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Reading: मई से सितंबर के दौरान अमेरिका को भारत के निर्यात में 37.5% की गिरावट, दवा और स्मार्टफोन सेक्टर पर सबसे ज़्यादा असर
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मई से सितंबर के दौरान अमेरिका को भारत के निर्यात में 37.5% की गिरावट, दवा और स्मार्टफोन सेक्टर पर सबसे ज़्यादा असर

The Hill India News
Last updated: November 3, 2025 1:28 am
The Hill India News
Published: November 3, 2025
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नई दिल्ली, 3 नवंबर (भाषा): भारत से अमेरिका को निर्यात में तेज गिरावट दर्ज की गई है। नीति शोध संस्था ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, मई से सितंबर 2025 के बीच भारत का अमेरिका को कुल माल निर्यात 37.5 प्रतिशत घट गया है।

Contents
मुख्य आंकड़े: दवाओं और स्मार्टफोन के निर्यात में भारी गिरावटअमेरिकी मांग में गिरावट और डॉलर की मजबूती से बढ़ा दबावस्मार्टफोन निर्यात में गिरावट ने बदली तस्वीरफार्मास्यूटिकल्स: नियामक सख्ती और पेटेंट मुद्दों से बढ़ी चुनौतीभारत-अमेरिका व्यापार संतुलन पर असरGTRI की सिफारिशें: निर्यातकों को विविधीकरण की जरूरतसरकार की प्रतिक्रिया: स्थिति पर नजर, सुधार के कदम शुरूविशेषज्ञों की चेतावनी: निर्यात वृद्धि को बनाए रखना होगा चुनौतीपूर्णसुधार की गुंजाइश, लेकिन सावधानी जरूरी

मई में जहां भारत ने अमेरिका को 8.8 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का सामान निर्यात किया था, वहीं सितंबर में यह घटकर 5.5 अरब डॉलर रह गया।

जीटीआरआई (GTRI) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस गिरावट के पीछे फार्मास्यूटिकल्स, स्मार्टफोन, धातु उत्पादों और ऑटो कंपोनेंट्स जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में आई मंदी मुख्य कारण रही है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर यह रुझान जारी रहा तो आने वाले महीनों में भारत का कुल निर्यात लक्ष्य प्रभावित हो सकता है।


मुख्य आंकड़े: दवाओं और स्मार्टफोन के निर्यात में भारी गिरावट

जीटीआरआई की रिपोर्ट के मुताबिक,

  • फार्मास्यूटिकल्स (दवा उत्पादों) का निर्यात मई के 74.56 करोड़ अमेरिकी डॉलर से 15.7 प्रतिशत घटकर सितंबर में 62.83 करोड़ डॉलर रह गया।
  • स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्यात में भी उल्लेखनीय कमी आई है।
    मई में यह श्रेणी 1.9 अरब डॉलर के स्तर पर थी, जो सितंबर में घटकर 1.2 अरब डॉलर पर आ गई।
  • इसी तरह धातु उत्पादों और ऑटो पार्ट्स के निर्यात में क्रमशः 22% और 18% की गिरावट दर्ज की गई है।

जीटीआरआई के अनुसार, यह गिरावट न केवल मौसमी उतार-चढ़ाव का नतीजा है, बल्कि वैश्विक आर्थिक मंदी, मांग में कमी, और अमेरिकी बाजार में वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की बढ़ती उपस्थिति भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।


अमेरिकी मांग में गिरावट और डॉलर की मजबूती से बढ़ा दबाव

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता खर्च में आई गिरावट, खासकर स्वास्थ्य, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो सेक्टर में, भारतीय निर्यात को सीधे प्रभावित कर रही है।
साथ ही, अमेरिकी डॉलर की मजबूती और भंडारण लागत में वृद्धि ने भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर किया है।

जीटीआरआई के सह-संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा,

“भारत का अमेरिका को निर्यात लंबे समय से दवाओं, मशीनरी, रत्न-आभूषण और इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भर रहा है। लेकिन हाल के महीनों में मांग में गिरावट और अमेरिकी बाजार में मूल्य प्रतिस्पर्धा बढ़ने से भारतीय निर्यातकों पर दबाव बना है।”


स्मार्टफोन निर्यात में गिरावट ने बदली तस्वीर

भारत ने पिछले दो वर्षों में स्मार्टफोन निर्यात को अपनी नई आर्थिक ताकत के रूप में विकसित किया था।
2023-24 में भारत से मोबाइल फोन निर्यात 15 अरब डॉलर के पार पहुंच गया था, जिसमें अमेरिका सबसे बड़ा बाजार था।
लेकिन मई से सितंबर 2025 के बीच अमेरिकी बाजार में स्मार्टफोन की मांग में कमी, उच्च ब्याज दरों और बढ़ती महंगाई के कारण गिरावट आई है।

उद्योग विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिकी उपभोक्ता अब रीफर्बिश्ड (Refurbished) या सेकंड-हैंड फोन की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे नई यूनिटों की बिक्री पर असर पड़ा है।
इसके अलावा, चीन और वियतनाम से आने वाले सस्ते इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों ने भी भारतीय निर्यातकों की हिस्सेदारी कम की है।


फार्मास्यूटिकल्स: नियामक सख्ती और पेटेंट मुद्दों से बढ़ी चुनौती

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अमेरिकी FDA (Food and Drug Administration) की नई दवा अनुमोदन नीतियों और गुणवत्ता जांच मानकों ने भारत से निर्यात होने वाली दवाओं पर प्रभाव डाला है।
कई भारतीय फार्मा कंपनियों को हाल ही में अमेरिका में निरीक्षण और आयात चेतावनी (Import Alert) का सामना करना पड़ा, जिससे निर्यात में अस्थायी ठहराव आया।

जीटीआरआई के अनुसार, दवा निर्यात में आई 15.7% की गिरावट मुख्य रूप से जेनेरिक दवाओं (Generic Drugs) के ऑर्डर में कमी और अमेरिका में घरेलू उत्पादन बढ़ने से जुड़ी है।


भारत-अमेरिका व्यापार संतुलन पर असर

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
वित्त वर्ष 2024-25 की पहली छमाही में भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार लगभग 60 अरब अमेरिकी डॉलर का रहा, जिसमें भारत का निर्यात 32 अरब डॉलर और आयात 28 अरब डॉलर के आसपास था।
हालांकि, मई-सितंबर के दौरान निर्यात में आई भारी कमी से यह व्यापार संतुलन भारत के खिलाफ झुक सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भारत के सेवा क्षेत्र (IT, Consultancy, Education) के बढ़ते व्यापार से कुछ हद तक संतुलित हो सकती है, लेकिन माल निर्यात में आई यह गिरावट चिंताजनक है।


GTRI की सिफारिशें: निर्यातकों को विविधीकरण की जरूरत

जीटीआरआई ने रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता कम करनी चाहिए और यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे उभरते बाजारों की ओर रुख करना चाहिए।
संस्था ने कहा कि भारत को अपने लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्यात प्रोत्साहन नीतियों को भी आधुनिक बनाने की आवश्यकता है।

अजय श्रीवास्तव ने कहा,

“भारत को अपने निर्यात बास्केट का पुनर्गठन करना चाहिए। यदि हम केवल चार से पांच सेक्टरों पर निर्भर रहेंगे, तो वैश्विक मांग में मामूली गिरावट भी हमारे व्यापार को प्रभावित करेगी।”


सरकार की प्रतिक्रिया: स्थिति पर नजर, सुधार के कदम शुरू

वाणिज्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सरकार निर्यात में आई गिरावट की वजहों का विश्लेषण कर रही है और विशेष प्रोत्साहन योजनाओं पर काम चल रहा है।
उन्होंने कहा कि “इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और ऑटो कंपोनेंट्स सेक्टर के लिए नए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम” की समीक्षा की जा रही है।

इसके अलावा, सरकार ने निर्यातकों के लिए क्रेडिट गारंटी और शिपिंग सब्सिडी बढ़ाने पर भी विचार शुरू किया है।


विशेषज्ञों की चेतावनी: निर्यात वृद्धि को बनाए रखना होगा चुनौतीपूर्ण

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर यह गिरावट अगले दो-तीन महीनों तक जारी रही, तो भारत का 2025-26 के लिए 450 अरब डॉलर निर्यात लक्ष्य प्रभावित हो सकता है। भारतीय व्यापार परिषद (FIEO) के अध्यक्ष अश्विनी कुमार ने कहा,

“वैश्विक अर्थव्यवस्था फिलहाल मंदी के दौर से गुजर रही है। भारत को अपने उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाने और नए बाजारों में ब्रांडिंग बढ़ाने की जरूरत है।”


सुधार की गुंजाइश, लेकिन सावधानी जरूरी

भारत का अमेरिका को निर्यात में 37.5% की गिरावट अल्पकालिक झटका हो सकता है, लेकिन यह भारतीय निर्यात नीति के लिए एक सतर्क संकेत भी है।
यदि सरकार समय पर नीतिगत हस्तक्षेप करती है और उद्योग विविधीकरण को बढ़ावा देती है, तो भारत अगले वित्त वर्ष में फिर से गति पकड़ सकता है।

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