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जम्मू-कश्मीर में दो सरकारी शिक्षक बर्खास्त: आतंकवाद से जुड़े होने का आरोप, LG मनोज सिन्हा ने दिखाई सख्ती

The Hill India News
Last updated: October 30, 2025 1:52 pm
The Hill India News
Published: October 30, 2025
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नई दिल्ली, 30 अक्टूबर 2025। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने आतंकवाद से जुड़े नेटवर्क के खिलाफ एक और कड़ा कदम उठाया है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने दो सरकारी शिक्षकों को आतंकी संगठनों से संबंध रखने के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया है। यह कार्रवाई केंद्र शासित प्रदेश में आतंकवाद के प्रति सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस नीति’ के तहत की गई है।

Contents
लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क में थे दोनों आरोपी शिक्षकपहला मामला: रियासी जिले का गुलाम हुसैनदूसरा मामला: राजौरी का माजिद इकबाल डारसंविधान का अनुच्छेद 311: सुरक्षा मामलों में विशेष प्रावधानLG मनोज सिन्हा: “आतंकवाद को किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं”सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का विस्तारनार्को-टेरर नेटवर्क पर कड़ा प्रहारकठोर लेकिन आवश्यक कदम

दोनों शिक्षकों को संविधान के अनुच्छेद 311 (2)(c) के तहत नौकरी से हटाया गया है, जिसके तहत ऐसे मामलों में बिना नियमित विभागीय जांच के भी सेवा समाप्त की जा सकती है, यदि यह राष्ट्र की सुरक्षा के हित में आवश्यक समझा जाए।


लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क में थे दोनों आरोपी शिक्षक

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, जांच में पाया गया कि दोनों शिक्षक आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के सक्रिय समर्थक और ओवर ग्राउंड वर्कर (OGW) थे। वे संगठन के लिए न केवल सूचना और लॉजिस्टिक सपोर्ट मुहैया कराते थे, बल्कि आतंकियों के परिवारों को वित्तीय सहायता भी देते थे।

सरकारी सूत्रों ने बताया कि इन शिक्षकों की गतिविधियाँ सामान्य प्रशासनिक दायरे से कहीं अधिक थीं — वे आतंकियों के संदेश और आदेश एन्क्रिप्टेड मोबाइल ऐप्स के माध्यम से आगे बढ़ाते थे, और कुछ मामलों में युवाओं को उकसाने और भर्ती में भी भूमिका निभा रहे थे।


पहला मामला: रियासी जिले का गुलाम हुसैन

पहले बर्खास्त किए गए शिक्षक गुलाम हुसैन, रियासी जिले के महौर क्षेत्र के निवासी हैं। वे 2004 में रहबर-ए-तालीम शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए थे और 2009 में नियमित शिक्षक बने। उनकी तैनाती सरकारी प्राथमिक विद्यालय, कलवा (महौर) में थी।

जांच एजेंसियों ने पाया कि हुसैन कई वर्षों से लश्कर-ए-तैयबा के ओवर ग्राउंड नेटवर्क का हिस्सा था। उसके संपर्क पाकिस्तान स्थित आतंकी हैंडलर्स मोहम्मद कासिम और गुलाम मुस्तफा से थे, जिनसे वह एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स के जरिए संपर्क में रहता था।

सुरक्षा एजेंसियों ने बताया कि 2023 में उसकी गिरफ्तारी के दौरान कई डिजिटल सबूत मिले — जिनमें वित्तीय लेन-देन के रिकॉर्ड, संदिग्ध संदेश और हैंडलर्स से बातचीत के साक्ष्य शामिल थे। हुसैन ने आतंकियों के परिवारों को आर्थिक सहायता, लॉजिस्टिक सहयोग और भर्ती प्रक्रियाओं में मदद की थी।

जांच रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि उसकी गतिविधियाँ केवल पैसों के लिए नहीं, बल्कि वह कट्टरपंथी विचारधारा से प्रेरित होकर यह कार्य कर रहा था।


दूसरा मामला: राजौरी का माजिद इकबाल डार

दूसरे शिक्षक माजिद इकबाल डार की तैनाती राजौरी जिले के एक सरकारी विद्यालय में थी। 2009 में पिता की मृत्यु के बाद उसे लैब असिस्टेंट के रूप में नौकरी मिली थी, और 2019 में वह शिक्षक पद पर पदोन्नत हुआ।

खुफिया जांच में खुलासा हुआ कि माजिद इकबाल डार भी लश्कर-ए-तैयबा का ओवर ग्राउंड वर्कर था और उसने जम्मू-कश्मीर में फैले नार्को-टेरर नेटवर्क के लिए काम किया। वह आतंकी वित्तपोषण, ड्रग तस्करी से प्राप्त धन को आतंक गतिविधियों में लगाने और स्थानीय स्तर पर युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेलने में शामिल पाया गया।

2024 में राजौरी IED विस्फोट केस की जांच के दौरान माजिद इकबाल डार का नाम सामने आया था, जिसके बाद उस पर सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी बढ़ाई गई। लंबी निगरानी के बाद ठोस सबूत मिलने पर प्रशासन ने उसकी सेवा समाप्त कर दी।


संविधान का अनुच्छेद 311: सुरक्षा मामलों में विशेष प्रावधान

इस कार्रवाई में संविधान के अनुच्छेद 311 (2)(c) का उपयोग किया गया है। यह प्रावधान सरकार को यह अधिकार देता है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी पर ऐसे आरोप हों जो राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करते हों, तो उसकी सेवा बिना सामान्य विभागीय जांच के समाप्त की जा सकती है।

इस अनुच्छेद का इस्तेमाल पहले भी जम्मू-कश्मीर में कई बार किया जा चुका है — खासकर उन मामलों में जहाँ सरकारी कर्मचारी आतंकियों के लिए सूचना, आश्रय या सहायता प्रदान करते पाए गए।


LG मनोज सिन्हा: “आतंकवाद को किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं”

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने इस कार्रवाई को सरकार की दृढ़ नीति का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन आतंकवाद और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।

उन्होंने बयान में कहा,

“सरकार की नीति साफ है — जो भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी विभाग में क्यों न हो, राष्ट्रविरोधी ताकतों से जुड़ा पाया जाएगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और कट्टरपंथ को जड़ से समाप्त करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।”


सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का विस्तार

यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने सरकारी तंत्र में छिपे आतंकी समर्थकों और नेटवर्क एलिमेंट्स के खिलाफ लगातार सख्ती दिखाई है।
2020 के बाद से अब तक 50 से अधिक सरकारी कर्मचारियों को आतंकवाद या पाकिस्तान समर्थक गतिविधियों में लिप्त पाए जाने पर बर्खास्त किया जा चुका है। इनमें पुलिस कर्मी, शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी और लोक निर्माण विभाग के अधिकारी भी शामिल हैं।

इन कार्रवाइयों की समीक्षा हाई-लेवल सिक्योरिटी कमेटी (HLSC) द्वारा की जाती है, जिसमें गृह विभाग, पुलिस, खुफिया एजेंसियों और प्रशासनिक अधिकारियों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।


नार्को-टेरर नेटवर्क पर कड़ा प्रहार

हाल के वर्षों में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का नया चेहरा ‘नार्को-टेरर फंडिंग’ के रूप में सामने आया है। पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क ड्रग तस्करी के जरिए प्राप्त धन का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों में कर रहे हैं।
राज्य पुलिस और एनआईए (NIA) की जांचों में यह स्पष्ट हुआ है कि कई ओवर ग्राउंड वर्कर शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग जैसे सिविल सेक्टर में छिपे हुए हैं, जो इन नेटवर्क्स के लिए मददगार का काम करते हैं।

माजिद इकबाल डार की भूमिका इसी नेटवर्क से जुड़ी बताई गई है। उसके खिलाफ नार्को-फाइनेंसिंग से संबंधित साक्ष्य भी जांच एजेंसियों ने जुटाए हैं।


कठोर लेकिन आवश्यक कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकवाद से निपटने के लिए केवल सुरक्षा अभियानों से काम नहीं चलेगा, बल्कि प्रशासनिक तंत्र में घुसपैठ करने वाले तत्वों की पहचान और निष्कासन भी उतना ही जरूरी है।
जम्मू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और सुरक्षा विश्लेषक डॉ. फिरोज अहमद कहते हैं,

“जब आतंकवादी विचारधारा शिक्षा जैसे क्षेत्र में प्रवेश कर जाए, तो यह राष्ट्र की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता है। ऐसे में अनुच्छेद 311 जैसी संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग पूरी तरह उचित और आवश्यक है।”

जम्मू-कश्मीर प्रशासन की यह कार्रवाई एक स्पष्ट संदेश देती है कि आतंकवाद के किसी भी रूप — चाहे वह हथियारों के ज़रिए हो या विचारधारा के माध्यम से — को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दो शिक्षकों की बर्खास्तगी यह भी दर्शाती है कि अब आतंक समर्थक तत्व किसी सरकारी ढांचे में छिपकर सक्रिय नहीं रह सकते।

उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व में प्रशासन का यह अभियान जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण, सुरक्षित और स्थायी व्यवस्था की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है।

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