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देहरादून में मजदूरों का हुंकार: 4 श्रम संहिताओं के खिलाफ ट्रेड यूनियनों का जत्था सड़कों पर, सचिवालय कूच के दौरान तीखी झड़प

देहरादून: उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की सड़कें गुरुवार को नारों और विरोध प्रदर्शनों से गूंज उठीं। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर सीटू (CITU), एटक (AITUC) और इंटक (INTUC) सहित कई श्रमिक संगठनों और बस्ती बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने केंद्र व राज्य सरकार की नीतियों के खिलाफ जोरदार मोर्चा खोला। भारी पुलिस बल और बैरिकेडिंग के बीच प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया कि वे अधिकारों के हनन को बर्दाश्त नहीं करेंगे।

सचिवालय कूच और पुलिस के साथ तीखी नोकझोंक

रैली का आगाज राजपुर रोड स्थित घंटाघर से हुआ। एश्ले हॉल होते हुए जब सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शनकारी सचिवालय की ओर बढ़े, तो पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। सचिवालय से पहले ही पुलिस ने भारी बैरिकेडिंग लगाकर प्रदर्शनकारियों को रोक दिया। पुलिस द्वारा रोके जाने से आक्रोशित श्रमिक और कार्यकर्ता वहीं सड़क पर धरने पर बैठ गए। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की भी हुई, जिससे घंटों तक यातायात बाधित रहा।

‘श्रमिकों को गुलाम बनाने की साजिश’ – इंद्रेश मैखुरी

प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे भाकपा माले के राज्य सचिव इंद्रेश मैखुरी ने केंद्र सरकार पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि कोरोना काल की आपदा को अवसर में बदलते हुए मोदी सरकार ने अलोकतांत्रिक तरीके से सांसदों को निलंबित किया और 40 से अधिक पुराने श्रम कानूनों को समाप्त कर 4 नई श्रम संहिताएं (4 Labour Codes) थोप दीं।

मैखुरी ने कहा, “ये नई संहिताएं पूरी तरह से पूंजीपतियों के मुनाफे को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। यह मजदूरों को आधुनिक युग में गुलामी की ओर धकेलने की साजिश है। जिस 8 घंटे के कार्य दिवस को दुनिया भर के मजदूरों ने 1886 के बलिदान के बाद हासिल किया था, उसे यह सरकार खत्म कर रही है।”

8 घंटे का कार्य दिवस और यूनियन के अधिकार पर खतरा

वक्ताओं ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि शिकागो के मजदूरों की शहादत की याद में आज भी ‘मई दिवस’ मनाया जाता है, लेकिन वर्तमान नीतियां उन बलिदानों का अपमान कर रही हैं। प्रदर्शनकारियों की मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:

  1. कार्य अवधि में बदलाव: नए कानूनों से 8 घंटे के फिक्स वर्किंग आवर को लचीला बनाकर शोषण का रास्ता खोला गया है।

  2. यूनियन बनाने पर अंकुश: श्रमिकों के सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining) और यूनियन बनाने के अधिकार को सीमित किया जा रहा है।

  3. सुरक्षा का अभाव: संविदा और आउटसोर्सिंग को बढ़ावा देने से सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसे लाभ खत्म हो रहे हैं।

किसानों और गरीबों पर ‘चौतरफा हमला’

मजदूरों के साथ-साथ इस रैली में किसानों और मलिन बस्तियों के निवासियों का दर्द भी झलका। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार एक तरफ मजदूरों के हक छीन रही है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील भारतीय किसानों की कमर तोड़ने वाली है। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि इस डील से विदेशी उत्पाद भारतीय बाजार पर कब्जा कर लेंगे और स्थानीय किसान बर्बाद हो जाएगा।

उत्तराखंड के स्थानीय मुद्दों को उठाते हुए प्रदर्शनकारियों ने कहा कि राज्य में गरीबों को उजाड़ने की कार्रवाई और बढ़ते अपराध ने जनता को असुरक्षित कर दिया है।

जनसैलाब में शामिल हुए समाज के विभिन्न वर्ग

यह प्रदर्शन केवल औद्योगिक श्रमिकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें समाज के हर उस वर्ग की भागीदारी दिखी जो वर्तमान नीतियों से प्रभावित है। रैली में प्रमुख रूप से शामिल हुए:

  • आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और भोजन माताएं: अपने मानदेय और स्थायीकरण की मांग को लेकर मुखर रहीं।

  • परिवहन क्षेत्र: ऑटो और ई-रिक्शा चालक संघों ने बढ़ती महंगाई और नए नियमों का विरोध किया।

  • सेवा क्षेत्र: बैंक कर्मचारी और बिजली विभाग के संविदा कर्मी निजीकरण के खिलाफ सड़क पर उतरे।

  • चाय बागान श्रमिक: देहरादून के ऐतिहासिक चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिकों ने अपनी जमीनों और हक के लिए आवाज बुलंद की।

राष्ट्रपति को भेजा ज्ञापन

प्रदर्शन के समापन पर जिला प्रशासन के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति को एक ज्ञापन प्रेषित किया गया। ज्ञापन में मांग की गई है कि मजदूर विरोधी चार श्रम संहिताओं को तत्काल वापस लिया जाए, निजीकरण पर रोक लगे और स्कीम वर्कर्स (आंगनबाड़ी, आशा, भोजन माता) को सरकारी कर्मचारी का दर्जा दिया जाए।

देहरादून का यह प्रदर्शन केवल एक रैली नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में श्रम सुधारों और आर्थिक नीतियों को लेकर टकराव बढ़ सकता है। ट्रेड यूनियनों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर गौर नहीं किया गया, तो यह आंदोलन और उग्र रूप धारण करेगा।

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