय की नई पीढ़ी किस दिशा में सोच रही है।


परिणामों की प्रतीक्षा में कैंपस में उत्सुकता

मतगणना स्थल के बाहर सैकड़ों छात्र पोस्टरों और बैनरों के साथ खड़े होकर ‘कौन जीतेगा जेएनयू?’ के अंदाज़ में नारे लगा रहे हैं।
चुनाव समिति के मुताबिक, पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए हर राउंड की गणना के बाद अपडेट जारी किया जाएगा।
परिणाम घोषित होने के बाद नव-निर्वाचित छात्र संघ विश्वविद्यालय के भविष्य के अकादमिक और सामाजिक माहौल को आकार देगा।

एक छात्र नेता ने कहा,

“जेएनयू का चुनाव लोकतंत्र की सबसे जीवंत मिसाल है। यहां जीत या हार से ज्यादा महत्वपूर्ण है विचारों की निरंतर बहस और संवाद।”


देशभर में जेएनयू छात्र संघ चुनावों को केवल एक कैंपस गतिविधि नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के युवा चेहरे के रूप में देखा जाता है। 6 नवंबर को घोषित होने वाले नतीजे न केवल विश्वविद्यालय की राजनीति की दिशा तय करेंगे, बल्कि यह भी दिखाएंगे कि नई पीढ़ी किस विचारधारा में अपना भरोसा जता रही है।

जेएनयू परिसर इस समय उम्मीद, जोश और लोकतांत्रिक बहस से भरा हुआ है — जहां हर छात्र अपनी आवाज़ से भविष्य की कहानी लिखने को तैयार है।

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